राजगढ़ संघ गाथा

दिंनाक: 30 Oct 2016 11:36:37

मध्य प्रदेश बनने के पूर्व राजगढ़ अनेक देसी रियासतों में बंटा हुआ था, जिनमें प्रमुख थी - नरसिंहगढ़, राजगढ़, खिलचीपुर तथा होलकर रियासत | संघ कार्य योजना में प्रथक विभाग बनने के पूर्व तक राजगढ़ जिला उज्जैन विभाग में समाहित था | प्रथक विभाग बनने पर उज्जैन विभाग के इस जिले में भोपाल विभाग के सीहोर जिले को जोड़ा गया तथा राजगढ़ की तहसील व्याबरा को रचना में जिला मान्य किया गया |

संघ कार्य का प्रारम्भ और विस्तार -

राजगढ़ में सन १९४४ में भाऊसाहब इन्दूरकर जिले के प्रचारक नियुक्त हुए और जिले में संघ कार्य का श्री गणेश हुआ | रियासत काल होने के कारण उस समय किसी भी बाहरी व्यक्ति के आने पर निगरानी रखी जाती थी | कहीं किसी संगठन के गठन की दृष्टि से कोई आये, तो यह निगरानी और गहन हो जाती थी | इसी कारण प्रारम्भ में इंदुरकर जी को भी पुलिस द्वारा की जाने बाली पूछताछ का बार बार सामना करना पड़ा | इस सबके चलते स्वतंत्र रूप से काम करने में अत्यंत कठिनाई आ रही थी | इस असुविधा से बचने के लिये अंततः इन्दोर में एक बेंक के मेनेजर श्री काका टकले जी का पत्र रियासत के दीवान साहब के नाम लाया गया | दीवान साहब तथा टकले जी का पूर्व परिचय होने से इंदुरकर जी का पीछा पुलिस से छूट पाया | राजगढ़ की पहली शाखा रामलीला मैदान में लगती थी | | सर्व श्री गोविन्द बल्लभ त्रिपाठी, प्रीतमलाल जोशी, चुन्नीलाल मौर्य, लक्ष्मीनारायण प्रजापति, श्रीनाथ गुप्ता और शंभू दयाल सक्सेना आदि प्रारम्भिक स्वयंसेवक थे |

सन १९४४ में ही श्री कमलाकर शुक्ला को जीरापुर का प्रचारक नियुक्त किया गया | उन्होंने अपनी संगठन कुशलता से जीरापुर के गाँव गाँव तक संघ को पहुंचाया | इसका प्रमाण यह है कि सन १९४६ के विजयादशमी उत्सव की उपस्थिति २००० रही थी |

खुजनेर की शाखा यहीं के मूल निवासी श्री हरिनारायण टेलर ने शुरू की थी | वे अक्सर अपने निजी कार्य से सारंगपुर जाया करते थे | बहीं कुछ स्वयंसेवकों से उनका परिचय संपर्क हुआ | संघ से प्रभावित होकर उन्होंने शंकर जी की बगीची के नाम से विख्यात गांव की एक बगीची में शाखा लगाना शुरू किया | धीरे धीरे यह शाखा इतनी प्रभावी हुई कि इसके कारण गाँव व्यसनमुक्त हो गया | ग्राम वासियों ने अपनी अनेक बुराईयाँ छोड़ दीं |

 

भाऊ साहब इन्दूरकर जी के पश्चात भोपाल के श्री सनत्कुमार बनर्जी राजगढ़ के जिला प्रचारक बनकर आये | अंग्रेजी के अच्छे जानकार होने के कारण उनके कार्यकाल में अनेक शासकीय कर्मचारी, वकील तथा चिकित्सक आदि संघ से जुड़े | राजगढ़ में तो कर्मचारियों की प्रथक से शाखा लगने लगी | वहां के तहसीलदार भी उस शाखा पर आने लगे थे | सन १९४७ तक जिले में १७ स्थानों तक संघ का कार्य पहुँच चुका था |

