ग्वालियर संघ गाथा

दिंनाक: 30 Oct 2016 10:17:48

ग्वालियर संघ गाथा

पृष्ठभूमि -

आज़ादी के पूर्व ग्वालियर विभाग देसी रियासत के अधीन होने के कारण यहाँ कांग्रेस का काम सार्वजनिक सभा के नाम से चलता था | उसी के माध्यम से स्वतन्त्रता प्राप्ति के अखिल भारतीय आन्दोलन से यहाँ की जनता जुड़ पाई थी | उज्जैन से पंजीकृत यही सस्था यहाँ कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करती थी |  सार्वजनिक सभा के ग्वालियर में प्रमुख कर्णधार थे वैद्य मुरलीधर विनायक धुले, त्रिम्बक राव गोखले, डा. सदानंद गुप्ता, श्यामलाल पाण्डवीय, और भिंड में रघुवीर सिंह कुशवाह, हरकिशन भूता आदि | सार्वजनिक संस्था के समानांतर राजभक्त लोगों ने ग्वालियर राज्य प्रजामंडल के नाम से संगठन बनाया हुआ था | प्रजामंडल के प्रमुख नेता थे रामजीदास वैश्य, रामेश्वर वैद्य आदि |

हिन्दू महासभा का कार्य लगभग सम्पूर्ण ग्वालियर राज्य में काफी प्रभावी था | इसको महाराज ग्वालियर का भी समर्थन प्राप्त था | प्रवास के दौरान इसके अखिल भारतीय नेता महाराज के अतिथि होते थे | हिन्दू महासभा के ग्वालियर में प्रमुख नेताओं में थे डा. दत्तात्रय सदाशिव परचुरे, डा. किशोर, सुधीर शर्मा, राम अवतार शर्मा, बाबूराम दीक्षित आदि | सम्पूर्ण देश की भांति मुस्लिम समाज यहाँ भी मुस्लिम लीग के प्रभाव में "लेकर रहेंगे पाकिस्तान" के नारे बुलंद कर रहा था | वकील अंसारी तथा अमानुल लीग के प्रमुख नेता थे | सामाजिक क्षेत्र में आर्य समाज, हरिजन सेवा संघ व सनातन धर्म मंडल सक्रिय थे |

कांग्रेस के प्रति राजवंश की नाराजगी थी | ब्रिटिष हुकूमत के खिलाफ पर्चे बांटने बाले एक बालक ने तत्कालीन प्रमुख कांग्रेसी नेता श्यामलाल पाण्डवीय का नाम लिया | इस आधार पर श्री पाण्डवीय पर मुकदमा चलाया गया | मुरार निवासी श्री कन्हैयालाल गुप्त उस समय मजिस्ट्रेट थे | उन्होंने निर्भीक भाव से उपयुक्त साक्ष्य के अभाव में श्री पाण्डवीय को दोषमुक्त कर दिया | महाराजा सिंधिया ने इस पर नाराज होकर उन्हें सरदारपुर जिला झाबुआ स्थानांतरित कर दिया, जो उन दिनों कालापानी जैसा माना जाता था | बाद में तत्कालीन नरेश जीवाजीराव सिंधिया के विवाह के अवसर पर मजिस्ट्रेट साहब को इस स्थान से शिवपुरी नियुक्त किया गया |

संघ कार्य का प्रारम्भ -

संघ संस्थापक डाक्टर जी के आदेश पर अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने बाले विदर्भ अकोला के श्री नारायण राव तरटे ने सर्व प्रथम ब्वालियर में संघ कार्य की आधार शिला रखी | जब वे ग्वालियर आये तब वे यहाँ से पूर्णतः अपरिचित थे | कष्ट सहिष्णुता की पराकाष्ठा, कुशलता वा द्रढता से उन्होंने यहाँ संघ कार्य प्रारम्भ किया | वे यहाँ १९३७ से १९४३ तक रहे | पूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई उनके कार्यकाल में ही स्वयंसेवक बने | वे तरटे जी को आत्मीयता से मामू संवोधन देते थे | १९४३ में तरटे जी को पीलीभीत उत्तर प्रदेश संघ कार्य की दृष्टि से भेजा गया तथा यहाँ एक अन्य प्रचारक श्री प्र.ग.सहस्त्रबुद्धे की नियुक्ति हुई |

