प्रो. राजेन्द्र सिंह उपाख्य "रज्जू भैय्या"

दिंनाक: 02 Oct 2016 09:11:38

प्रा. राजेन्द्र सिंह जी की जीवन यात्रा आम आदमी को ईमानदारी, प्रामाणिकता, ध्येयनिष्ठा, कर्मठता के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली है | उनकी जीवन सरिता के दो प्रवाह हैं | पहला अध्यापक और दूसरा संघ कार्यकर्ता | 20 वर्ष की तरुणावस्था में वे प्रयाग विश्वविद्यालय के अध्यापक बने | अपनी क्षमता व योग्यता से वे शीघ्र ही भौतिक विज्ञान विभाग के प्राध्यापक प्रमुख बन गए | 24 वर्ष अध्यापन कार्य करने के पश्चात 44 वर्ष की आयु में स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर अनन्य निष्ठा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य में तल्लीन हो गए |

रज्जू भैय्या की अविचल भारतभक्ति का प्रमाण है उनकी अंतिम इच्छा | उन्होंने कहा था कि जहां मेरा शरीर शांत हो, वहीं मेरा अंतिम संस्कार किया जाए | वह भी मातृभू भारत का ही तो हिस्सा होगा | अकारण शव इधर उधर ले जाने की आवश्यकता नहीं है | उनकी इच्छानुसार वैसा ही हुआ | उनका देहावसान पुणे में हुआ और वहीं के बैकुंठधाम में उनका अंतिम संस्कार किया गया |

रज्जू भैय्या के व्यक्तित्व के बारे में सोचते समय परम पूजनीय गुरूजी का कार्यकर्ता संबंधी विवेचन स्मरण में आता है | “कोयला और हीरा दोनों का मूल धातु ‘कार्बन’ है | कोयला जलता है, और शेष रहती है राख | जलते कोयले को सब दूर से देखते हैं | असहनीय उष्णता के कारण कोई पास नहीं जाता | जबकि हीरा जलता नहीं चमकता है | सब उसके पास दौड़े जाते हैं, उसको हथेली पर रखते हैं, निहारते हैं, अपनाना चाहते हैं | ध्येयवादिता की दृष्टि से कोयला हीरा समान हैं, किन्तु उपगम्यता एवं स्वीकार्यता की दृष्टि से कोयला कोयला है और हीरा हीरा है | कार्यकर्ता को हीरे जैसा होना चाहिए |” हाँ, रज्जू भैय्या सबके उपगम्य हीरा थे |

प्रोफ़ेसर राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी 1922 को श्रीमती ज्वालादेवी (उपाख्य अनंदा) व श्री कुंवर बलवीरसिंह जी के यहाँ उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर जिले के बनैल गाँव में हुआ था | श्री बलवीरसिंह जी स्वतंत्र भारत में उत्तरप्रदेश के प्रथम भारतीय मुख्य अभियंता नियुक्त हुए | अत्यंत शालीन, तेजस्वी और ईमानदार अफसर के नाते उनकी ख्याति थी | पिताजी की सादगी, मितव्ययता और जीवन मूल्यों के प्रति सजगता का विशेष प्रभाव राजेन्द्र सिंह जी पर पडा |

रज्जू भैय्या की प्रारंभिक पढाई बुलंदशहर, नैनीताल, उन्नाव और दिल्ली में हुई | बी.एस.सी. व एम.एस.सी. परीक्षा प्रयाग से उत्तीर्ण की | कोलेज में एक एंग्लोइंडियन से गांधी जी को लेकर वादविवाद हो गया | एंग्लोइंडियन गांधी जी को गलत ठहरा रहा था, जबकि रज्जू भैय्या गांधी जी को सही बता रहे थे | इस पर एंग्लोइंडियन ने उन्हें दो घूंसे लगा दिए | रज्जू भैय्या ने बदला लेना तय किया और व्यायाम शुरू किया | प्रतिदिन दो दो घंटे व्यायाम करते | फिर एक दिन जब पुनः उस एंग्लोइंडियन से विवाद का मौक़ा आया तो उसे एक मजबूत घूँसा जड़ दिया |