इस जिले में भोपाल के नेमीचंद कक्कड़, सीहोर के प्रभाकर वडनेरकर, भिंड के रामदत्त सिंह कुशवाह, लालजी भाई देसाई, भोपाल के नारायण प्रसाद गुप्ता, शाजापुर के सालिगराम तोमर, आगर के रामकिशन प्रजापति, तराना के रामनाथ त्यागी, इंदौर के बाल सप्तऋषि ने प्रचारक के रूप में संघ कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया |

१९५० तक श्री नारायण दास मूंदडा तथा उनके बाद श्री शारदा शंकर व्यास राजगढ़ जिला प्रचारक रहे | प्रथम प्रतिवंध के पूर्व कुछ समय के लिये श्री हुकुमचंद मारू राजगढ़ नगर में प्रचारक रहे |

 सन १९५२ में दत्ताजी उननगांवकर संयुक्त रूप से शाजापुर तथा राजगढ़ जिले के प्रचारक नियुक्त हुए | उनके कार्यकाल में ही जिले ने १०० शाखाओं के लक्ष्य को प्राप्त किया था |

श्री देवीसिंह हाडा ब्यावरा के प्रथम संघ शिक्षावर्ग शिक्षित स्वयंसेवक बने |

सन १९७८ तक राजगढ़ ब्यावरा का क्षेत्र शाजापुर जिले के साथ संयुक्त रहा था | इसके पश्चात राजगढ़ को प्रथक से जिला बनाया गया | प्रथक जिला बनने के समय श्री संतोष त्रिवेदी संयुक्त जिले का काम देख रहे थे | इसके बाद श्री माखन सिंह जी चौहान शाजापुर तथा श्री परमानंद जी मनोहर राजगढ़-ब्यावरा के जिला प्रचारक नियुक्त हुए |

राजगढ़ जिले में सर्वाधिक शाखा वर्ष १९९०-९१ में १७० रही है | जिले में संघ शिक्षा वर्ग करने बाले स्वयंसेवकों की संख्या प्रथम वर्ष - ४३५, द्वितीय वर्ष - ८२ तथा तृतीय वर्ष - ३५ है |

संघ कार्यालय -

* १९९० में मानानीय मा.गो. बैद्य जी द्वारा राजगढ़ में डा. हेडगेवार कालोनी का भूमिपूजन किया गया | श्री रामकृष्ण गुप्ता ने इस कालोनी में १०० बाई १०० का एक भूखंड सरस्वती शिशु मंदिर को तथा ३० बाई ६० का एक भो०खन्द संघ कार्यालय हेतु दान स्वरुप प्रदान किया | बाद में संघ कार्यालय को प्रदत्त भूखंड को विक्रय कर तथा जन सहयोग से वर्तमान संघ कार्यालय क्रय किया गया |

विभाग संघ चालक - श्री डा.ओम प्रकाश सोनी

विभाग कार्यवाह - श्री सुनील जैन, श्री लक्ष्मी नारायण चौहान

विभाग प्रचारक -  श्री  सुहास भगत, श्री बृज किशोर भार्गव

राजगढ़ जिला -

शासकीय दृष्टि से राजगढ़ जिले में राजगढ़, ब्यावरा, खिलचीपुर, जीरापुर तहसीलें हैं, जबकि संघ कार्य योजना में माचलपुर, खुजनेर तथा छापीहेडा को भी तहसील मान्य किया गया है |

जिला संघ चालक -

मा. रामरतन टेलर, मा. ओमप्रकाश सोनी, मा. गिरिराज गुप्ता

जिला कार्यवाह -

श्री राम नारायण टांक, श्री सुभाष सक्सेना, श्री ओमप्रकाश गर्ग, श्री डा.ओमप्रकाश सोनी, श्री रोडमल नागर, श्री उदयसिंह चौहान, श्री सुरेन्द्र जोशी, श्री लक्ष्मीनारायण चौहान

जिला प्रचारक -

श्री माखन सिंह चौहान, श्री परमानद मनोहर, श्री अरुण कुलकर्णी, श्री दिनकर सबनीस, श्री गोपाल देराडी, श्री राजेन्द्र सिंह राजपूत, श्री सुरेश जैन, श्री सुरेन्द्र सोलंकी