१९४९ तक संघ कार्य का संचालन उत्तर प्रदेश से होता था | स्वतन्त्रता के पूर्व तक ग्वालियर रियासत के ७ जिले मुरैना, भिंड, ग्वालियर, शिवपुरी, गुना, श्योपुर, विदिशा तथा बुंदेलखंड के झांसी जालौन, हमीरपुर और बांदा को मिलाकर ग्वालियर विभाग बनाया गया था | बाद में गुना और विदिशा को मालवा के साथ जोड़ दिया गया था | यद्यपि ग्वालियर राज्य की सीमा में उज्जैन, शाजापुर, मंदसौर सरदारपुर आदि भी आते थे किन्तु संघ रचना में इन्हें ग्वालियर विभाग में समाहित नहीं किया गया था |

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद जब शासकीय मध्य प्रदेश का गठन हुआ, तब ग्वालियर विभाग की पुनर्रचना की गई | जिसमें ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी और गुना जिले शेष रहे और बह मध्य भारत का अंग बना | बुंदेलखंड के दतिया जिले को भी इसमें जोड़ा गया | इसके बाद समय समय पर कार्य की आवश्यकता को देखते हुए विभाग की रचना में परिवर्तन होते रहे | सन १९८० में गुना और शिवपुरी जिले को ग्वालियर से प्रथक कर शिवपुरी विभाग की रचना की गई | ग्वालियर को महानगर का दर्जा दे आसपास के ग्रामीण क्षेत्र ग्वालियर गिर्द, डबरा, घाटीगांव और भितरवार चार तहसीलों का डबरा जिला बनाया गया | इस प्रकार विभाग में ५ जिले हो गए | भिंड, मुरैना, ग्वालियर महानगर, दतिया तथा डबरा | वर्ष १९८९ में पुनः रचना में परिवर्तन किया गया | महानगर तथा डबरा को ग्वालियर विभाग तथा शेष जिलों को चम्बल विभाग (भिंड) के नाम से जाना जाने लगा | किन्तु जुलाई १९९३ में पुनः दोनों विभागों को मिलाकर एक कर दिया गया | २००७ में प्रथक मुरैना विभाग बना तथा ग्वालियर विभाग में पुनः ग्वालियर तथा डबरा जिले शेष रहे |

संघ दृष्टि से वर्तमान में विभाग में ग्वालियर, लश्कर तथा डबरा तीन जिले हैं | 

ग्वालियर विभाग में प्रारम्भ से रहे विभाग संघ चालक, विभाग कार्यवाह तथा विभाग प्रचारकों के नाम क्रमशः निम्नानुसार अंकित हैं -

विभाग संघ चालक -

(१) मा. राम रतन तिवारी (२) मा. श्रीकृष्ण त्र्यम्बक काकिर्ड़े (३) मा.त्रम्ब्यक बालाभाऊ केलकर 

विभाग कार्यवाह -

(१) श्री शंकर विनायक बेलापुरकर (२) श्री कप्तान सिंह सोलंकी (३) श्री राधेश्याम गुप्ता 

विभाग प्रचारक -

(१) श्री नारायण राव तर्टे (२) श्री प्र.ग.सहस्त्रबुद्धे (३) श्री मोरेश्वर गर्दे (४) श्री मिश्रीलाल तिवारी (५) श्री लक्ष्मण राव तराणेकर (६) श्री कृष्ण मुरारी मोघे (७) श्री माखन सिंह चौहान (८) श्री अरुण जैन (९) श्री अनिल ओक (१०) श्री प्रवीण गुप्त (११) श्री जगराम सिंह (१२) श्री खगेन्द्र भार्गव

