परिशिष्ट

श्री गुरुजी और राजा हरिसिंह की ऐतिहासिक भेंट / 17 अक्तूबर, 1947

15 अगस्त, 1947 का दिन स्वतन्त्रता के साथ अनेक समस्याएँ भी लेकर आया। एक ओर देश-विभाजन के कारण अपना सब कुछ लुटाकर पंजाब और बंगाल से हिन्दू आ रहे थे, तो दूसरी ओर कुछ लोग भारत में ही गृहयुद्ध का वातावरण उत्पन्न कर रहे थे। अंग्रेजों ने जाते हुए एक भारी षड्यन..

हाईफा (इजरायल) के युद्ध में भारतीय सैनिकों की वीरता / 23 सितम्बर – 1918

हाईफा 23 सितम्बर – 1918 :-इस युद्ध में भारतीय सैनिकों की वीरता की कहानी इस्राइली किताबों में पढाई जाती है –अपने देश मे अनजान रहे कुछ भारतीय सैनिको को इजरायल मे सम्मान के साथ याद किया जाता है और उनकी वीरता की कहानी इस्राइली किताबों में पढाई जाती है. हैफा शहर को 1918 के प्रथम विश्व युद्ध में भारतीय शूरवीरों ने जर्मन सेना की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए महज एक घंटे में कब्जा कर लिया था. ऑटोमन यानी उस्मानी तुर्कों की सेनाओं ने हैफा को कब्जा किया था. भालों और तलवारों से लैस भारतीय घ..

निजाम का आत्म समर्पण – हैदराबाद का भारत मे विलय / 17 सितम्बर, 1948

जब १९४७ में भारत आजाद हो गया उसके बाद हैदराबाद की जनता भी भारत में विलय चाहती थी. पर उनके आन्दोलन को निजाम ने अपनी निजी सेना रजाकार के द्वारा दबाना शुरू कर दिया. रजाकार एक निजी सेना (मिलिशिया) थी जो निजाम ओसमान अली खान के शासन को बनाए रखने तथा हैदराबाद को नव स्वतंत्र भारत में विलय का विरोध करने के लिए बनाई थी. यह सेना कासिम रिजवी द्वारा निर्मित की गई थी. रजाकारों ने यह भी कोशिश की कि निजाम अपनी रियासत को भारत के बजाय पाकिस्तान में मिला दे। चारो ओर भारतीय क्षेत्र से घिरे हैदराबाद राज्य की जनसंख्या ..

देशभक्त लाला जयदयाल बलिदान दिवस / 14 सितम्बर, 1858

1857 में जहाँ एक ओर स्वतन्त्रता के दीवाने सिर हाथ पर लिये घूम रहे थे, वहीं कुछ लोग अंग्रेजों की चमचागीरी और भारत माता से गद्दारी को ही अपना धर्म मानते थे। कोटा (राजस्थान) के शासक महाराव अंग्रेजों के समर्थक थे। पूरे देश में क्रान्ति की चिनगारिय..

सरगढ़ी के रणबाँकुरे जब 21 भारतीय जवानो ने 10 हजार अफगानों को रोक लिया / 12 सितम्बर, 1897

यह विश्व के सैनिक इतिहास की एक अनुपम गाथा है. भारतीय जवानों के शौर्य और पराक्रम का अनुपम उदाहरण है. मात्र 21 सिख सैनिको ने दस हजार अफगानों से जमकर मोर्चा लिया और अपने से कई गुना अधिक दुश्मनों को एक इंच भी आगे नहीं बढ़ने दिया. यह घटना 12 सितम्बर 189..

1965 भारत पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना लाहोर तक पहुंची / 6 सितंबर, 1965

छह सितंबर, 1965 को भारत पाकिस्तान के बीच की वास्तविक सीमा रेखा इच्छोगिल नहर को पार करके भारतीय सेना पाकिस्तान में घुस गई। तेजी से आक्रमण करती हुई भारतीय थल सेना का कारवां बढ़ता रहा और भारतीय सेना लाहौर हवाई अड्डे के नजदीक पहुंच गई। यहां एक रोचक वाकया ह..

शक्तिपूजा

“सच पूछो तो शर में ही, बसती है दीप्ति विनय की, संधि-वचन सम्पूज्य उसी का, जिसमें शक्ति विजय की. सहनशीलता, क्षमा, दया को, तभी पूजता जग है, बल का दर्प चमकता उसके पीछे, जब जगमग है..”           &..

श्री हरिमन्दिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के पहले ग्रन्थी “बाबा बुड्ढा जी” की नियुक्ति / 1 सितम्बर, 1604

सिख इतिहास में बाबा बुड्ढा का विशेष महत्त्व है। वे पंथ के पहले गुरु नानकदेव जी से लेकर छठे गुरु हरगोविन्द जी तक के उत्थान के साक्षी बने। बाबा बुड्ढा का जन्म अमृतसर के पास गांव कथू नंगल में अक्तूबर, 1506 ई. में हुआ था। बाद में उनका परिवार गांव रमदास में ..

भारतीय जवानों ने हाजी पीर दर्रे पर तिरंगा लहराया – 28 अगस्त, 1965

उनके पास खाने के लिए सीले हुए शकरपारे और बिस्कुट थे. तेज़ बारिश हो रही थी और मेजर रंजीत सिंह दयाल एक (1) पैरा के सैनिकों को लीड करते हुए हैदराबाद नाले की तरफ़ बढ़ रहे थे. उनका अंतिम लक्ष्य था हाजी पीर पास, जिसको पाकिस्तान और भारत दोनों एक अभेद्य लक्ष्य ..