जिले से निकले प्रचारक -

(१) श्री सुरेश सोनी (२) श्री परमानद मनोहर (३) श्री जितेन्द्र सिंह परमार (४) श्री भगवत शरण माथुर (५) श्री गिरिराज शरण शर्मा (६) श्री रामगोपाल शर्मा (७) श्री सत्यनारायण सोनी (८) श्री महेश चौधरी (९) श्री धीरज सिंह चौहान (१०) श्री गोपाल विश्वकर्मा

संघर्ष गाथा -

प्रथम प्रतिवंध -

गांधी ह्त्या के मिथ्या आरोप में देश भर में संघ स्वयंसेवकों पर अत्याचार हुए | ब्यावरा में भी उस दौरान बी. के. कापसे तथा श्री गोविन्द वल्लभ त्रिपाठी सहित चार स्वयंसेवकों को जेल में रहना पडा |

आपातकाल -

आपातकाल के दौरान सम्पूर्ण जिले से स्वयंसेवकों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई | काले क़ानून मीसा और डी आई आर में राजगढ़ से १२, खुजनेर से ३, जीरापुर से ७, तलेन से १ कार्यकर्ताओं को बंदी बनाकर राजगढ़, नरसिंह गढ़, भोपाल तथा इन्दोर की जेलों में कैद कर रखा गया | प्रथम दौर में ही गिरफ्तार होने बालों में सर्व श्री गुलाब चन्द्र विजयवर्गीय, तुलसीराम नामदेव, भगवत शरण माथुर रहे | वरिष्ठ प्रचारक श्री माखनसिंह जी चौहान ने पेम्पलेट वितरित करते हुए सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी |

पूर्व प्रचारक श्री गिरिराजधरण शर्मा का विवाह २५ जून १९७५ को ही था | कोटा में आयोजित विवाह समारोह में प्रांत प्रचारक श्री बाबा साहब नातू , सुरेश जी सोनी सहित संघ के अनेक प्रचारक तथा अधिकारी सम्मिलित हुए थे | आपातकाल लगने संबंधी जानकारी मिलते ही उनमें से अधिकाँश भूमिगत हो गए | किन्तु दूल्हे गिरिराज धरण, नव वधु के साथ राजगढ़ बापिस आते ही गिरफ्तार कर मीसा बंदी के रूप में जेल भेज दिए गए | उन्हें पूरे १९ माह बाद ही जेल जीवन से मुक्ति मिल पाई |

स्मरणीय प्रसंग –

* राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के परम पूज्य सर संघ चालक मा. श्री मोहन जी भागवत का मध्य भारत प्रवास कार्यक्रम दिनांक १४ नवम्बर २०११ को राजगढ़ में संपन्न हुआ | स्वागत का जो अनूठा दृश्य बहां देखा गया बह शायद कभी भुलाया जा पाए | पूरा रेलवे स्टेशन दीप मालिकाओं से जगमगा रहा था | स्टेशन से बाहर भी कार्यक्रम स्थल तक दीपोत्सव दिखाई दे रहा था | नगर के प्रत्येक घर के दरवाजों पर दीप प्रज्वलित कर आगंतुक अतिथि के प्रति अनुराग दर्शाया गया था | इतना ही नहीं अंचल के गाँव गाँव में एक लाख इक्कीस हजार दीप प्रज्वलित कर देश में छाये भ्रष्टाचार वा आतंकवाद के अन्धकार को चुनौती दी गई थी |