रज्जू भैय्या का सम्बन्ध संघ से भले ही 1942 के बाद बना, किन्तु उनका समाज कार्य के प्रति रुझान प्रारम्भ से ही था | जब वे बी.एस.सी. फाईनल में थे तभी 20 वर्ष की आयु में ही बिना उन्हें बताये उनका विवाह तय कर दिया गया | लड़की के पिता सेना में डॉक्टर थे | ये स्वयं लड़की के पिताजी से जाकर मिले तथा उन्हें बताया कि वे अभी विवाह नहीं करना चाहते | बाद में संघ प्रवेश के बाद संघ पर प्रतिबन्ध, सत्याग्रह करने के कारण कारावास के बाद 1949 में जेल से छूटने के बाद उन्होंने अपनी माँ से स्पष्ट कह दिया कि वे विवाह नहीं करेंगे |

वे एम.एस.सी. में विश्वविद्यालय में द्वितीय स्थान पर रहे थे | नोबल पुरस्कार विजेता सी.वी. रामन ने उनकी प्रायोगिक परिक्षा ली और उन्हीं के रामन इफेक्ट पर रज्जू भैय्या के प्रयोग से इतने प्रभावित हुए कि 100 में से 100 अंक दे दिए और आगे शोध के लिए बंगलौर आने का निमंत्रण दे दिया | किन्तु रज्जू भैय्या को शिक्षक बनना था और अपने गुरू प्रो. कृष्णन के साथ रिसर्च करनी थी, अतः उन्होंने प्रयाग नहीं छोड़ा | कोई अन्य विद्यार्थी होता तो प्रो. रामन के प्रस्ताव को ठुकराने के बारे में सोच भी नहीं सकता था |

रज्जू भैय्या ने एक बार प्रो. सी.वी. रामन से पूछा कि “सर आप इतने बड़े भौतिक विज्ञानी होकर प्रतिवर्ष नवागत विद्यार्थियों को वही वही बेसिक बातें बार बार पढ़ाते हैं, तो बोर नहीं होते ? तो उन्होंने कहा था कि ‘Rajendra, when you take interest in every learner opening a new window to the sky of knowledge, you never get tired. You have to admire and enjoy every learner’s spirit of opening to explore.’ महान वैज्ञानिक के शब्दों को आत्मसात करते हुए उन्होंने शिक्षक के नाते अपना जीवन ढाला और सब विद्यार्थियों के प्रिय बने |

 

यदि रज्जू भैया संघ के प्रचारक न निकलते तो निश्चित ही एक बहुत बड़े विख्यात वैज्ञानिक बनते | 1947 में स्वतन्त्रता के बाद डॉक्टर होमी भाभा ने भारत में आणविक शोध को गति देने के लिए तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू से बात की | नेहरू जी ने उन्हें उसकी अनुमति दे दी और कहा जो भी व्यवस्था करना चाहें करें, जो भी उत्तम वैज्ञानिक वे चाहें इस प्रकल्प में ले सकते हैं, बजट की कोई चिंता न करें | इस प्रकल्प के लिए जब डॉ. भाभा ने प्रो. रमन से बात की तो उन्होंने प्रो. राजेन्द्र सिंह जी का उल्लेख करते हुए कहा कि वह प्रतिभाशाली नवयुवक मेरे साथ बेंगलौर आने को तो नहीं माना था किन्तु यदि वह इस प्रकल्प में साथ आ जाए तो उत्तम रहेगा | रज्जू भैय्या को बुलावा भेजा गया, परन्तु वह नहीं माने उन्होंने भाभा से कहा कि मैं सप्ताह में केवल तीन दिन पढ़ाने के लिए देता हूँ, बाकी समय संघ का काम करता हूँ, इससे कम समय मैं समाज को नहीं दे सकता | 6 – 7 दिन प्रति सप्ताह काम करने वाली सरकारी नौकरी मैं नहीं कर सकता | भाभा ने जब यह बात नेहरू जी को बताई कि एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक है जो नहीं मान रहा | नेहरू जी ने कहा कि ऐसी क्या बात है, उसे मुंह माँगी तनखाह की बात करो | इस पर भाभा ने कहा कि पैसे की बात नहीं है, उसके जीवन की प्राथमिकताएं अलग हैं | बाद में जब होमी भाभा गुरूजी से मिले तो उन्होंने कहा कि आपके कारण हमने भारत का एक श्रेष्ठ वैज्ञानिक खो दिया |


