आलेख

गुजरात में कांग्रेस के सामने चुनौतियों का पहाड़-सुरेश हिंदुस्थानी

देश के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बने गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस में अभी से ऐसे हालात बनने लगे हैं, जिनके कारण कांग्रेस के समक्ष एक तरफ कुआ तो एक तरफ खाई जैसी परिस्थितियां निर्मित होती दिखाई दे रही हैं। कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में गहरा प्रभा..

जम्मू-कश्मीर पर कांग्रेस का अलगाववादी सुर-लोकेन्द्र सिंह

कांग्रेस  के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर पर भारत विरोधी टिप्पणी करके अपनी पार्टी को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। जम्मू-कश्मीर पर चिदंबरम का बयान अलगाववादियों और पाकिस्तानियों की बयानबाजी की श्..

अयोध्या की दीपावली कुछ कहती है- लोकेन्द्र सिंह

दीपावली भारत का प्रमुख पर्व है। त्रेता युग में भगवान श्रीराम के अयोध्या आगमन के बाद दीपावली मनाई गई थी। श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर और अत्याचारी रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे। समूची अयोध्या उनकी प्रतीक्षा कर रही थी। कार्तिक अमावस्या के अं..

सज्जनशक्ति को जगाने का 'जामवन्ती' प्रयास-लोकेन्द्र सिंह

विजयादशमी उत्सव के उद्बोधन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि निर्भयतापूर्वक सज्जनशक्ति को आगे आना होगा, समाज को निर्भय, सजग और प्रबुद्ध बनना होगा विश्व के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए विजयादशमी उत्सव का बहुत महत्त्व है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के अवसर पर ही संघ की स्थापना स्वतंत्रतासेनानी डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। विजयादशमी के अवसर पर होने वाला सरसंघचालक का उद्बोधन देश-दुनिया में भारतवंदना में रत स्वयंसेवकों के लिए पाथेय का काम करता है। इस उद्बोधन से संघ ..

भारत के विश्‍व गौरव को स्‍वानुभूत करने के साथ आत्‍ममंथन का वक्‍त : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

देश दशहरा मना रहा है। वैसे भी यह दिन असत्‍य पर सत्‍य और आत्‍मबल की विजय का प्रतीक है। यह पर्व यह भी सीख देता है कि आप के समक्ष परिस्‍थ‍ितियां कितनी भी प्र‍तिकूल क्‍यों न हो, यदि मार्ग आपने सही चुना है, जिसमें पुरुषार्थ के साथ तेस्‍विता और सत्‍य है तो अंतत: सफलता आपको ही मिलेगी। श्रीराम ने जिस तरह से विपरीत परिस्‍थ‍ितियों के दौरान भी जैसा साहस दिखाया और कम संसाधन होने एवं रावण जैसी प्रशिक्षित सेना के अभाव में भी युद्ध को अपने पक्ष में कर लिया था, देखाजाए ..

हवन का महत्व

फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमे उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है जो की खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओ को मारती है तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला। गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है। (२) टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर ..

ममता सरकार के तुष्टीकरण को न्यायालय ने दिखाया आईना-लोकेन्द्र सिंह

माननीय न्यायालय में एक बार फिर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की नीति का सच सामने आ गया। ममता बनर्जी समाज को धर्म के नाम पर बाँट कर राजनीति करने वाले उन लोगों/दलों में शामिल हैं, जो अपने व्यवहार और राजनीतिक निर्णयों से घोर सांप्रदायिक हैं लेकिन, तब भी तथाकथित 'सेकुलर जमात' की झंडाबरदार हैं। मुहर्रम का जुलूस निकालने के लिए दुर्गा प्रतिमा विसर्जन पर प्रतिबंध लगाना, क्या यह सांप्रदायिक निर्णय नहीं था? क्या तृणमूल कांग्रेस सरकार के इस फैसले में तुष्टीकरण और वोटबैंक की बदबू नहीं आती? ..

देश पर कम होता ऋण भार : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

ऋण को विकास के लिए जितना अधिक अपरिहार्य माना गया है, उतना ही लगातार इससे डूबे रहने को जनमानस में घोर विपत्‍ति‍कारक स्‍वीकार्य किया गया है। भारत पर आज दुनियाभर का कितना कर्ज है, यह जानकर जितनी अधिक चिंता होती है, वहीं इन दिनों ..

हिन्दी की अस्मिता का प्रश्न-लोकेन्द्र सिंह

सर्वसमावेशी  भाषा होना हिन्दी का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। हिन्दी ने बड़ी सहजता और सरलता से, समय के साथ चलते हुए कई बाहरी भाषाओं के शब्दों को भी अपने आंचल में समेट लिया है। पहले से ही समृद्ध हिन्दी का शब्द भण्डार और अधिक समृद्ध हो गया है। हिन्दी ..

आतंकियों के सहयोगी रोहिंग्याइयों के हमदर्द शाही इमाम

बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला पूर्व से ही देश के समक्ष एक चुनौती बन कर खड़ा हुआ है. आसाम और अन्य कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में सामाजिक तानेबाने व स्थानीय शांति व्यवस्था के लिए घातक ख़तरा बन चुके ये घुसपैठिये तमाम प्रकार की आपराधिक व आतंकवादी गतिविधियों में..

गौरी लंकेश हत्याकांड : जवाब माँगते कुछ सवाल

लोकतंत्र और सभ्य समाज में हत्या के लिए किंचित भी स्थान नहीं है। किसी भी व्यक्ति की हत्या मानवता के लिए कलंक है। चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो या फिर लेखक, पत्रकार और राजनीतिक दल का कार्यकर्ता। हत्या और हत्यारों का विरोध ही किया जाना चाहिए। लोकतंत्र कि..

जेएनयू में एबीवीपी नहीं हारी है : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

यहां छात्र संघ चुनाव के आए परिणामों को देखें तो एकदम से ऐसा लगेगा कि जेएनयू के चुनावों में वामदल समर्थक छात्रों ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र प्रत्‍याशियों को हरा दिया। जीत का जश्‍न आज उनके नाम है जो देश में विरोध की राजनीति करते आए ह..

गौरी लंकेश हत्याकाण्ड : विरोध या सियासत- लोकेन्द्र सिंह

वामपंथी पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के बाद देश में जिस प्रकार का वातावरण बनाया गया है, वह आश्चर्यचकित करता है। नि:संदेह हत्या का विरोध किया जाना चाहिए। सामान्य व्यक्ति की हत्या भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। समवेत स्वर में हत्याओं का विरोध किया ज..

डोकलाम के बाद नरेंद्र मोदी की दूसरी जीत चीन के नहले पर मोदी का दहला - भरतचन्द्र नायक

एक संत पुरूष के सात्विक पक्ष हमेशा तिरस्कार का दंश भोगता है। वे जब गांव में निकलते तो उनकी सादगी का मजाक उड़ाया जाता। वे ऐसे लोगों को कुछ प्रसाद, कुछ सिक्के देकर पिंड छुड़ा लेते थे। इस दिन दिनचर्या को सभी देखते और ऐसा करने को प्रोत्साहित होते। कुछ ऐस..

मोदी मंत्रीमण्‍डल में निर्मला सीतारमन का रक्षामंत्री बनना : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

एक निर्णय अप्रत्‍याशित है, कोई यह स्‍वप्‍न में भी उम्‍मीद नहीं कर सकता था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार में निर्मला सीतारमन का प्रमोशन करते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री के तौर पर रक्षा मंत्री अहम जिम्मेदारी सौंपेंगे। किं..