श्री भागवत जी ने अपने राजगढ़ प्रवास में संघ की विशेषता रेखांकित की | "गगनं गगनाकारम सागरं सागरं समा" अर्थात जिस प्रकार अनन्त आसमान समुद्र जैसा कोई और नहीं है उसी प्रकार संघ सद्रश भी कोई और संगठन विश्व में दूसरा नहीं होने से उसकी किसी से तुलना सम्भव नही | स्वयम समझे बिना कोई दूसरा संघ को नहीं समझा सकता | एक अंधे को  उसके मित्र ने बताया कि आज उसने खीर खाई है, तो अंधे ने जिज्ञासा की कि खीर कैसी होती है ? मित्र ने बताया कि दूध से बनती है | अंधे ने प्रति प्रश्न किया कि दूध कैसा होता है, मित्र ने कहा सफ़ेद होता है | अंधे की जिज्ञासा और बढी, उसने पूछा यह सफ़ेद कैसा होता है | मित्र परेशान हो बोला बगुले जैसा | अंधे के अगले प्रश्न ने मित्र को और चिढा दिया | प्रश्न था यह बगुला कैसा | मित्र ने अपने हाथ को टेढाकर  बगुले जैसा बनाकर उसके सामने किया और बताया कि एसा होता है बगुला | अंधे ने टटोलकर देखा और कहा कि तुमने ऐसी टेढ़ी खीर खाई तो बह तुम्हारे गले में नहीं फंसी क्या ? भैया मुझे नहीं खानी ऐसी टेढ़ी खीर | अगर मित्र ने उसे वर्णन करने के स्थान पर एक चम्मच चखा दी होती तो बह समझ जाता कि खीर कैसी होती है |यही स्थिति संघ की है जो वर्णन से नहीं स्वयं अनुभव करके ही कोई समझ सकता है |

महंगाई तथा भ्रष्टाचार के मुद्दों पर संघ के दृष्टीकोण को रेखांकित करते हुए सर संघ चालक जी ने कहा कि अगर देश में महंगाई बढ़ रही है तो उसके कारण परेशानी सबको होती है | बह किसने बढाई किसके कारण बढी यह प्रश्न बेमानी है |हाँ उसके समाधान का प्रयत्न सबके द्वारा होना चाहिए | उन्होंने उदाहरण द्वारा इसका सम्यक विवेचन किया | एक किसान की बैलगाढी गड्ढे में फंस गई | बहुत प्रयत्न करने पर भी पहिया गड्ढे में से नहीं निकल रहा था | बह थक कर एक तरफ बैठकर सर पर हाथ रखकर रोने लगा | किसी ने पूछा क्यों रो रहे हो ? उसने बताया कि पहिया निकल ही नहीं रहा है | समझदार इंसान ने कहा कि भाई दूसरों का सहयोग लो और मिलकर पहिया निकालो | जो काम अकेले नही हो उसके लिये संयुक्त प्रयत्न ही एकमेव उपाय होता है | यही द्रष्टि राजनीति से विलुप्त हो रही है |

आज दुनिया मानती है कि भारत के विचारों में ही त्राण है | किन्तु आज भारत ही भारत के विचारों पर चल रहा है क्या ? परोपकार परायण बनाने बाली भारतीय शिक्षा पद्धति स्वयं के रोजगार का अवसर प्रदान करने बाली हो गई है | पश्चिम में जो प्रयोग असफल हो जाते हैं उनका प्रचलन हम करने लगते है, फिर चाहे वो जमीन को वन्ध्या करने बाली रासायनिक खेती हो अथवा मानव जीवन को असुरक्षित करने बाले परमाणु संयंत्र |