रज्जू भैय्या तमाम आकर्षणों को छोड़कर प्रचारक बने थे | सामान्य प्रचारकों से भिन्न वे बड़े घर के बेटे थे | हर सुख सुविधा के आदी थे | संगीत प्रेमी थे, वायलिन उनका प्रिय वाद्य था | लेकिन सब छोड़ दिया और एकनिष्ठ होकर संघ कार्य में रम गए | पिताजी उन दिनों लखनऊ में चीफ इंजीनियर के पद पर थे | माननीय भाऊराव ने लखनऊ संभाग प्रचारक के नाते उनकी नियुक्ति की | उनके पास लखनऊ, सीतापुर और प्रयाग तीन विभाग थे | लखनऊ आने पर रज्जू भैय्या अपने घर पर ही रहे, पिताजी से जब पूछा कि कोई आपत्ति तो नहीं, तो उन्होंने हंसकर कहा, मुझे कोई आपत्ति नहीं, किन्तु सरकारी बंगला है, यहाँ रहकर मित्रों से मिलजुल तो सकते हो, परन्तु कोई मीटिंग न करना |

11 मार्च 1994 को रेशम बाग़ नागपुर स्थित राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ के मुख्यालय डॉ. हेडगेवार भवन के विशाल सभा मंडप में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक का उदघाटन सत्र था | सम्पूर्ण भारत से आये 1000 से भी अधिक प्रतिनिधियों के बीच श्री बालासाहब देवरस ने घोषणा की, “परम पूजनीय श्री गुरूजी ने 1973 में मुझे यह भार सोंपा था | आप सभी के सहयोग से मैंने इसे अभी तक निभाया है, पर स्वास्थ्य की खराबी के कारण अब मेरे लिए प्रवास करना संभव नहीं है | अतः मैंने सभी वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से परामर्श करने के बाद यह निर्णय लिया है कि आज से हम सबके सुपरिचित प्रो. राजेन्द्र सिंह, सरसंघचालक का दायित्व वहन करेंगे | जिस प्रकार आप सभी ने मुझे सहयोग देकर संघ कार्य बढाया है, उसी प्रकार रज्जू भैय्या को भी आपका पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा, यह मुझे विश्वास है | मैं भी एक स्वयंसेवक के नाते जो कुछ बन पडेगा, करूंगा |

सबकी आँखें नम थीं और सब मंच की ओर अपलक देख रहे थे | एक पुष्प गुच्छ और श्रीफल पूज्य बालासाहब ने रज्जू भैय्या को भेंट किया | रज्जू भैय्या ने भी श्रद्धापूर्वक नतमस्तक होकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया और अपने संक्षिप्त उद्बोधन में सभी से सहयोग और शुभाशीष की कामना की |

यह दायित्व ग्रहण करने के बाद छः वर्ष तक उन्होंने देश विदेश का प्रवास करते हुए इस गुरुतर भार को सम्भाला | किन्तु खराब स्वास्थ्य के कारण सन 2000 में उन्होंने यह उत्तरदायित्व माननीय सुदर्शन जी को सोंप दिया | इस अवसर पर उनके उदगार थे, “स्वयंसेवक के नाते मैं पहले की तरह सारे कार्य तत्परता पूर्वक करता रहूँगा, और यही अंतिम इच्छा है कि अपने प्रिय संघकार्य की वृद्धि व विकास में आख़िरी सांस तक योगदान कर सकूं |”

भूतपूर्व प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह भी उनके शिष्य रहे, उन्होंने अपनी श्रद्धांजली में बताया कि किस प्रकार रज्जू भैय्या ने अरुचिकर विषय को भी रुचिपूर्ण बनाया था | कई लोगों ने रज्जू भैय्या को “Teacher par excellence” कहा है, उनके विभाग में न हों तो भी विद्यार्थी केवल उनको सुनने के लिए उनकी कक्षा में बैठते थे | वे अपने सहयोगियों को कहते थे, “एक अध्यापक की लापरवाही से सैंकड़ों जीवन नष्ट होते हैं, “Don’t destroy the life of others”

