विदिशा विभाग संघ गाथा 

दिंनाक: 30 Oct 2016 11:46:55

पृष्ठभूमि -

वेत्रवती नदी के किनारे स्थित विदिशा का वर्णन भारतीय इतिहास में एक स्वतंत्र, संपन्न व शक्तिशाली राज्य के रूप में मिलता है ! विक्रमादित्य की पत्नी महारानी ध्रुव देवी एवं अपनी विद्वत्ता के लिये प्रसिद्ध गल्हण विदिशा के ही थे !इस जिले के रावण गाँव में रावण की सोई हुई विशाल व अनोखी प्रतिमा है ! हिंदुत्व से प्रभावित हो बाबा बन गए हेलियाड़ोरिस का स्मारक भी विदिशा में है ! उदय गिरी की गुफाएं पुरातत्व की अप्रतिभ धरोहरें हैं ! विदिशा की प्राचीनता तथा बैभव की गवाही देने बाला विशाल विजय मंदिर धरती की गोद से बाहर आने को है ! बारहवे जैन तीर्थंकर श्री शीतलनाथ जी की तपोभूमि भद्दलपुर भी विदिशा नगर में ही अवस्थित है ! ग्यारसपुर में मालादेवी का मंदिर एवं हिंडोला तोरण स्थित हैं ! अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शाल भंजिका की मूर्ती भी ग्यारसपुर से ही प्राप्त हुई थी ! वेतवा के किनारे रामजी के चरण चिन्हों को श्रद्धालु अर्चन करते हैं ! सम्राट अशोक की पत्नी के नाम स्थित भेलसा ही बाद में विदिशा हुआ ! भेलसा की तोप तो किवदंतियों में भी मशहूर है! आमखेड़ा में एशिया सबसे विशाल बटवृक्ष स्थित है !

स्वतंत्रता के पूर्व विदिशा पूर्ववर्ती ग्वालियर रियासत का एक जिला था ! मध्यप्रदेश बनने के बाद सात तहसीलों - विदिशा ग्यारसपुर, बासौदा, नटेरन, कुरवाई, सिरोंज व लटेरी को मिलाकर बना  जिला शासकीय तथा संघ दोनों की दृष्टि से भोपाल विभाग के अंतर्गत रहा ! जिले में हिंदुत्व का भाव पहले से ही रहा है ! यहाँ हिन्दू महासभा काफी सशक्त व प्रभावी थी  ! उसके द्वारा संचालित हिन्दू राष्ट्र सेना के विरोध का सामना संघ के स्वयंसेवकों को यहाँ भी करना पडा ! भोपाल में नबाबी शासन होने के कारण प्रारम्भ में संघ के प्रगट कार्यक्रम भोपाल में सम्भव नही होते थे ! उस दौरान भोपाल की शाखा के पथ संचलन, विजयादशमी उत्सव आदि कार्यक्रम भी विदिशा में ही संपन्न किये जाते थे !

भौगोलिक रचना –

शासकीय द्रष्टि से विदिशा जिले में ९ तहसीलें हैं ! किन्तु संघ कार्य सुविधा हेतु इसे दो जिलों में बांटा गया है ! विदिशा, शमशाबाद, ग्यारसपुर तथा गुलाबगंज शासकीय तहसीलों का विदिशा जिला रखा गया है, इसमें भी गुलाबगंज को ग्यारसपुर में जोडकर तथा नटेरन और विदिशा ग्रामीण नई तहसीलें बनाकर संघ कार्य योजना में तहसील रचना निम्नानुसार रखी गई है –

नटेरन, विदिशा ग्रामीण, विदिशा नगर, शमशावाद और ग्यारसपुर

संघ कार्य का प्रारम्भ और विस्तार –

आजादी के पूर्व विदिशा जिला ग्वालियर विभाग का अंग था ! इसी कारण कार्य का नियंत्रण भी ग्वालियर से ही होता था और संघ के उत्तरप्रदेश प्रांत के अंतर्गत आता था ! इसीलिये ग्वालियर के प्रचारक नारायण राव तरटे का भी सतत प्रवास होता था ! विदिशा में तो संघ कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से ही होता था किन्तु सिरोंज और कुरवाई में मुस्लिम शासक होने के कारण बहां इस नाम से काम करना कठिन था ! संघ कार्य की दृष्टि से १९४६ तक विदिशा ग्वालियर के साथ रहा, तदुपरांत इसे उज्जैन विभाग के साथ जोड़ दिया गया !