चित्तौड़ का पहला जौहर : 26 अगस्त,1303

जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए ‘जय हर-जय हर’ कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। ..

संविधान-सभा में वर्तमान ध्वज को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में अपनाया / 22 जुलाई 1947

भारत के राष्ट्रीय ध्वज जिसे तिरंगा भी कहते हैं, तीन रंग की क्षैतिज पट्टियों के बीच नीले रंग के एक चक्र द्वारा सुशोभित ध्वज है। इसकी अभिकल्पना पिंगली वैंकैया ने की थी। इसे १५ अगस्त १९४७ को अंग्रेजों से भारत की स्वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व २२ जुलाई, १९४७ को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की बैठक में अपनाया गया था। इसमें तीन समान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियाँ हैं, जिनमें सबसे ऊपर केसरिया, बीच में श्वेत ..

वीर सावरकर की ऐतिहासिक छलांग / इतिहास स्मृति – 8 जुलाई

अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये भारत के स्वाधीनता संग्राम में वीर विनायक दामोदर सावरकर का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर देश ही नहीं, तो विदेश में भी क्रांतिकारियों को तैयार किया। इससे अंग्रेजों की नाक में दम हो गया। अतः ब्रिटिश शास..

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य में प्रशिक्षण का महत्व

इन दिनों देश भर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षण वर्ग चल रहे हैं। वैसे तो ये वर्ग साल भर में कभी भी हो सकते हैं; पर गरमी की छुट्टियों के कारण अधिकांश वर्ग इन्हीं दिनों होते हैं। 1925 में जब संघ प्रारम्भ हुआ, तो संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार स्वयंसेवकों को सैन्य प्रशिक्षण देना चाहते थे। उनकी सोच थी कि अनुशासन तथा समूह भावना के निर्माण में यह सहायक हो सकता है; पर वे स्वयं इस बारे में कुछ नहीं जानते थे। इसलिए वे अपने सम्पर्क के कुछ पूर्व सैनिकों को बुलाकर रविवार की परेड में यह प्रशिक्षण दिलवाते ..

10 Mayजब क्रान्ति का बिगुल बज उठा (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) / 10 मई -1857

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतवासियों ने एक दिन के लिए भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। आक्रमणकारी चाहे जो हो; भारतीय वीरों ने संघर्ष की ज्योति को सदा प्रदीप्त रखा। कभी वे सफल हुए, तो कभी अहंकार, अनुशासनहीनता या जातीय दुरभिमान के कारण विफलता हाथ लगी। अ..

रामकृष्ण मिशन / स्थापना दिवस – 1 मई, 1897

भारत मे ब्रिटिश राज के समय , ब्रिटिश ईसाई हिन्दू धर्म की कटु निंदा करके हिन्दुओं को ईसाई मत में मतांतरित करने के अभियान में जुटे थे। हिन्दू संतों की निंदा के लिए उन्होंने तर्क दिया कि ये सिर्फ आत्ममोक्ष के लिए तपस्या करते हैं, समाज को इनसे क्य..

कांगला दुर्ग का पतन / 27 अप्रैल – इतिहास स्मृति

1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था। स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे। ..

पेशावर कांड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली / इतिहास स्मृति – 23 अप्रैल

चन्द्रसिंह का जन्म ग्राम रौणसेरा, (जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) में 25 दिसम्बर, 1891 को हुआ था। वह बचपन से ही बहुत हृष्ट-पुष्ट था। ऐसे लोगों को वहाँ ‘भड़’ कहा जाता है। 14 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। उन दिनों प्रथम विश्वयुद्ध प्रा..

दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आ गए – 31 मार्च 1959.

1950 के दशक में चीन और तिब्बत के बीच कड़वाहट शूरु हो गयी थी जब गर्मियों ने तिब्बत में उत्सव मनाया जा रहा था तब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया और प्रशाशन अपने हाथो में ले लिया। दलाई लामा उस समय मात्र 15 वर्ष के थे इसलिए रीजेंट ही सरे निर्णय लेते थे लेकिन..

मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया – 29 मार्च 1857

मंगल पांडे भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत थे। उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज़ शासन बुरी तरह हिल गया। हालाँकि अंग्रेजों ने इस क्रांति को दबा दिया पर मंगल पांडे की शहादत ने देश में जो क्रांति के बीज बोए उसने अंग्रेजी हुकुम..

‘भेद रहित समाज का निर्माण होने वाला है’ – डॉ. मोहन भागवत जी

फिर कोई अन्याय करने वाला खड़ा न होना सके – इसका इंतजाम होना चाहिए. यह सब इसलिए करना है ताकि संपूर्ण समाज एक हो सके. आपस में दुर्भावना बढ़ाने वाली भाषा नहीं होनी चाहिए. फिर व्यवस्था में इस दृष्टि से जो-जो प्रावधान किए जाते हैं, या करने के सुझाव आते ह..

सेनापति आजाद की स्मृति में

पाञ्चजन्य ने सन् 1968 में क्रांतिकारियों पर केंद्रित चार विशेषांकों की शृंखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाओ..