परिशिष्ट

10 Mayजब क्रान्ति का बिगुल बज उठा (प्रथम स्वतंत्रता संग्राम) / 10 मई -1857

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतवासियों ने एक दिन के लिए भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। आक्रमणकारी चाहे जो हो; भारतीय वीरों ने संघर्ष की ज्योति को सदा प्रदीप्त रखा। कभी वे सफल हुए, तो कभी अहंकार, अनुशासनहीनता या जातीय दुरभिमान के कारण विफलता हाथ लगी। अ..

रामकृष्ण मिशन / स्थापना दिवस – 1 मई, 1897

भारत मे ब्रिटिश राज के समय , ब्रिटिश ईसाई हिन्दू धर्म की कटु निंदा करके हिन्दुओं को ईसाई मत में मतांतरित करने के अभियान में जुटे थे। हिन्दू संतों की निंदा के लिए उन्होंने तर्क दिया कि ये सिर्फ आत्ममोक्ष के लिए तपस्या करते हैं, समाज को इनसे क्य..

कांगला दुर्ग का पतन / 27 अप्रैल – इतिहास स्मृति

1857 के स्वाधीनता संग्राम में सफलता के बाद अंग्रेजों ने ऐसे क्षेत्रों को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया, जो उनके कब्जे में नहीं थे। पूर्वोत्तर भारत में मणिपुर एक ऐसा ही क्षेत्र था। स्वाधीनता प्रेमी वीर टिकेन्द्रजीत सिंह वहां के युवराज तथा सेनापति थे। ..

पेशावर कांड के नायक चन्द्रसिंह गढ़वाली / इतिहास स्मृति – 23 अप्रैल

चन्द्रसिंह का जन्म ग्राम रौणसेरा, (जिला पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड) में 25 दिसम्बर, 1891 को हुआ था। वह बचपन से ही बहुत हृष्ट-पुष्ट था। ऐसे लोगों को वहाँ ‘भड़’ कहा जाता है। 14 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह हो गया। उन दिनों प्रथम विश्वयुद्ध प्रा..

दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत आ गए – 31 मार्च 1959.

1950 के दशक में चीन और तिब्बत के बीच कड़वाहट शूरु हो गयी थी जब गर्मियों ने तिब्बत में उत्सव मनाया जा रहा था तब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया और प्रशाशन अपने हाथो में ले लिया। दलाई लामा उस समय मात्र 15 वर्ष के थे इसलिए रीजेंट ही सरे निर्णय लेते थे लेकिन..

मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया – 29 मार्च 1857

मंगल पांडे भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूत थे। उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला से अंग्रेज़ शासन बुरी तरह हिल गया। हालाँकि अंग्रेजों ने इस क्रांति को दबा दिया पर मंगल पांडे की शहादत ने देश में जो क्रांति के बीज बोए उसने अंग्रेजी हुकुम..

‘भेद रहित समाज का निर्माण होने वाला है’ – डॉ. मोहन भागवत जी

फिर कोई अन्याय करने वाला खड़ा न होना सके – इसका इंतजाम होना चाहिए. यह सब इसलिए करना है ताकि संपूर्ण समाज एक हो सके. आपस में दुर्भावना बढ़ाने वाली भाषा नहीं होनी चाहिए. फिर व्यवस्था में इस दृष्टि से जो-जो प्रावधान किए जाते हैं, या करने के सुझाव आते ह..

सेनापति आजाद की स्मृति में

पाञ्चजन्य ने सन् 1968 में क्रांतिकारियों पर केंद्रित चार विशेषांकों की शृंखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्य गाथाओ..