‘गंगाजल’ की पवित्रता पर वैज्ञानिकों ने लगाई मुहर, कहा- इससे बन सकती है टीबी, टायफॉयड की दवा

दिंनाक: 13 Oct 2016 15:57:22

 

Ganga Water

नई दिल्ली: भारतीय वैज्ञानिकों ने भी ताजा शोध में गंगा जल को पवित्र करार दिया है। हिन्दू धर्म में इस नदी का विशेष महत्व है, इसे ब्रह्म नदी कहा गया है। चंडीगढ़ स्थित सीएसआईआर-इन्स्टीच्यूट ऑफ माइक्रोबियल टेक्नोलॉजी (IMTECH) के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में गंगा जल में एक खास तरह का बैक्टिरियोफेजेज वायरस की पहचान की है जो बैक्टिरिया खाता है।

इस शोध ने गंगा जल की चमत्कारिक शक्ति का खुलासा किया है। IMTECH के वरिष्ठ और प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शनमुगम मईलराज ने कहा, “गंगा जल के साफ पानी के गाद में पाए गए मेटाजिनोम-वाइरोम्स के विश्लेषण से यह पता चला कि उसमें जल की पवित्रता बरकरार रखने की अद्भुत क्षमता है। उसमें एक दोहरा डीएनए का कमजोर वायरस भी पाया गया।”

उन्होंने कहा, “यह पहली बार है जब वैज्ञानिकों को एक नए किस्म का वायरस मिला है। यह गंगा के किनारे स्थित घरों के साफ पानी में भी पाया गया है, जिसके बारे में पहले कभी कोई रिपोर्ट नहीं देखी। ये बैक्टिरियोफेजेज कुछ क्लिनिकल जांच में एक्टिव पाए गए हैं। इसे मल्टी ड्रग रेसिस्टेन्ट यानी एमडीआर इन्फेक्शन के खिलाफ इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

डॉ. मईलराज और उनकी टीम के वैज्ञानिकों ने इस तरह के करीब 20-25 वायरस की पहचान की है जिनका इस्तेमाल ट्यूबरोक्लोसिस (टीबी), टॉयफॉयड, न्यूमोनिया, हैजा-डायरिया, पेचिश, मेनिन्जाइटिस जैसे अन्य कई रोगों के इलाज के लिए किया जा सकता है। डॉ. मईलराज ने कहा, “हमारे शोध में बैक्टिरियोफेजेज के कई प्रकार का पता चला है जिनमें कई बैक्टिरियल विशेषताएं हैं।” IMTECH की टीम ने इस शोध के दौरान मानसून से पहले और मानसून के बाद के समय में हरिद्वार से लेकर वाराणसी तक कई सैम्पल जमा किए जिनमें प्रदूषकों की मात्रा काफी ज्यादा थी। ये वैज्ञानिक अब यमुना और नर्मदा के पानी का सैम्पल जमा करेंगे ताकि उनका गंगाजल से तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके।

नवंबर 2014 में जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय ने इस रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए IMTECH को फंड दिया था। IMTECH के अलावा नागपुर स्थित नीरी, नेशनल बॉटेनिकल रिसर्च इन्स्टीच्यूट, इंडियन इन्स्टीच्यूट ऑफ टॉक्सोलॉजी और सेंट्रल इन्स्टीच्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमैटिक प्लांट्स इस रिसर्च प्रोजेक्ट में शामिल थे। इस शोध की पूरी रिपोर्ट सरकार को दिसंबर 2016 तक सौंप दिया जाएगा।

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