उज्जैन विभाग से जुड़ने के बाद शुजालपुर के प्रचारक भैयाजी कस्तूरे विदिशा का काम देखने के लिये बीच बीच में आते थे ! बाद में उन्हें ही विदिशा जिले की जिम्मेदारी सोंपी गई ! उनके कार्यकाल में ही विदिशा के बाहर बासौदा, शमशाबाद आदि स्थानों पर शाखाएं प्रारम्भ हुई ! नगर में भी शाखाओं का काफी विस्तार हुआ !

विदिशा के जिला प्रचारक रहे श्री भैयाजी कस्तूरे के अनुसार विदिशा में संघ की पहली शाखा १९४० में प्रारम्भ हुई ! पुराने गाडी अड्डे पर अग्रवाल धर्मशाला में यह शाखा लगा करती थी ! आज यह स्थान बाल विहार के नाम से जाना जाता है ! आज भी बहां शाखा लगती है ! नेमीचंद जैन कक्षा ९ में पढ़ने विदिशा आये थे, वे अपने एक रिश्तेदार राजमल दोसी के यहाँ रहा करते थे ! उन्हीने सबसे पहले विदिशा नगर में शाखा का सूत्रपात किया ! था ! नेमीचंद द्वारा प्रारम्भ की गई शाखा, जब वे विदिशा होते तब तो चलती, किन्तु छुट्टी या त्योहारों के अवसर पर जब वे घर जाते तब बंद हो जाया करती थी ! १९४२ में हरि रघुनाथ गानू के विदिशा आने के बाद शाखा को स्थायित्व प्राप्त हुआ ! गानू काका मूलतः इंदौर के स्वयंसेवक थे ! तिलक जी के विजय सिनेमा में मेनेजर के रूप में काम करने के निमित्त उनका विदिशा आना हुआ था ! उन्होंने किले के अन्दर शिवाजी जयन्ती के दिन चौपडा कुआ व्यायाम शाला में शाखा प्रारम्भ की ! डाक्टर दातार विदिशा में वकालत का व्यवसाय किया करते थे, वे इस व्यायाम शाला के अध्यक्ष थे ! डाक्टर दातार थे तो कांग्रेसी पर संघ को उनका पूरा सहयोग रहता था ! शाखा शुरू करने के कुछ ही समय में उपस्थिति ४० रहने लगी ! विदिशा नगर में उस समय काम शुरू करने बालों में बबन कोकाजी मुले, हरसेवक  पेंटर, लक्ष्मीकांत मुले, वसंतराव डोंगरे, डा. यशवंत गजानन तिलक आदि नाम मुख्य हैं ! बिहारीलाल सर्राफ नगर के पहले संघचालक थे व दौलतराम खत्री पहले नगर कार्यवाह !

१९४७ में होशंगावाद में मध्य प्रदेश (मध्यभारत व महाकौशल) के संभावित प्रचारकों का जो वर्ग हुआ था उसमें विदिशा से शीतला सहाय, पांडुरंग मोघे, शम्भूनाथ और कमलाकर शामिल हुए थे ! वर्ग के बाद इन्हें विभिन्न स्थानों पर शाखा शुरू करने के लिये भेजा गया ! पहले प्रतिवंध के पूर्व जिले भर में संघ की शाखाओं का जाल बिछ चुका था !