ग्वालियर के संघ कार्यालय -

लम्बे समय तक प्रथक कार्यालय ना होने के कारण प्रचारक किराए के जिस मकान में रहते बही संघ कार्यालय हो जाता था | तरटे जी प्रारम्भ में पोतनीस साहब की धर्मशाला में रहे | तत्पश्चात एक अन्य स्वयंसेवक श्री वासुदेव भागवत के साथ दो रुपये मासिक किराए पर उदाजी की पायगा में रान्गणेकर के मकान में रहे | यह किराया भी श्री भागवत ही देते थे | इसके बाद फालके बाज़ार स्थित फालके साहब के हाथीखाने में निमगांवकर के मकान की तीसरी मंजिल स्थित दो कमरों को किराए पर लिया गया | जिसमें से एक तरटे जी का आवास बना तो दूसरे को एक छोटा सा पुस्तकालय बनाया गया | इसके बाद जनकगंज में श्री भेलसेबाले के मकान में किराए का स्थान लिया गया | तब इसका मार्ग जनक गंज स्कूल के सामने से ना होकर छतरी बाज़ार बाली गली में से था | तरटे जी के पीलीभीत जाने के बाद भैयाजी सहस्त्रबुद्धे के पास होने बाले स्वयंसेवकों के जमघट से मकान मालिक को शिकायत होने लगी | अतः बह स्थान खाली कर नई सड़क स्थित बालासाहब राजबाड़े के मकान का बाहरी भाग किराये पर लिया गया | यहाँ दो बड़े कमरे थे | एक कमरा ऊपर की मंजिल पर भी था, जहां आवश्यकता होने पर भोजन भी बना करता था | बाड़े में एक छोटा मैदान भी था | कार्यालय की व्यवस्था उज्जैन के एक स्वयंसेवक श्री मदन मोहन दुबे ने देखना प्रारम्भ किया | वे महाविद्यालय में अध्ययन करने आये थे और कार्यालय में ही रहते थे | भिंड से पढ़ने आये कुछ स्वयंसेवक भी इस कार्यालय में रहते थे | संघ पर लगे पहले प्रतिवंध की समाप्ति तक यही स्थान कार्यालय के रूप में प्रयुक्त होता रहा |

प्रतिवंध हटने के बाद पुराने हाईकोर्ट के सामने विप्रदास के बाड़े की दूसरी मंजिल किराए पर ली गई | यहाँ पांच छोटे बड़े कमरे तथा दो विशाल छतें थीं, जिन पर काफी बड़ी संख्या में स्वयंसेवक एकत्रित हो सकते थे | यह स्थान काफी लम्बे समय तक संघ की गतिविधियों का केंद्र बना रहा | नगर के मध्य में होने के कारण तथा आवागमन के साधनों की सहज उपलव्धता के कारण यह मकान काफी सुविधाजनक था | संघ कार्य के विस्तार और आवश्यकता को देखते हुए स्वयं का कार्यालय बनाने का निर्णय लिया गया और नई सड़क पर माधव महाविद्यालय के सामने सरदार राजबाड़े साहब तथा श्री विष्णू भागवत के परस्पर सटे हुए भवनों को क्रय किया गया | संघ से प्रभावित राजबाड़े साहब ने पूरी राशि के भुगतान के पूर्व ही भवन का पंजीकरण स्वयंसेवकों द्वारा गठित राष्ट्रोत्थान न्यास के नाम पर कर दिया | शेष राशि बाद में किश्तों में चुकाई गई | 

राजबाड़े साहब बाले भाग में छोटे बड़े डेढ़ दर्जन कमरे, अनेक दालान, कई बरामदे व दो कुंए थे | किन्तु बहां कई किरायेदार भी वर्षों से जमे हुए थे | बड़ी जद्दो जहद के बाद उच्च न्यायालय के आदेश से भवन का कब्जा मिल पाया और तब संघ कार्यालय को विप्रदास के बाड़े से यहाँ स्थानांतरित किया गया | किन्तु तब तक श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश पर आपात काल थोपने के साथ संघ पर भी प्रतिवंध लगा दिया |और प्रशासन ने इस भवन को संघ कार्यालय होने के कारण सील कर दिया | राष्ट्रोत्थान न्यास ने संघ के स्थान पर इसे स्वयं की संपत्ति होने की दलील के साथ उच्च न्यायालय में चुनौती दी | न्यायालय ने प्रशासन की कार्यवाही को अवैधानिक मानते हुए भवन पर से सरकारी नियंत्रण हटाने के आदेश दिए | सन १९९८ में पुराने भवन के स्थान पर स्वयंसेवकों के सहयोग से सर्व सुविधायुक्त नया कार्यालय भवन निर्मित हुआ | अब यह ग्वालियर विभाग के संघ कार्य की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है |

संघ शिक्षा वर्ग -

१९४१ तक संघ के तीनो वर्षों के प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन केवल नागपुर में ही हुआ करता था | ग्वालियर में सर्व प्रथम माधव चिंतामणि वाघ, बाबा रेटरेकर, दत्तात्रय त्रम्ब्यक कल्याणकर और प्रभाकर नारायण पेंढारकर ने १९३९ में नागपुर से प्रथम वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया | तब से संघ शिक्षा वर्ग करने बाले स्वयंसेवकों का क्रम सतत जारी है | १९४२ से देश के अन्य भागों में संघ शिक्षा वर्ग आयोजित होने लगे और स्वयंसेवक भी वाराणसी, लखनऊ, अजमेर  वा भरतपुर संघ शिक्षा वर्गों में सम्मिलित हुए |