कश्‍मीर ईद पर भी क्‍यों जल रहा है ? - डॉ. मयंक चतुर्वेदी

यह प्रश्‍न इसलिए कि ईद को इस्‍लाम में अमन चैन का त्‍यौहार कहा जाता है, ईद भाईचारे का त्‍यौहार भी है इसके बाद भी कश्‍मीर से कई स्‍थानों पर ईद के दिन भी न भाईचारा नजर आया और न ही अमन चैन, जो दिखाई दिया वह प..

भारत का एनएसजी सदस्‍यता में चीनी अंड़गा खत्‍म होगा : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

पिछले कई वर्षों से भारत सरकार इस कोशिश में लगी है कि भारत भी न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) का हिस्सा बन जाए। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद तो जैसे इस प्रयत्‍न में अत्‍यधिक तेजी आ गई है, किंतु इसके बाद भी पिछले कई सालों में हमें इस सम..

डोकलाम पर भारत की कूटनीतिक जीत : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

डोकलाम विवाद सुलझ गया, वह भी बि‍ना किसी की संप्रभुता को चुनौती दिए बगैर । भारत सरकार की ओर से जो लगातार कूटनीतिक प्रयत्न पिछले दिनों अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर किए गए हैं, जिसमें कि जापान से लेकर अमेरिका तक कई देशों का साथ उसे मिला किंत..

तनाव और जवाब-ज्ञानेन्द्र बरतरिया

डोकलाम विवाद पर चीन शोर मचा रहा है कि भारत ने अपने सैनिकों को वापस नहीं बुलाया तो युद्ध हो जाएगा और भारत को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। दूसरी ओर भारत अपने रवैये पर डटा हुआ है और चीन को सबक सिखाने के लिए चीन से होने वाले आयात की समीक्षा कर रहा है। इसे चीनी श..

ट्रिपल तलाक पर महिलाओं की पहली जीत : डॉ. निवेदिता शर्मा

सर्वोच्च न्यायालय ने की बेंच ने जिस तरह से बहुमत के आधार पर ट्रिपल तलाक पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, उससे यह साफ हो गया है कि भारतीय संविधान किसी भी धर्म से ऊपर, लिंग से ऊपर व्‍यक्‍ति की संवेदनाओं को महत्‍व देता है। संविधान में हम..

भारतवर्ष का सतत प्रवाह - श्री रंगा हरी जी

  वैदिक काल से आज तक भारत राष्ट्र की भारतीय संकल्पना क्या है? इंडिया इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रंगा हरी जी द्वारा व्यक्त किये गए विचार - बहुत से लोग कहते हैं कि राष्ट्रवाद भारत में एक नई अवधारणा है और इसकी उत्पत्ति ब्रिटिश लोगों के आगमन के बाद हुई | यह निश्चित नहीं है | वस्तुतः राष्ट्रवाद की अवधारणा भारत में बहुत प्राचीन है और यह दृढ़ता पूर्वक हमारी संस्कृति में ही अंतर्निहित है। हमें इसके प्रमाण ..

चीन की विस्तारवादी नीति पर भारतीय प्रतिकार : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

डोकलाम क्षेत्र को लेकर चीन के विदेश विभाग की ओर से लगातार जिस तरह के बयान दिए जा रहे हैं, उससे यही लगता है कि चीन किसी भी सीमा तक जाकर इस क्षेत्र पर अपना कब्‍जा जमाने की मंशा रखता है। वह इन दिनों इसी कोशिश में लगा हुआ है‍ कि किसी भी तरह से भारत से धमकाने में सफल हो जाए और अपनी मंशाएं पूरी कर ले। डोकलाम पर पिछले दो माह से चल रहे गतिरोध पर अब चीन कह रहा है कि यदि सीमा पर भारत के बुनियादी ढांचे के खिलाफ हमारी सेना कदम उठाती है तो कोहराम मच जाएगा।..

कोई तो लक्ष्मण रेखा हो – प्रफुल्ल केतकर

  स्वतंत्रता दिवस पर चिंतन  "क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? यह एक ऐसा विचार है जो मुझे सदैव चिंतित करता है | यह चिंता तब और बढ़ जाती है, जब में देखता हूँ की जाति और पंथ के विभेद जैसे हमारे पुराने दुश्मनों के अतिरिक्त अलग अलग विचारों और मान्यताओं वाले तथा एक दूसरे के विरोधी राजनीतिक दलों के रूप में नए दुश्मन और पैदा हो गए हैं । । क्या भारतीय देश को अपने पंथ से ऊपर स्थान दे सकेंगे या फिर पंथ को ही देश के ऊपर मानेंगे? " संविधान स्वीकृति के अवसर पर संविधान सभा में डॉ. बी आर अंबेडकर का अंतिम ..

भाजपा की विजय यात्रा का केंद्र बनते अमित शाह-डॉ मयंक चतुर्वेदी

सत्‍ता और संगठन में एक राजनीतिक पार्टी का अध्‍यक्ष क्‍या मायने रखता है, यह आज किसी को बताने की आवश्‍यकता नहीं है। संगठन मजबूत होगा तो स्‍वत: ही सत्‍ता नतमस्‍तक हो जाती है। इन दिनों यह बात भारतीय जनता पार्टी पर पूरी तरह ख..

नाम बदलने से दिक्कत कब होती है और कब नहीं-लोकेन्द्र सिंह

उत्तरप्रदेश  के प्रमुख रेलवे स्टेशन 'मुगलसराय' का नाम भारतीय विचारक 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय' के नाम पर क्या रखा गया, प्रदेश के गैर-भाजपा दलों को ही नहीं, अपितु देशभर में तथाकथित सेकुलर बुद्धिवादियों को भी विरोध करने का दौरा पड़ गया ह..

अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी जरूरी-सीताराम गुप्ता

हम सब चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़-लिखकर बहुत आगे निकल जायें | हमसे भी आगे निकल जायें | कुछ हमारी इच्छाओं व प्रेरणा के कारण और शेष अपने परिश्रम के बल पर बच्चे सचमुच अपनी पिछली पीढ़ी से आगे निकल जाते हैं | आगे निकलने का अर्थ है कि उनमे कई परिवर्तन भी आ जात..

नेहरु वंश ने किया देश की सुरक्षा से खिलवाड़-तरुण विजय

जनस्मृति बहुत क्षीण होती है | जो कांग्रेसी आज कह रहें हैं कि देश उनकी वजह से आजाद हुआ , उन्हें बताना चाहिए कि उनकी वजह से देश बंटा | आजाद हुआ तो सुभाष चन्द्र बोस भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के कारण जो कभी कांग्रेस के लिए महत्पूर्ण नहीं रहे | 15 अगस्त, ..

देश तो देशवासी बनातें हैं-नीलम महेंद्र

इतिहास केवल गर्व महसूस करने के लिए नहीं होता सबक लेने के लिए भी होता है क्योंकि जो अपने इतिहास से सीख नहीं लेते वो भविष्य के निर्माता भी नहीं बन पाते।“ भारत के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार "मन की बात" कार्यक्रम से पूरे देश से स..

श्री कृष्ण एक राष्ट्रपुरुष -ओमप्रकाश कौशिक

श्री कृष्ण योगिराज यानि योगियों के भी योगी थे | वे राष्ट्रपुरुष और इतिहास-पुरुष के रूप में अद्वितीय हैं | अर्थात श्रेष्ठ पुरुष | भगवान् श्रीराम मर्यादा से बंधे पुरुषोत्तम हैं | कृष्ण का कर्तव्य विराट था | द्वारका से लेकर मणिपुर तक भारत को एकसूत्र में आब..

सहिष्‍णु देश में हामिद अंसारी की असहिष्‍णुता : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

विश्‍वभर में भारत में मुसलमान कितने सुरक्षित एवं सफल हैं यह सदियों से किसी से छिपी बात नहीं है, किंतु इसके बाद भी जब किसी न किसी तरह देश के बहुसंख्‍यक समाज को कटघरे में खड़ा किया जाता है तब अवश्‍य यह यक्ष प्रश्‍न उभरकर आता है कि आखि..