प्रथम प्रतिवंध -

 पहले प्रतिवंध के समय विदिशा में ना केवल विदिशा के वरन भोपाल रियासत के स्वयंसेवकों ने भी विदिशा आकर ही सत्याग्रह किया था ! क्योंकि उस समय भोपाल रियासत के भारत में विलय को लेकर आन्दोलन चलाया जा रहा था ! इसीलिये भोपाल में सत्याग्रह स्थगित कर विलीनीकरण आन्दोलन में सम्मिलित होने का निर्णय लिया गया था ! किन्तु जिन स्वयंसेवकों को संघ के सत्याग्रह में भाग लेने को कहा गया उन्होंने विदिशा आकर सत्याग्रह किया ! विदिशा जिले के ३० स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह कर जेल यात्रा की ! सत्याग्रह करने बालों में सर्व श्री बाबूलाल टेलर, भैयालाल जिझौतिया, बाबूलाल गुप्ता, हरसेवक, वसंत पंडित, प्रभाकर खांडेकर, शीतला सहाय, पांडुरंग मोघे, मिश्रीलाल फ्रूट बाले, जमनालाल पहलवान तथा श्रवण सेन आदि शामिल थे ! कुंदनलाल जैन सबसे कम उम्र के सत्याग्रही थे !

इस प्रतिवंध के समय विदिशा में भैयाजी कस्तूरे जिला प्रचारक थे ! उनके नेतृत्व में ही सत्याग्रह वा भूमिगत आन्दोलन चला ! वे स्वयं भूमिगत रहकर कार्यकर्ताओं को प्रेरणा और चेतना देने का काम कर रहे थे ! उन दिनों विदिशा कोई बहुत बड़ा ना होने के कारण वे विदिशा से १४ कि.मी. दूर एक गाँव में रहा करते थे ! रोज रात होने पर पैदल चलकर विदिशा आते और कार्यकर्ताओं से मिल आवश्यक काम निबटाकर सबेरा होते होते फिर लौट जाते ! यह क्रम कोई एक दो दिन नहीं बल्कि महीनों तक चला ! उस प्रतिवंध के समय भूमिगत होकर काम कर रहे कार्यकर्ताओं को ऐसी ही कठिन परिस्थितियों से गुजरना पडा !

आपातकाल -

आपातकाल में विदिशा से ८० कार्यकर्ता मीसा तथा भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत पकडे गए थे ! सर्व श्री राघव जी, नरसिंह दास गोयल व डाक्टर तिलक २५ जून को ही गिरफ्तार कर लिए गए ! इनमें से कुछ को विदिशा व सागर तथा कुछ को भोपाल की जेलों में रखा गया ! गानू काका विदिशा शाखा के संस्थापकों में से थे ! उस समय उनकी आयु ७५ वर्ष की हो चुकी थी तथा अस्वस्थ भी थे ! फिर भी वे सत्याग्रह करके जेल गए ! पुत्रों ने उनकी आयु और स्वास्थ्य कोध्यान में रखकर उन्हें प्रयत्न करके पैरोल पर छुडा तो लिया किन्तु गानू काका ने अवधी बढाने के प्रयत्न से साफ़ इनकार कर दिया तथा पैरोल समाप्त होते ही बापस जेल चले गए !

१४ नवंबर १९७५ से संघ ने सम्पूर्ण भारत में एक साथ आपातकाल विरोधी सत्याग्रह प्रारम्भ किया ! विदिशा में भी श्री यशवंत नेमा, घनश्याम सोनी, रमेश खंडेलवाल आदि चार कार्यकर्ता पर्चे बाँटते तथा नारे लगाते पूरे शहर में घूमे ! यहाँ तक की थाने में जाकर पुलिसकर्मियों को भी पर्चे थमाए ! किन्तु किसी ने गिरफ्तार नहीं किया ! आखिर में थक कर सभी भगतसिंह फिल्म देखने सिनेमा हाल में जाकर बैठ गए ! एक घंटे बाद इस घटना की प्रतिक्रया शासन प्रशासन में हुई ! वास्तविक आंदोलनकारी तो उनके हाथ आये नहीं, जो भी मिला उसे उन्होंने धर पकड़ा ! सर्व श्री शक्ति सिंह, बाबूलाल ताम्रकार, पूरन चन्द्र सिंघई तथा राजा मोघे उनकी पकड़ में आये ! राजा मोघे के साथ बेरहमी से मारपीट की गई !