स्वामी विवेकानद जी एक कहानी अपने प्रवचनों में सुनाया करते थे | एक गडरिये को जंगल में शेर का नवजात बच्चा मिला, जिसकी आंख भी नहीं खुली थी | मां संभवतः किसी शिकारी के हाथों मारी गई थी | गडरिया दया करके उस बच्चे को अपने साथ ले आया तथा बकरियों का दूध पिलाकर उसे पालने लगा | बच्चा बड़ा हुआ | बह स्वयं को बकरी ही समझने लगा | उनके साथ धक्के खाता हुआ झुण्ड में चलता | बाड़े के बाहर कुत्तों से डरता तथा गडरिये को अपना मालिक समझता तथा उसकी लाठी से भयभीत होता | एक दिन जंगल के शेर ने उसकी यह हालत देखी तो उसे बहुत अचम्भा हुआ | उसने उसे पकड़ने का प्रयत्न किया किन्तु स्वयं को बकरी समझने बाला यह शेर बचने को भागा | जैसे तैसे जंगल के शेर ने उसे पकड़ा और कहा कि तू कैसा शेर है जो बकरी बना हुआ है | उसने जबाब दिया कि हे जंगल के राजा आपसे किसी ने झूठ शिकायत कर दी है, मैं कोई शेर बेर नहीं हूँ | मैं तो गरीब बकरी ही हूँ | तब शेर कान पकड़कर उसे एक कुए के पास ले गया और उसके निर्मल जल में परछाईं दिखाई | कि देख यह मैं हूँ और यह तू है | हम दोनों एक जैसे हैं अथवा नहीं ? यदि मैं शेर हूँ तो तू भी तो शेर है | ज़रा गर्जना तो कर के देख | अभी तुझे समझ आ जाएगा | और जैसे ही आत्म विस्मृत शेर ने दहाड़ लगाई, उसे तो उसे सारी कायनात को मालूम हो गया कि जंगल में एक नया शेर आ गया है | जो बकरियां अब तक उसे धकिया देती थी, वे उसके सामने से गायब हो गईं और जिन कुत्तों के भोंकने से बह थर थर कांपने लगता था वे कुत्ते उसके सामने से दुम दबाकर भाग छूटे | आज आत्म विस्मृत हिन्दू समाज की भी यही स्थिति है |

हिन्दू कोई पूजा पद्धति नही वरन जीवन पद्धति है | जो हिंद को प्रेम करे बह हिन्दू है | आज कई तरह के लोग देश में हैं | एक तो वे जो कहते हैं कि "गर्व से कहो हिन्दू है" | एक वे जो मानते हैं कि हम हिन्दू घर में पैदा हुए इसलिए हिन्दू हैं, अगर मुस्लिम के यहाँ पैदा हो जाते तो मुस्लिम होते, इसमें गर्व जैसा क्या है | एक वे जो हिन्दू होना अवसाद का विषय मानते हैं और दुखी रहकर समाज के क्षिद्रान्वेशण करते रहते हैं | भागवत जी से चार वर्ष पूर्व राज्यसभा के एक मुस्लिम सांसद मिले और पूछा कि आप सच्चर कमेटी की सिफारिशों का विरोध क्यूं कर रहे हैं ? भारत के मुसलमानों में और हिन्दुओं में अंतर क्या है ? हमारी कब्बाली क्या है ? भजन | मूर्ती पूजा नहीं करते पर मकबरा पूजन क्या है ? हमारे पूर्वज हिन्दू थे इसलिए आदतें इतने वर्षों बाद भी नही गईं | भागवत जी ने कहा कि आप जो कुछ कह रहे हो बह जिस दिन आपका समाज भी मान लेगा उस दिन हम भी विरोध बंद कर देंगे | हम हिन्दू पूर्वजों की संतान हैं, हम राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर के वंशज हैं, यह वास्तविकता मान लें फिर काहे का झगड़ा ? फिर तो हम वन्धु भाई हो गए | केवल मैं ही सही हूँ और जो मेरी बात नही मानेगा बह जहन्नुम में जाएगा, यह मान्यता हिन्दू की हो ही नहीं सकती | अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम, उदार चरितानाम तु वसुधैव कुटुम्बकम | "माता भूमिः पुत्रो अहम प्रथिव्या" भारत भू भक्ती की जीवन पद्धति ही हिंदुत्व जीवन दृष्टि है |

प्रामाणिकता, अनुशासन, और सद्गुण संपन्न बनाने के लिये केवल भाषण और संकल्प ही पर्याप्त नहीं है | नियमित व्यायाम के साथ उसका स्मरण ही संघ है | अहर्निश स्मरण रखना " तेरा बैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें ना रहें" | संघ को कोई प्रथक संगठन नहीं बनाना, समाज को संगठित करना है | अपनी चमड़ी घिसकर, अपनी दमड़ी खर्च कर | संघ का नाम और काम तो बढ़ ही रहा है, देश का नाम बढे यही आवाहन |