पत्रकारिता में भी 'राष्ट्र सबसे पहले' जरूरी-लोकेन्द्र सिंह

मौजूदा दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समा..

सियासत की विरासत- भरतचन्द्र नायक

"बोए पेड़ बबूल का फूल कहां ते होय" भारतीय लोकतंत्र की महिमा निराली है। यहां दशकों तक एक राजनैतिक दल ने आजादी के जंग में कामयाबी का श्रेय भी लूटा और राजनैतिक एकाधिकार भी जमाया। तब निर्वाचित सरकारे लोकतंत्र के नाम पर भंग भी की जाती रही और समय आने पर आया र..

हिन्दू संस्कृति : व्यष्टि से परमेष्ठी की अविरल यात्रा- नरेन्द्र जैन

अपने देश को छोड़कर शेष दुनिया में समाज जीवन को संचालित करने का आधार कानून है, जबकि हमारे यहां धर्म संचालित समाज जीवन है. सृष्टि संचालन के नियमों को समझने में असफल पश्चिम ने समाज व्यवस्था के लिए कानून का सहारा लिया, जो कृत्रिम व्यवस्था है. रवींद्र ना..

आरएसएस और सामाजिक समरसता : मिथक व तथ्य-अरुण आनंद

लम्बे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के विरोधियों द्वारा यह प्रयास किया गया है कि संघ को एक दलित विरोधी तथा ब्राह्मणवादी संगठन के रूप में प्रस्तुत किया जाए। इन प्रयासों में हाल ही के दिनों में खासी तेजी आई है लेकिन वास्तव में असलियत क्या है ? ..

"बेहयायी हमारे जीवन का प्रधान तत्व नहीं "-अनूप शर्मा

हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म का समीक्षात्मक विश्लेषण  लिपस्टिक_अंडर_माइ_बुरखा फ़िल्म का आकर्षक शीर्षक दर्शाता है कि प्रदर्शन लोलुपता में कितनी शक्ति होती है । पर यहां पर स्त्री विमर्श की आज़ादी के नाम पे ,निरुक्त भावाभिव्यक्ति है !! ""आज़ाद बुनियाद पर टिके खोखले सामाजिक निर्माण में बिकाऊ अश्लीलता का रंग रोगन करने की चेष्ठा असल में ...अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने के प्रतिउत्तर में स्त्रियों को बेसुध मादकता की ओर धकेलने का संदेश दे रही है ,पर ऐसा विचार स्वस्थ संदेश देने की सोच वाला नहीं अपितु ..

बुराइयां तभी तक मुखर हैं जब तक अच्छाइयां मौन है- अनुपमा श्रीवास्तव

आदि काल से नकारात्मक शक्तियों का अस्तित्व रहा।पौराणिक काल में इन्हें दानव, दुष्ट ,राक्षस कहा गया और इन आसुरी शक्तियों पर विजय बुराइयों पर अच्छाइयों की प्रतीक बनी  ।साहित्य तो हमेशा ही वह आवाज़ बना जो शासकों को सही दिशा निर्देश दे , जनहित की ओर प्रे..

क्या भारत शुद्र विरोधी था : एक ऐतिहासिक विश्लेषण

आज भारत में विदेशी पैसे से कई आन्दोलन ऐसे चल रहे हैं जिनका काम सिर्फ दलित और उच्च वर्ग के लोगों के बीच वैमनस्य की भावना को बढ़ाना है l पता नहीं क्यों मगर यह सभी आन्दोलन यह मान कर बैठे हैं के अंग्रेजों द्वारा बनाये गए एस.सी. / एस.टी. ही दलित हैं तथा दलित ही शुद्र हैं | इन सभी आन्दोलनों में गरीब भोले भाले हिन्दुओं को यह बताया जाता है  के तुम शुद्र हो तथा तुम इसलिए गरीब हो क्योंकि भारत के उच्च जाती के लोगों ने तुम पर अत्याचार किये तथा तुम्हारा पैसा लूटा है | इसके बाद बड़ी खूबसूरती से यह एनजीओ ..

प्रेम का पान्‍थिक कुचक्र-डॉ मयंक चतुर्वेदी

प्रेम शब्‍द आनन्‍द की अनुभूति कराता है। प्रेम समर्पण का प्रतीक है। प्रेम का आशय सीधे तौर पर त्‍याग है।  प्रेम प्रतिउत्‍तर में कोई अपेक्षा नहीं करता, वह तो सिर्फ देने में और सतत देते रहने में ही अपना विश्‍वास करता है। प्रेम में त्‍याग का उदाहरण कैसा होता है, इसे सूरदास कुछ यूं समझाते हैं - प्रीति करि काहू सुख न लह्यो। प्रीति पतंग करी दीपक सों आपै प्रान दह्यो।। अलिसुत प्रीति करी जलसुत सों¸ संपति हाथ गह्यो।सारंग प्रीति करी जो नाद सों¸ ..

राष्ट्रीय हितों की हिफाजत पहली बार प्रतिबद्धता बनी-भारतचंद्र नायक

अपने हितों की हिफाजत की प्रतिबद्धता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बोध करती है। चीनी आक्रमण का दौर, साठ के दशक में जब संसद में चीन द्वारा उत्तरी सीमा में किये गये अतिक्रमण की चिन्ता व्यक्त की गई, तपाक से तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने कहा कि हिम..

महागठबंधन हुआ तार तार मोदी हुए और दमदार-प्रवीण दुबे

2019 के लोकसभा चुनावों में गठबंधन के सहारे नरेंद्र मोदी को चुनोती देने का ख्वाब पाले बैठे राजनीतिक खेमों के लिए शायद आज से ज्यादा मनहूस दिन दूसरा न होगा। बिहार का महागठबंधन क्या टूटा वह हसीन सपना भी टूट गया। बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम ने लालू, ममता, माय..

चीन और कम्युनिस्टों की भाषा एक सी-लोकेन्द्र सिंह

पिछले कुछ समय से भारत और चीन के साथ सीमा विवाद गहराया हुआ है। दरअसल, चीन की विस्तावादी नीति के मार्ग में भारत मजबूती के साथ खड़ा हो गया है। चीन सिक्कम क्षेत्र के डोकलाम क्षेत्र में सड़क बनाना चाहता है, जिस पर भारत को बहुत आपत्ति है। यह क्षेत्र भारत, भूटान और चीन को आपस में जोड़ता है। यह स्थल सीमा सुरक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भूटान भी चीन की विस्तारवादी मानसिकता का डटकर विरोध कर रहा है। बहरहाल, सीमा पर भारत के सख्त और स्पष्ट रुख से चीन का मीडिया बौखला गया है। चीनी मीडिया ..

चीन की धौंस बन्दर धुड़की से ज्यादा कुछ नहीं- डॉ किशन कछवाहा

हेकड़ी , तिकड़म और घिंगामस्ती का सहारा लेने वाला चीन इस बात को भली भांति जानता है कि भारत उसके लिए विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है , इसे छोड़ने का वह विचार भी नहीं कर सकता लेकिन उसके भविष्य के सपनों को चकनाचूर करता आत्मनिर्भर होता भारत का भविष्य उसकी एक बड़ी बैच..

जम्मू कश्मीर को भारतीय संविधान के तहत लाने के लिए डॉ.मुखर्जी ने प्राणों की आहुति दी-भारतचंद्र नायक

लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पायी। आजादी के बाद देश में गठित पहली राष्ट्रीय सरकार के अंतद्र्वंद का ही दुष्परिणाम है कि आज कश्मीर की मनोरमवादियां रक्तरंजित हो रही है। काश राष्ट्रीय सरकार में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आव्हान पर शामिल होने वाले उस ..