भोपाल में संगम टाकीज के पास तत्कालीन मुख्य मंत्रर प्रकाश चंद्र सेठी द्वारा किये जा रहे ओवर ब्रिज उद्घाटन के अवसर पर आपात काल के विरोध में सत्याग्रह हुआ ! उस सत्याग्रह में विदिशा के सर्व श्री सुरेश गुप्ता, दिलीप गोलवलकर, अशोक गर्ग आदि १७ कार्यकर्ता शामिल थे ! सभी को मारपीटकर मीसा में निरुद्ध किया गया !

प्रचारक श्री अरुण पलनीटकर का सत्याग्रह सबसे रोचक था ! वे अकेले सत्याग्रह करने विदिशा पहुंचे ! फुर्तीले अरुण जी को पकडने पुलिस दौडी ! किन्तु वे भागने लगे ! रेलवे स्टेशन पर उन्होंने खूब धमा चौकड़ी मचाई ! आगे आगे अरुण जी और पीछे पीछे पुलिस ! लगभग एक घंटे तक पुलिस को छकाने के बाद अरुण जी ने गिरफ्तारी दी ! पुलिस ने कहा की जब गिरफ्तार ही होना था तो इतना परेशान क्यों किया ! मुस्कुराते हुए अरुणजी बोले तुम्हे थकाकर ही गिरफ्तारी देना तय किया था !

आपातकाल में जन जागरण हेतु, स्टेंसिल पर हाथ से लिखकर एक छोटी डुप्लीकेटिंग मशीन द्वारा पर्चे छापे जाते थे ! इन पर्चों को सत्याग्रही वितरित करते थे या फिर रात के अँधेरे में इन पर्चों को दुकानों और घरों में डाल दिया जाता ! इस कार्य को अत्यंत कुशलता से सर्व श्री बलराम विश्वकर्मा, घनश्याम सोनी, रमेश खंडेलवाल, अशोक गर्ग, यशवंत नेमा आदि ने प्रचारक श्री विलास गोले जी के मार्गदर्शन में किया !

संघ शिक्षा वर्ग – 

* प्रारम्भिक दिनों में यह पद्धति थी कि जिन स्थानों पर शाखा नही होती थी, बहां के स्वयंसेवकों को भी कार्य विस्तार योजना को ध्यान में रखकर शिक्षावर्ग में ले जाया जाता था ! बाद में उनके माध्यम से शाखा लगने लगती थी ! इसी योजना के तहत सागर के मोतीचंद श्रावाने १९४७ में शिक्षा वर्ग के पहले विदिशा आये थे और अपने परिचय के माध्यम से श्री नेमीचंद जैन और राजमल जी को संघ शिक्षा वर्ग कराने ले गए थे ! राजमल नाई का काम करते थे ! राजमल जी की आर्थिक स्थिति अत्यंत साधारण थी ! किन्तु संघ शिक्षावर्ग वे पूर्ण भावना से गए थे, अतः, उन्होंने अधिकारियों से अनुमति लेकर अपने शुल्क की पूर्ती शिक्षावर्ग में आये हुए स्वयंसेवकों की हजामत बनाकर की ! यह कार्य वे अपने शारीरिक वा बौद्धिक शिक्षण से बचे हुए समय में करते थे ! संघ शिक्षा वर्ग से लौटकर उन्होंने ही सबसे पहली शाखा विदिशा में प्रारम्भ की !