उनके साथ काम कर चुके प्रयाग के एक स्वयंसेवक बताते हैं, “1945 के संघ शिक्षा वर्ग की बात है, मैं बहुत बीमार हो गया, पता चला रेड फीवर (scarlet) है, एक इंजेक्शन की आवश्यकता है, पर बहुत महँगा और दुर्लभ है, आसपास के सभी नगरों में पता किया पर मिला नहीं, पर रज्जू भैय्या निराश होने वाले नहीं थे, खोज जारी रखी, आख़िरकार श्री रामकृष्ण सेवाश्रम में इंग्लेंड से आयातित इंजेक्शन मिल गया, तीन दिन तीन रात रज्जू भैय्या ने आँखों ही आँखों में बिता दी | विविध व्यस्तताओं के मध्य भी मेरा पूरा ध्यान रखा |” अपने हर स्वयंसेवक, कार्यकर्ता के बारे में चिंता करने और स्नेह रखने वाली वृत्ति के बारे में स्वयंसेवक आगे बताते हैं कि, माता पिता की सेवा तथा दो छोटे भाईयों की शिक्षण व्यवस्था के लिए प्रचारक जीवन से वापस जाने की अनुमति माँगी, तो रज्जू भैया ने दायित्व मुक्त तो किया ही, मेरी कठिनाई को ध्यान में रखकर एक विद्यालय में अध्यापक की नौकरी भी दिलवा दी |

उनके स्नेहमय और उपकारी स्वभाव के बारे में श्री रामगोपाल संड अपना अनुभव बताते हैं कि “1994 में मेरी बेटी को ब्लड केंसर हो गया | क्रिश्चन मेडीकल कोलेज बेल्लोर में इलाज चल रहा था | इलाज में आठ लाख रुपये का खर्च आ रहा था, जिसमें पांच लाख रुपये तो अग्रिम जमा करने थे | मेरे द्वारा इतने पैसों की व्यवस्था करना संभव नहीं था | मैंने दुखी मन से परिस्थिति की जानकारी रज्जू भैय्या को दी | मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब मेरे पास देश के ख्यातनाम नेताओं के सहयोगात्मक फोन आने लगे, जिनमें से दो तो अपने अपने राज्य के मुख्यमंत्री थे | यह उन्हीं की परदुखकातरता के कारण संभव हुआ |

 

परदुखकातरता इतनी थी कि किसी के भी कष्ट को दूर करना वे अपना कर्तव्य मानते थे | स्वामी चिन्मयानंद जी ने ऐसी ही एक घटना का वर्णन किया | “एक बार मैं उनके साथ विक्रमशिला एक्सप्रेस से भागलपुर जा रहा था | हम दोनों की नीचे की आमने सामने की बर्थ थी | रात को हम लोग साथ ही सोये किन्तु जब सुबह आँख खुली तो देखा उनकी बर्थ पर एक बालक सोया हुआ है और वे एक कोने में बैठे हैं | जब मैंने उनसे जानना चाहा तो उन्होंने मुंह पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा किया कि कहीं सोते हुए बालक की नींद ना टूट जाए | हुआ यूं था कि रोज की तरह जब वे सुबह चार बजे नित्यक्रिया के लिए टॉयलेट गए तो देखा कि दरवाजे पर 9 – 10 वर्ष का एक बालक हेंडिल पकड़कर पायदान पर पैर रखकर सिकुड़ा हुआ यात्रा कर रहा है | उन्होंने उसे भीतर बुलाकर चुपचाप अपनी बर्थ पर सुला दिया | मार्ग में कार्यकर्ता उनके लिए दूध लेकर आये तो थर्मस खोलकर पहले उस बालक को पिलाया | जब पटना में कार्यकर्ता उनसे मिलने आये तो बालक को उनके सुपुर्द कर निर्देश दिया कि बालक को सुरक्षित उसके घर पहुंचा दें |

रज्जू भैय्या की स्मरण शक्ति अद्भुत थी | एक बार जब स्वामी चिन्मयानंद उनसे मिलने झंडेवालान संघ कार्यालय जाने को तैयार हो रहे थे, उत्तर प्रदेश पुलिस के एक सेवा निवृत्त अधिकारी श्री आर.बी. सिंह स्वामीजी से मिलने आये | यह जानकर कि वे रज्जू भैय्या से मिलने जा रहे हैं, उन्होंने बताया कि वे रज्जू भैय्या के विद्यार्थी रहे हैं, अतः वे भी उनसे मिलना चाहते हैं | जैसे ही ये लोग केशवकुंज पहुंचे, इन्हें देखकर रज्जू भैय्या एकदम से बोले, अरे रणबहादुर तुम कब आये ? उनके इतना कहते ही रणबहादुर की आँखों में आंसू आ गए | रुंधे कंठ से बोले मैं तो बीस वर्ष बाद आपसे मिल रहा हूँ, फिर भी आपने पहचान लिया | रज्जू भैय्या बोले, अपनों को क्या कभी भूला जा सकता है, तुम तो मेरे छात्र रहे हो |