एक स्वयंसेवक का राष्ट्रपति बनना-प्रवीण गुगनानी'

यूं तो भारत में राष्ट्रपति भवन का अपना एक सुसंस्कृत, विद्वतापूर्ण, व गरिमामय इतिहास रहा है( कांग्रेस के तीन चयन - फखरुद्दीन अली अहमद, ज्ञानी जैलसिंह व प्रतिभा पाटिल के अपवाद छोड़ देवें). भारत के राष्ट्रपतियों व उपराष्ट्रपतियों की इस गौरवशाली परंपरा में अ..

ट्रंप-नमो का सामंजस्य और ड्रेगन की भड़ास-प्रवीण गुगनानी

जून 2016 के अपनें अमेरिका प्रवास के दौरान अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत अमेरिका सम्बंध “इतिहास की झिझक” से बाहर आ गए हैं. इस बार नमो के अमेरिका प्रवास में ट्रंप से भे..

समाज और स्वयंसेवक मिलकर कर रहे गाँवों का कायापलट-डॉ दिनेश जी

ग्राम विकास के लिए नानाजी देशमुख ‘युगानुकूल ग्रामीण पुनर्रचना’ शब्द प्रयोग किया करते थे. प्रकृति संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण आदि गांव से जुड़ीं जो मूलभूत चीजें हैं, उनका संरक्षण ही गांव का विकास है. इसके अलावा कृषि यानी भूमि की उर्वरा शक्ति, जल..

तथाकथित उदारवादी पत्रकारों का पाकिस्तान से गठजोड़ - राकेश कृष्णन सिंह

वामपंथी पत्रकार प्रकृति से, भारतीय उदारवादी और वामपंथी भारत विरोधी और हिंदुद्रोही हैं। वे कहते हैं कि हिंदू धर्म में जातीय उत्पीड़न है, इसलिए वे हिंदुओं से घृणा करते हैं । जबकि वास्तविकता यह है कि वे अपनी मैकाले की पद्धति से प्राप्त शिक्षा के कारण ऐस..

कम्युनिज्म से अध्यात्म की यात्रा-लोकेन्द्र सिंह

"मार्क्स और लेनिन को पढ़ने वाला, लिख-गा रहा है नर्मदा के गीत" ऐसा कहा जाता है- 'जो जवानी में कम्युनिस्ट न हो, समझो उसके पास दिल नहीं और जो बुढ़ापे तक कम्युनिस्ट रह जाए, समझो उसके पास दिमाग नहीं।' यह कहना कितना उचित है और कितना न..

तुष्टीकरण की आग में जल रहे हैं पश्चिम बंगाल के हिंदू-लोकेन्द्र सिंह

रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, सुभाषचंद्र बोस और रविन्द्र नाथ ठाकुर की जन्मभूमि पश्चिम बंगाल आज सांप्रदायिकता की आग में जल रही है। वहाँ हिंदू समुदाय का जीना मुहाल हो गया है। यह स्थितियाँ अचानक नहीं बनी हैं। बल्कि सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल में हिंदू समाज को हाशिए पर धकेला गया है। यह काम पहले कम्युनिस्ट सरकार की सरपरस्ती में संचालित हुआ और अब ममता बनर्जी की सरकार चार कदम आगे निकल गई है।..

भारतीय योद्धाओं के बलिदान ने लिखी इजरायल की आजादी की इबारत-लोकेन्द्र सिंह

पराजय का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने बड़ी सफाई से भारतीय योद्धाओं की अकल्पनीय विजयों को इतिहास के पन्नों पर दर्ज नहीं होने दिया। शारीरिक तौर पर मरने के बाद जी उठने वाले देश इजरायल की आजादी के संघर्ष को जब हम देखेंगे, तब हम पाएंगे कि यहूदियों को'ईश्वर के प्यारे राष्ट्र' का पहला हिस्सा भारतीय योद्धाओं ने जीतकर दिया था। वर्ष 1918 में हाइफा के युद्ध में भारत के अनेक योद्धाओं ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। समुद्र तटीय शहर हाइफा की मुक्ति से ही आधुनिक इजरायल के निर्माण की नींव ..

प्रधानमंत्री जी की इजराइल यात्रा-प्रशांत पोल

मैं तीन बार इजराइल गया हूँ. तीनों बार अलग अलग रास्तों से. पहली बार लंदन से गया था. दूसरी बार पेरिस से. लेकिन तीसरी बार मुझे जाने का अवसर मिला, पडौसी राष्ट्र जॉर्डन से. राजधानी अम्मान से, रॉयल जॉर्डन एयरलाइन्स के छोटेसे एयरक्राफ्ट से तेल अवीव की दूरी मात..

भारत-अमेरिका के नए दौर के संबंध-मयंक चतुर्वेदी

अमेरिका के साथ भारत के राजनीतिक, कूटनीतिज्ञ, सामाजिक और सांस्‍कृतिक संबंध समय-समय पर किस तरह से बदलते रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। इसके बाद भी इतना तय रहा है कि प्रतिभावान भारतीयों के लिए अमेरिका की धरती किसी स्‍वर्ग से कम नहीं रही है। कुछ नकारात्‍मक घटनाओं को छोड़ दिया जाए तो प्राय: जो युवा यहां नौकरी के लिए गए अधिकांश नागरिकता लेकर यहीं बस गए, जो भारत वापिस भी आए या जिन्‍होंने अब तक इन दो देशों के बीच आना-जाना जारी रखा है, वे लगातार भारत को आर्थ‍िक ..

जीएसटी अधूरा ज्ञान या फिर दुष्प्रचार-नीलम महेंद्र

30 जून 2017  भारतीय इतिहास में 8 नवंबर के बाद एक और ऐतिहासिक तारीख़यहाँ 8 नवंबर का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि नोटबंदी काले धन पर प्रहार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था  ( वह कदम कितना सफल हुआ यह एक अलग विषय है)जीएसटी को उसी लक्ष्य को हास..

रामनाथ कोविंद : कम्युनिस्टों के दलित प्रेम का पर्दाफाश-लोकेन्द्र सिंह

बिहार  के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम को सामने कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने एकबार फिर से सबको चौंका दिया है। सबके कयास धरे रह गए। भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक के पहले रामनाथ कोविंद का नाम किसी तरह की चर्चा में भी नहीं था। लेकिन, जब भाजपा की ओर से राष्ट्रपति पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा की गई, तब विपक्ष मुश्किल में पड़ गया। अपने फैसले से सबको चौंकाने ..

देश को आर्थ‍िक नुकसान पहुँचाने वालों पर व्यर्थ की समय बर्बादी : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

अच्छे दिन आने की आस और सब का साथ-सबका विकास का लोकलुभावन नारे ने देखते ही देखते केंद्र में कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी पार्टियों को सत्ता से बाहर और भारतीय जनता पार्टी को सत्ता के सिंहासन पर विराजमान कर दिया था। इसके बाद समय अपनी रफ्तार से चलता रहा और अब तीन साल बीत चुके हैं। यूं, इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश जिस तेजी से आर्थ‍िक, समाजिक, संरचनात्मक, ढांचागत विकास की ओर सरपट दौड़ा है तथा निरंतर आगे की ओर गतिशील है, उतना वह पहले ..

"सेना को बदनाम करने का षड्यंत्र" कम्युनिस्टों का एजेंडा, सेना को करो बदनाम-लोकेन्द्र सिंह

भारतीय सेना सदैव से कम्युनिस्टों के निशाने पर रही है। सेना का अपमान करना और उसकी छवि खराब करना, इनका एक प्रमुख एजेंडा है। यह पहली बार नहीं है, जब एक कम्युनिस्ट लेखक ने भारतीय सेना के विरुद्ध लेख लिखा हो। पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट लेखक पार्थ चटर्जी ने स..

कांग्रेस का एक ही गलती को बार-बार दोहराना ? डॉ. मयंक चतुर्वेदी

यह सर्वविदित है कि जब देश ब्रिटिश संसद द्वारा पारित भारतीय स्वातंत्र्य अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत आजाद हो रहा था तो तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के आधीन भारत को दो भागों में विभाजित करके दोनों भागों को डोमिनियन स्टेट्स प्रदान किया गया था। जिनमें से एक भारत था तो दूसरे का नाम पाकिस्तान था । देशभर की देशी रियासतों को उसी अधिनियम में निहित प्रावधानों के तहत यह अधिकार दिया गया था कि वे दोनों डोमिनियनों में से जिसके साथ जाना चाहें जा सकती हैं या अपने को स्वतंत्र भी रख सखती हैं । उस वक्‍त कुछ को छोड़कर ..

विरोध प्रदर्शन या क्रूरता का प्रकटीकरण-लोकेन्द्र सिंह

पशुओं को क्रूरता से बचाने के लिए केंद्र सरकार के आदेश का विरोध जिस तरह केरल में किया गया, कोई भी भला मनुष्य उसे विरोध प्रदर्शन नहीं कह सकता। यह सरासर क्रूरता का प्रदर्शन था। इसे अमानवीय और राक्षसी प्रवृत्ति का प्रकटीकरण कहना, किसी भी प्रकार की अतिशयोक्त..

सरकार का सरोकार और 3 साल - कल्पेश ठाकुर

मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए हैं। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली थी,तब मोदी कांग्रेस की लुटिया डुबोकर सत्ता के सिंहासन पर काबिज हुए थे। किसी भी पार्टी की सरकार क्यों ना हो आरोप - प्रत्यारोप का ..

नारद दिखाते हैं कल्याणकारी पत्रकारिता की राह-लोकेन्द्र सिंह

पत्रकारिता की तीन प्रमुख भूमिकाएं हैं- सूचना देना, शिक्षित करना और मनोरंजन करना। महात्मा गांधी ने हिन्द स्वराज में पत्रकारिता की इन तीनों भूमिकाओं को और अधिक विस्तार दिया है- लोगों की भावनाएं जानना और उन्हें जाहिर करना, लोगों में जरूरी भावनाएं पैदा करना, यदि लोगों में दोष है तो किसी भी कीमत पर बेधड़क होकर उनको दिखाना। भारतीय परम्पराओं में भरोसा करने वाले विद्वान मानते हैं कि देवर्षि नारद की पत्रकारिता ऐसी ही थी। देवर्षि नारद सम्पूर्ण और आदर्श पत्रकारिता के संवाहक थे। वे महज सूचनाएं देने का ही कार्य ..

नारद मुनि की पत्रकारिता और मानवीयता का दृष्टीकोण- परेश उपाध्याय

आधुनिक मीडिया को देखकर कई बार लगता है कि यह अपने पारंपरिक स्वरूप से निरंतर भटकता जा रहा है। बात चाहे मानवीयता से जुड़े मुद्दों की हो या फिर समाज की ज्वलंत समस्याओं की, इन सभी को लेकर मीडिया की कम होती संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसे में हमारी भारतीय परंपराओं में संचार के माध्यम से समाज को संकट से बचाने वाले देवऋषि नारद का स्वतः ही स्मरण हो जाता है। एक तरफ जहां वर्तमान मीडिया अच्छे और खराब आतंकवाद सहित असली और नकली राष्ट्रवाद पर चर्चा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर नारद जी का संचार एवं पत्रकारिता ..

शहरी नक्सल भारत के 'अदृश्य दुश्मन' - भाग 1

शहरी नक्सल भारत के 'अदृश्य दुश्मन' हैं, उनमें से कुछ को तो पकड़ा जा चुका है, किन्तु अधिकांश आज भी पुलिस राडार के बाहर हैं और भारतीय राज्य व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह फैला रहे है। ये सभी उस तबके में से हैं, जिन्हें शहरी बुद्धिजीवी कहा जाता है | ये प्रभावशाली लोग, नक्सल आन्दोलन की रीढ़ कहे जा सकते हैं, क्योंकि ये ही उनके बौद्धिक रणनीति कार हैं ।इन सभी शहरी नक्सलियों की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि इन्होने सामाजिक मुद्दों के विषय में चिंतित होने का नाटक कर आधुनिक युवा पीढी को अपनी गिरफ्त में लेने का प्रयास ..

विश्व भर के मुस्लिमों को राह दिखाएगा हिंदुस्तानी मुस्लिम

जैसे जैसे तीन तलाक के संदर्भ में नई नई बातें सुनने को मिल रहीं हैं और मुस्लिम व गैर मुस्लिम विश्व में तीन तलाक को लेकर लोग मुखर होते जा रहें हैं. वस्तुतः व्हाट्सएप्प पर तलाक, sms से तलाक, पोस्टकार्ड से तलाक इन विषयों के समाज के सामनें खुलते जाने से यह स्वाभाविक भी है. किन्तु खेद यह है कि जैसे जैसे मुस्लिम महिला जगत में तीन तलाक को लेकर सड़क पर आने की बात क्रियान्वित होती जा रही है वैसे वैसे ही मुस्लिम ला बोर्ड के कर्ता धर्ता अधिक कट्टर रूख अपनाते जा रहें हैं. कभी वह कहता है कि डेढ़ वर्ष में तीन तलाक ..

दर्शन, काव्य और तीर्थाटन के माध्यम से एक विखंडित राष्ट्र को एकजुट करने वाले आदि शंकराचार्य !

आदि शंकराचार्य  शंकर को देखने समझने के दो द्रष्टिकोण हैं | एक तो तथाकथित आधुनिक बौद्धिक वर्ग और दूसरा उनका परंपरागत अनुयायी वर्ग | दोनों वर्ग अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं से दूषित है तथा अपना वर्चस्व पसंद करते हैं | कुछ लोग जो मानते हैं कि इतिहास ही वास्तविकता है, और पौराणिक कथाएं मिथक हैं, झूठी हैं, वे आद्य शंकराचार्य के अद्वैतवाद के खिलाफ हो जाते हैं: “ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या”, अर्थात यह दुनिया, उसके समस्त वैज्ञानिक निष्कर्ष, जिन्हें हम अनिवार्य आवश्यकता मानते हैं, और यहाँ तक ..

आधुनिकता का पर्याय कपड़े नहीं-अनुपमा श्रीवास्तव

किस तरह हम अपने सोच और कर्मों से अधिक कपड़ों से अपना परिचय देने लगे l कपडे तो आवश्यक हैं ही, अच्छी वेशभूषा का महत्त्व भी कम नहीं, लेकिन आज जिस तरह सब आकर ‘कपडा केन्द्रित’ हो गया है l हर दिन फैशन की अंधी दौड़ ने हमारे दिमाग और विवेक को जिस तरह ..

भारत में नक्सलवाद : विचारधारा से विवेकशून्यता तक-शुभ्रता मिश्रा

सुकमा में हाल ही में हुए एक और नक्सली हमले और भारत के जवानों की शहादत की मार्मिक वेदना एक बार फिर सदियों पहले के उस भारत में ले जाती है, जब कभी ब्रिटिश सरकार के अधीन वाले परतंत्र भारत में जंगलों के प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार के लिए एक आदिवासी योद्ध..

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समानता, समता और बंधुता की नई पहल-अरुण कुमार सिंह

 बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जयंती के दिन दिल्ली में सामाजिक समरसता के लिए एक नई पहल हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के इस कदम की बड़ी प्रशंसा हो रही है। आने वाले समय में यह कदम सामाजिक समरसता का सेतु सिद्ध हो सकता है समरसता के लिए आजीवन..