श्री हो.वे. शेषाद्री जी लिखते हैं कि “मैंने 15 वर्ष उनके साथ कम किया, सरसंघचालक, सरकार्यवाह, सहसरकार्यवाह, पर उनके व्यवहार में उन्होंने कभी कोई अंतर नहीं आने दिया, अपने सहयोगी के साथ मित्रता के व्यवहार का उनमें अद्भुत गुण था |”

माननीय मोहनराव जी भागवत ने अपने विदर्भ प्रान्त प्रचारक काल का एक अनुभव लिखा है कि नागपुर प्रवास के दौरान रज्जू भैय्या अत्यधिक बुखार से पीड़ित थे | उन्होंने स्वयं नहीं बताया किन्तु हाथ लगाने से मालूम पडा | पूछने से पता चला कि ऐसा दो तीन दिन से चल रहा है | इसके बाद भी बोले “कार्यक्रम स्थगित मत करना, बैठकर बोलना ही तो है, शारीरिक थोड़े ही करना है | जब चल रहा हूँ, खाना खा रहा हूँ, तो बोल भी सकता हूँ | वे लक्ष्य को आगे रखते थे, स्वयं को पीछे | सभी समाज में अच्छाई देखते हुए, सभी को साथ लेकर चलना, और स्वयं को लक्ष्य के पीछे रखना, ये दो मूल बातें प्रत्येक स्वयंसेवक में होनी चाहिए |”

पुणे कार्यालय में ग्रंथपाल के रूप में कार्यरत श्री नाना नेउरगाँवकर स्वान्तःसुखाय ज्ञानेश्वरी और दासबोध हाथ से लिखते थे | पूरे होने के बाद उन्होंने ये ग्रन्थ रज्जू भैय्या को दिखाए | उन्होंने नाना को प्रोत्साहित किया और कहा कि इनका तो सार्वजनिक विमोचन होना चाहिए | नाना ने संकोच से कहा कि रज्जू भैय्या यह तो मैंने अपने लिए लिखा है, इसमें क्या ख़ास है | किन्तु रज्जू भैय्या नहीं माने | उसी कार्यालय में एक छोटा सा ग्रन्थ प्रकाशन का कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें ज्येष्ठ प्रचारक व कार्यकर्ता उपस्थित रहे | सहभोज का भी कार्यक्रम संपन्न हुआ |

रज्जू भैय्या अत्यंत साहसी प्रवृत्ति के थे | गांधी हत्याकांड के बाद संघ पर लगे प्रतिबन्ध के दौरान सत्याग्रह संचालन की एक गोपनीय बैठक श्री लक्ष्मीकांत उपाध्याय के घर उपाध्याय खेड, मसकनवां में आयोजित थी | मसकनवां से 10, 12 कार्यकर्ता घोड़ों पर रज्जू भैय्या को लेकर गाँव की ओर चले | रज्जू भैय्या जिस घोड़े पर सवार थे, वह कुछ देर तक तो ठीक चला, परन्तु फिर वह भयानक रूप से हिनहिनाकर अपने पीछे के पैरों पर खडा हो गया और रज्जू भैया को गिराने का प्रयत्न करने लगा | सबकी हालत खराब हो गई | किन्तु रज्जू भैय्या ने सबको आवाज देकर हिम्मत बंधाई और कहा कि अगर मैं इस घोड़े को ठीक नहीं कर सकता तो समाज को कैसे करूंगा | रज्जू भैय्या लगाम थामकर जमकर घोड़े पर बैठ गए | खाली खेतों और रास्तों पर घोड़ा हवा से बातें करने लगा | अंत में थकहारकर वह उनका आज्ञाकारी बन गया | तब पहली बार पता चला कि रज्जू भैय्या इतनी अच्छी तरह घुड़सवारी कर लेते हैं |