भोग से मुक्ति का मार्ग दिखाता है योग- नीलम महेंद्र

मानव सभ्यता आज विकास के चरम पर है ।भले ही भौतिक रूप में हमने बहुत तरक्की कर ली हो लेकिन शारीरिक आघ्यात्मिक और सामाजिक स्तर पर लगातार पिछड़ते जा रहे हैं। मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग अपने शारीरिक श्रम को कम करने  एवं प्राकृतिक संसाधनों को भोगने के लिए कर रहा है । यह आधुनिक भौतिकवादी संस्कृति की देन है कि आज हमने इस शरीर को विलासिता भोगने का एक साधन मात्र समझ लिया है। भौतिकता के इस दौर में हम लोग केवल वस्तुओं को ही नहीं अपितु एक दूसरे को भी भोगने में लगे  हैं। इसी उपभोक्तावाद संस्कृति के ..

जीवित मनुष्य से बढ़कर हैं नदियाँ-लोकेन्द्र सिंह

माँ गंगा और यमुना के बाद अब नर्मदा नदी को भी मनुष्य के समान अधिकार प्राप्त होंगे। देवी नर्मदा भी अब जीवित इंसानों जैसी मानी जाएगी। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी घोषणा की है। जल्द ही विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर नर्मदा नदी को इंसान का दर्जा दे दिया जाएगा। यह शुभ घोषणा है। इसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन, जीवनदायिनी नदियों को मनुष्य के समकक्ष स्थापित करने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि हमारे ग्रंथों में नदियों का स्थान बहुत ऊँचा है। वेदों में नदियों को माँ ही नहीं,अपितु ..

कौन विष घोल रहा है? - डॉ किशन कछवाहा

रामजस कॉलेज में अंग्रेजी विभाग की ओर से ‘‘कल्चर ऑफ प्रोटेस्ट‘‘ नाम से दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया था । इसमें कुल 18 वक्ताओं के नाम थे जिनमें उमर खालिद और जेएनयू की छात्रा शहला रशीद का भी नाम था । कॉलेज के छात्रों ने प्राध..

पत्थरबाजों का समर्थन करने से बाज आएं नेता-लोकेन्द्र सिंह

सेना के जवानों की पिटाई और उनके साथ बदसलूकी का वीडियो सामने आया, तब देश के ज्यादातर लोग खामोश थे। भारत और भारतीय सेना के लिए जिनके मन में सम्मान है, सिर्फ उन्हीं महानुभावों को वीडियो में अमानवीय हरकतें देखकर दु:ख हुआ। उन्होंने अपने-अपने ढंग से सेना के प्रति अपनी संवेदनाएं प्रकट भी कीं। क्रिकेट में भारत का झंडा बुलंद करने वाले खिलाड़ी वीरेन्द्र सहभाग और गौतम गंभीर ने बहुत ही कठोर प्रतिक्रिया दीं। जम्मू-कश्मीर में सीआरपीएफ के जवानों पर पत्थरबाजों ने जिस तरह लात-घूसे बरसाये, उसे देखकर निश्चिय ही देश ..

भारी पड़ेगी चाल-ज्ञानेन्द्र बरतरिया

'मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था'— मोहनलाल भास्कर की यह आत्मकथा हम में से कई लोगों ने पढ़ी होगी। इस आत्मकथा का एक वाकया ध्यान देने लायक है। मोहनलाल भास्कर को जब पाकिस्तान में ट्रेन से एक शहर से दूसरे शहर ले जाया जा रहा था, तो हर स्टेशन पर भारी ..

समता का विकल्प नहीं, भीमराव अंबेडकर का अमर वाक्य यथार्थ में बदला-भरतचन्द्र नायक

संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान निमात्री समिति में 1949 में अपने भाषण में बताया था कि भारतीय संविधान के निर्माण में भले दो वर्ष ग्यारह माह सत्रह दिन लगे। लेकिन संविधान सभा की 11 बैठकें हुई और इन सत्रों में 6 सत्रों में संविधान के उद्देश्य, मूलभूत अधिकार, संघ की शक्तियों, राज्यों के अधिकार पर विचार के अलावा अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति, जनजातियों के हित में बनी समितियों की अनुशंसाओं पर समग्रता से विचार हुआ। शेष सत्रों में संविधान पर समग्र विचार होने के साथ 165 दिनों में फैले 11 सत्रों ..

बाबासाहेब – एक अनुकरणीय व्यक्तित्व

हिन्दू समाहित जाति व्यवस्था को लेकर बोधिसत्व बाबा साहेब का जिस प्रकार का मुखर विरोध रहा वह किसी से छुपा नहीं है और यह विरोध उनकें द्वारा एक दीर्घ रचना संसार के रूप में प्रकट हुआ है. जाति व्यवस्था को ही लेकर महात्मा गांधी से उनका विरोध भी सर्व विदित है. किन्तु एक वाक्य है उनकें 1916 में लिखे शोध निबंध का जो न केवल उनकें कृतित्व का बोधवाक्य था अपितु जाति व्यवस्था के प्रति उनकें विरोध के पीछे छिपे रचनात्मक, सकारात्मक और विचारात्मक स्वरूप को आमूल प्रकट करता है. उन्होंने उस शोध निबंध के बोध वाक्य के रूप ..

क्या पांच वक्त का नमाजी कट्टर मुस्लिम भी आरएसएस का स्वयंसेवक बन सकता हैं?

अभी अभी विगत दिनों हुए उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा के चुनाव ने कई लोगों की आँखें खोल दीं । आम धारणा के विपरीत, कई मुसलमानों ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पक्ष में मतदान किया। इसमें महत्वपूर्ण योगदान रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवको..

सर्वसमावेशी है हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा-प्रवीण गुगनानी

हाल ही में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को सही बताया तो पुरे देश में जैसे एक वैचारिक द्वन्द छिड़ गयाl वस्तुतः यह कथन(हिन्दू राष्ट्र), यह व्यक्ति(योगी) और यह समय(जबकि देश अपने मूल विचार की ओर लौटने की यात्रा प्रारंभ कर चुका है) तीनों ही बड़े सटीक हैंl भारत भूमि पर विधर्मियों के आक्रमणों, कब्जे व अकूत संख्या में किये गए धर्मांतरण के बाद से ही हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना का विचार इस देश के नागरिकों में जन्म ले चुका था किंतु देश, काल व परिस्थिति के अनुसार इस कल्पना ..

गौ-संरक्षण में गुजरात सरकार का अनुकरणीय प्रयास-लोकेन्द्र सिंह

भारतीय संस्कृति में गाय का बड़ा महत्व है। गाय के साथ इस देश का संबंध मात्र भावनात्मक नहीं है, वरन भारतीय समाज के पोषण में गौवंश का प्रमुख स्थान रहा है। भारत में गाय धार्मिक और आर्थिक, दोनों की बराबर प्रतीक है। यही कारण है कि प्राचीन समय में गौ-धन से सम्प..

"आजकल हर जगह भाषा की गरिमा , उत्कृष्टता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है"-अनुपमा श्रीवास्तव

भाषाई व्याभिचार, अभद्र,  अशिष्ट शब्दों के अतिक्रमण से ,  भाषा की अस्मिता के साथ दुर्व्यवहार।   आजकल हर जगह , हर मंच पर  , हर जगह  भाषा  की गरिमा , उत्कृष्टता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है और बताया जाता है कि हम  "ज़रा हट कर  "हैँ !   जरा हटकर के फंडे को अपनाने वाले लोग समझते हैं कि हम इस प्रतिद्वंदिता के युग में तभी टिक  सकते हैं, जब हम कुछ हटकर करें और ऐसे- ऐसे शब्दों का , असंगत भाषा,  चलताऊ शब्दावली का उपयोग करते हैं,  अपनी बोलचाल ..

यूपी में बूचड़खाना विवाद कितना सही ? : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

हाल ही में उत्‍तरप्रदेश में सम्‍पन्‍न हुए विधानसभा चुनावों के पूर्व सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी घोषणा पत्र के जरिए जनता से सत्‍ता में आने की शर्त पर कुछ वादे किए थे, जिसका मूल था कि सत्‍ता में आने के तुरंत बाद वे उन पर अक्षरस: अमल करेंगे। संयोग से इन वायदों में यूपी की जनता ने भाजपा को अपने लिए मुफीद पाया और उस पर विश्‍वास करते हुए अपना बहुमत भारतीय जनता पार्टी को दे दिया। सरकार बनते ही भाजपा उन्‍हें पूरा करने में लग गई। उनमें फिर महिला सुरक्षा के लिए उठाए जाने ..

“सामाजिक और व्यावहारिक है भारतीय नववर्ष”-रश्मि मुकेश व्यास

हिन्दुस्तान की असली धरोहर है, हिन्दू संस्कृति । हमारी संस्कृति हमें अपने-अपने तरीके से खुशियां मनाने के अवसर प्रदान करती है। हिन्दू धर्म से जुड़े देवी-देवता एवं संत-महात्मा हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। इनके जन्म दिवस, अवतरण दिवस और विवाह द..

शक्ति की साधना में रत ‘भारत’- लोकेन्द्र पाराशर

सर्वविदित है कि नवरात्रि पर्व शक्ति साधना का पर्व हैं। हम भारतीय यह आदि काल से करते भी आये हैं, कर ही रहे हैं, करते भी रहेंगे। परन्तु साधना के केन्द्र में व्यष्टि भाव होने के कारण साधक की चेतना समष्टि स्वरूप में कम ही दिखाई दी। कारण बहुत स्पष्ट है कि हम व्यक्तिगत असुरक्षा की भावना के कारण स्वयं के लिए शक्ति संचय की जुगाड़ से ही बाहर नहीं आ पाये। परिणामतः हमारे व्यापक समाज अर्थात भारत की साख सभी स्तरों पर गिरती रही और शून्य से शिखर तक हम एक-दूसरे को कोसते रहे। हमने स्वामी विवेकानंद के सपनों ..

हिंदू-मुस्लिम एकता की भव्य इमारत खड़ी करने का अवसर-लोकेन्द्र सिंह

भारत के स्वाभिमान और हिंदू आस्था से जुड़े राम मंदिर निर्माण का प्रश्न एक बार फिर बहस के लिए प्रस्तुत है। उच्चतम न्यायालय की एक अनुकरणीय टिप्पणी के बाद उम्मीद बंधी है कि हिंदू-मुस्लिम राम मंदिर निर्माण के मसले पर आपसी सहमति से कोई राह निकालने के लिए आगे आएंगे । राम मंदिर निर्माण पर देश में एक सार्थक और सकारात्मक संवाद भी प्रारंभ किया जा सकता है ।..

कौन हैं मुसलमानों को योगी का डर दिखाने वाले लोग?- लोकेन्द्र सिंह

उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से जिन्हें प्रदेश में मुसलमानों के लिए संकट दिखाई दे रहा है, वे लोग पूर्वाग्रह से ग्रसित तो हैं ही, भारतीय समाज के लिए भी खतरनाक हैं। उनके पूर्वाग्रह से कहीं अधिक उनका बर्ताव और उनकी विचार प्रक्रिया सामाजिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है। योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम समाज के लिए हौव्वा बनाकर यह लोग उत्तरप्रदेश का सामाजिक सौहार्द बिगाडऩा चाहते हैं । योगी आदित्यनाथ सांप्रदायिक हैं, वह कट्टर हैं, मुख्यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा के बाद ..

‘‘यह पब्लिक है: सब जानती है’’-वीरेन्द्र सिंह परिहार

उत्तरप्रदेश में ऐसा क्या हुआ कि सारे सर्वे और एक्जिट पोल फेल हो गए । बात यहीं तक नहीं रुकती, हकीकत में सभी जाति और सम्प्रदाय के समीकरण टूट गए । जैसा कि लोगों का मानना था कि उत्तरप्रदेश में भाजपा को मुस्लिमों का वोट कतई नहीं मिलेगा? पर अधिकांश मुस्लिम-बह..

"कट्टरपंथ की बुरी नजर से कला-संस्कृति को बचाना होगा"- लोकेन्द्र सिंह

  असम  के 46 मौलवियों की कट्टरपंथी सोच को 16 वर्षीय गायिका नाहिद आफरीन ने करारा जवाब दिया है। नाहिद ने कहा है कि खुदा ने उसे गायिका का हुनर दिया है, संगीत की अनदेखी करना मतलब खुदा की अनदेखी होगा। वह मरते दम तक संगीत से जुड़ी रहेंगी और वह किसी..

समरसता के मोती-राकेश सेन

भारत वर्ष में समय समय पर अनेक राष्ट्रपुरुषों ने जन्म लिया है l उन्होंने अपने जीवन काल का सम्पूर्ण समय समाज को सुधारने में लगाया l राजा राममोहन राय से डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर तक सभी राष्ट्र पुरुषों का यही प्रयास रहा है l अधोगति के आखिरी पायदान पर पहुंची ह..

सपा को विपक्ष में बैठकर काम करने का सबक : डॉ. मयंक चतुर्वेदी 

उत्‍तरप्रदेश में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में विधानसभा चुनावों के एक तरफा रुझान आए हैं, उसने इस बार समुचे देश को यही संदेश दिया है कि अब जातिगत आधार पर या धर्म के आधार पर अगला-पिछला की राजनीति नहीं चलेगी। सत्‍ता में बने रहना है तो व..

“अरुणाचल पर चीन का बार-बार दुस्‍साहस नेहरू की देन”-डॉ मयंक चतुर्वेदी

भारत के लिए उसके एक प्रधानसेवक की गलती कितनी भारी पड़ी है, इसका यह एक जबरदस्‍त उदाहरण है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलतियां ऐसी ही रही हैं जिन्हें भारत आज 69 साल बीत जाने के बाद भी लगातार भुगत रहा है। कश्मीर के मुद्दे को यूएन में ले जाने का एलान हो, देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने के स्‍थान पर हिन्‍दू कोड बिल लागू करना, अमेरिका की भारत से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने की पेशकश को ठुकराकर उसमें चीन को शामिल करने का आग्रह हो या तिब्बत पर चीन ..

“राजनीति के बदलते आयाम”-वीरेंद्र सिंह परिहार

प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता में सुधार के लिए केन्द्र सरकार योग्य शिक्षक तैयार करने की दिशा में आधारभूत कदम उठाने जा रही है। इसके लिए मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की तरह एक राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित कराये जाने पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है, ताकि योग्य उम्मीदव..

अरुणाचल पर चीन का बार-बार दुस्‍साहस नेहरू की देन : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत के लिए उसके एक प्रधानसेवक की गलती कितनी भारी पड़ी है, इसका यह एक जबरदस्‍त उदाहरण है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलतियां ऐसी ही रही हैं जिन्हें भारत आज 69 साल बीत जाने के बाद भी लगातार भुगत रहा है। कश्मीर के मुद्दे को यूएन में ले ज..

रामजस पर हल्ला, केरल पर चुप्पी क्यों?-लोकेन्द्र सिंह

रामजस महाविद्यालय प्रकरण से एक बार फिर साबित हो गया कि हमारा तथाकथित बौद्धिक जगत और मीडिया का एक वर्ग भयंकर दोगला है। एक तरफ ये कथित धमकियों पर भी देश में ऐसी बहस खड़ी कर देते हैं, मानो आपातकाल ही आ गया है, जबकि दूसरी ओर बेरहमी से की जा रही हत्याओं पर भी चुप्पी साध कर बैठे रहते हैं । वामपंथ के अनुगामी और भारत विरोधी ताकतें वर्षों से इस अभ्यास में लगी हुई हैं । अब तक उनका दोगलापन सामने नहीं आता था, लेकिन अब सोशल मीडिया और संचार के अन्य माध्यमों के विस्तार के कारण समूचा देश इनके पाखण्ड को देख पा रहा ..

परंपरागत ‘शिक्षा संस्कृति’ के संरक्षण की आवश्यकता”- चेतन कौशल नूरपुरी

यह शाश्वत सत्य है कि हम जैसी संगत करते हैं ,हमारी वैसी भावना होती है l हमारी जैसी भावना उत्पन्न होती है,हमारा वैसा विचार होता है l हमारा जैसा विचार पैदा होता है,हमारा वैसा ही कर्म पैदा होने लगता है और जब हम जैसा काम करते हैं,तब हमें उसका वैसा फल मिलने ल..

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति असहिष्णुता सेकुलरवाद का छद्म-भरतचन्द्र नायक

‘‘सूख हाड़ ले जात सठ स्वान, निरखि मृगराज’’ लंपटीय तासीर सत्ता लोलुपों का स्वभाव आदि काल से व्यवहार में देखा सुना गया । सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित संगठन की प्रेरणा का यहीं जन्म होता है । अंगे्रजों ने बांटो और राज करो की मंशा से भारतीय समाज के विखंडन के बीज बोये । 1925 में राष्ट्र को एकता के सूत्र में गुंथित करने का अनुष्ठान आरंभ हुआ । समय ने करवट ली । भारत को आजादी मिली । लेकिन सत्ता में आने के साथ समाज को फिरकों में बांट कर तुष्टीकरण को परवान चढ़ाना ..

अरुणाचल प्रदेश में घटती हिन्दू आबादी

अरुणाचल प्रदेश में हिंदू जनसंख्या के सन्दर्भ में केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान पर कुछ लोग विवाद खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि उनका बयान एक कड़वी हकीकत को बयां कर रहा है। आश्चर्य की बात यह है कि उनके बयान पर वो लोग हायतौबा मचा रहे हैं, जो खुद को पंथनिरपेक्षता का झंडाबरदार बताते हैं। हिंदू आबादी घटने के सच पर विवाद क्यों हो रहा है, जबकि यह तो चिंता का विषय होना चाहिए। जनसंख्या असंतुलन आज कई देशों के सामने गंभीर समस्या है, लेकिन हमारे नेता इस गम्भीर चुनौती को भी क्षुद्र मानसिकता के साथ देख ..

सेवा भारती की श्रम साधना : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

हिंदू चिंतन या कहें कि प्राचीन सनातन चिंतन के अनुसार सेवा का मतलब निस्वार्थ भाव से, पूजा भाव से, कर्तव्य भाव से उन सभी को सहयोग करना है, जिन्‍हें कि सहायता की आवश्‍यकता है। स्वामी विवेकानंद भी सेवा का यही अर्थ समझाते हैं। वे कहते हैं कि कर्तव्य भाव का होना ही सेवा करना है। दुर्भाग्यवश किसी न किसी वजह से जो लोग पीछे रह गए हैं, उनकी उन्नति के लिये, उन्हें आगे लाने के लिये एक साधन सेवा है। राष्‍ट्रीय स्‍वंयसेवक संघ आज सेवाभारती एवं अपने अन्‍य ..

पाकिस्तान में आधी आबादी पर अत्याचार के अनेक बहाने : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

सरहदें दीवार खींच सकती हैं, लेकिन भावनाओं को बहने से नहीं रोक सकतीं, नहीं तो ऐसा कभी नहीं होता कि पाकिस्‍तान में बैठे बच्‍चों से पूछा जाता है तो वे हिन्‍दुस्‍तान को अपने लिए सबसे अच्‍छा देश बताएं और भारत के बच्‍चों की नजर में पाकिस्‍तान हमारा ही है, हम जैसे लोग ही वहाँ रहते हैं, कहा जाए। इसलिए संवेदना के स्‍तर पर जब कोई भावना से जुड़ी घटना हो जाती है तो दर्द सरहदों की सभी हदें पार कर जाता है । अभी हाल ही में पाकिस्‍तान से एक खबर आई हैं, उसे जब से जाना, लगातार यही ..

"10 फरवरी माघ पूर्णिमा, संत रविदास जयंती" हिन्दू धर्म के आदि रक्षक संत रैदास- प्रवीण गुगनानी

लगभग सवा छः सौ वर्ष पूर्व 1398 की माघ पूर्णिमा को काशी के मड़ुआडीह ग्राम में संतोख दास और कर्मा देवी के परिवार में जन्में संत रविदास यानि संत रैदास को निस्संदेह हम भारत में धर्मांतरण के विरोध में स्वर मुखर करनें वाली और स्वधर्म में घर वापसी करानें वाली प्रारम्भिक पीढ़ियों के प्रतिनिधि संत कह सकतें है l संत रैदास संत कबीर के गुरुभाई और स्वामी रामानंद जी के शिष्य थे l उनकें कालजयी लेखन को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि उनकें रचित 40 दोहे गुरु ग्रन्थ साहब जैसे महान ग्रन्थ में सम्मिलित किये गए हैं l भारतीय ..

"राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सेवा कार्य"-संजय द्विवेदी

समाज में व्याप्त भेदभाव, छूआछूत, को मिटाने के लिए संत रविदास ने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनके आदर्शों और कर्मों से सामाजिक एकता की मिसाल हमें देखने को मिलती है लेकिन वर्तमान दौर में इस सामाजिक विषमता को मिटाने के सरकारी प्रयास असफल ही कहे जा सकते हैं। कहीं-कहीं आशा की किरण समाज क्षेत्र में कार्यरत सेवा भारती जैसे संस्थानों के प्रकल्पों में दृष्टिगोचर होती है। भारत गावों में बसता है, गांवों में आज भी सामाजिक कुरीतियां कम नहीं हुयी हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने छुआछूत को मिटाने का नारा दिया, ..

संस्कारों की प्रथम पाठशाला है परिवार -तुषार कोठारी

वर्तमान समय संस्कारों के क्षरण का समय है l समाज अजीब सी उलझन में है l बच्चों का बचपन डोरेमोन और शिनचैन जैसे अश्लील विदेशी कार्टून कार्यक्रमों से प्रेरित हो रहा है l जन्मदिन पर केक काटकर हैप्पी बर्थडे बोलना मानो वैदिक संस्कार बन चुका है l मोबाइल गेम्स और..

नई पौध की घटती स्वाध्याय वृत्ति-डॉ विकास दवे

“परिवार ही दे सकता है बच्चों को संस्कार और सदसाहित्य पढने की आदत” विगत दिनों इन्टरनेट पर संयुक्त राष्ट्र संघ के एक वैश्विक सर्वेक्षण के निष्कर्ष को पढ़ रहा था l वह सर्वेक्षण बच्चों की पढने-लिखने की आदतों को लेकर हुआ था l निष्कर्ष के शब्दों ने मुझे चौका दिया l आप भी देखिये उस निष्कर्ष को –आज विश्व के समक्ष आतंकवाद से भी बड़ी एक चुनौती आ खड़ी हुई है l हमारी नई पीढ़ी अब केवल “लिसनर” और “दर्शक” बन कर रह गई है l वह “रीडर” ही नहीं बची तो “राइटर” ..