कार्यालय -

१९४३ में श्री फुलंब्रीकर के मकान में २ रु. मासिक किराए पर संघ कार्यालय रहा ! प्रथम प्रतिवंध के दौरान यह कार्यालय सील कर दिया गया ! पुलिस को तलासी में यहाँ और तो कुछ नही मिला हाँ साढ़े चालीस जोड़ी जूते जरूर पुलिस द्वारा जब्त कर लिये गए ! जब प्रतिवंध समाप्त हुआ तब ये जूते तो पुलिस ने बापस कर दिए किन्तु कार्यालय की व्यवस्था अन्यत्र करना पडी ! नया कार्यालय मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रहे बाबू तख्तमल जैन के मकान के सामने एक मुसलमान के मकान को किराए पर लेकर बनाया गया ! इस मकान में रहने और पानी आदि की तो सुविधा थी किन्तु शौचालय नही था ! अतः बहां प्रचारक गण तथा रुकने बाले स्वयंसेवक रेलवे स्टेशन के शौचालय में जाने को विवश होते थे ! अधिकारियों के प्रवास के दौरान उनकी बाक़ी व्यवस्थाओं के साथ उन्हें किस कार्यकर्ता के यहाँ शौचादि के लिये जाना है, यह व्यवस्था भी करना पड़ती थी ! १९८६ तक इसी प्रकार कार्यालय की व्यवस्था रही ! तदुपरांत लोहान्गीपुरा में कार्यालय हेतु भवन क्रय किया गया ! किन्तु बाद में उसे विक्रय कर अरिहंत विहार में प्लाट लिया गया ! उसके बाद कुछ समय मोहनलाल जी के यहाँ निशुल्क कार्यालय व्यवस्था रही ! वर्त्तमान में श्री राजकुमार सोनी के यहाँ किराए के भवन में कार्यालय है !

स्वतन्त्रता प्राप्ति की बाद प्रान्तों का पुनर्गठन होने पर शासकीय तथा संघ कार्य की द्रष्टि से भी विदिशा को भोपाल विभाग में समाहित किया गया ! सन १९८९ में भोपाल विभाग के दो विभाग संघ कार्य योजना में बनाए गए ! विदिशा विभाग के श्री राज कुमार जैन विभाग प्रचारक बने ! सन १९९३ में पुनः विदिशा तथा भोपाल विभाग को मिलाकर पूर्ववत एक कर दिया गया !

सन २००६ में वर्तमान रचना निर्मित हुई, जिसके अनुसार विदिशा, वासोदा, रायसेन व बरेली जिलों को मिलाकर संघ कार्य योजना में विदिशा विभाग का गठन किया गया ! यद्यपि शासकीय द्रष्टि से इनमें से केवल विदिशा तथा रायसेन ही जिले हैं, जो अभी भी भोपाल संभाग के अंतर्गत आते हैं !

नव गठित विदिशा विभाग में विविध दायित्व वान कार्यकर्ता निम्नानुसार रहे –

विभाग संघचालक –

मा. मोहन अग्रवाल, मा. सत्यनारायण शर्मा

विभाग कार्यवाह –

श्री राजेश तिवारी, श्री कमल राजपाल

विभाग प्रचारक –

श्री पंकज जोशी, श्री सुहास भगत, श्री कमलेश कौरव, श्री चेतन भार्गव, श्री हितानंद शर्मा

 


 

 

विदिशा जिला

 

विदिशा जिले में दायित्व लेकर संघ कार्य करने बाले स्वयंसेवक निम्न लिखित हैं -

जिला संघ चालक -

मा. स्व.नरहरी रामचंद्र गानू, मा. ज्ञानचंद भंडारी, मा. मोहनलाल अग्रवाल, मा. त्रिलोक जी सांवला

जिला कार्यवाह -

स्व.श्री हरिभाऊ गानू, स्व.श्री शक्तिसिंह परमार, श्री सुरेश अग्रवाल, श्री खुमान सिंह रघुवंशी, श्री राजेश तिवारी, श्री आकाश सहगल, श्री महेंद्र सिंह रघुवंशी

जिला प्रचारक -

श्री दत्तात्रय भैयाजी कस्तूरे, श्री लक्ष्मण राव तराणेकर, श्री जुगलकिशोर परमार, श्री जयरामदास टहलियानी, श्री राजा मोघे, श्री अरुण पलनीटकर, श्री अरविन्द कोठेकर, श्री हीरालाल पाटीदार, श्री सौदान सिंह बघेल, श्री विजय दुबे, श्री अरुण कुलकर्णी, श्री सतीश अग्रवाल, श्री मिलिंद कोपरगाँवकर, श्री शिवकांत दीक्षित, श्री पंकज जोशी, श्री राजेन्द्र राजपूत,

इनके अलावा जिन्होंने समय समय पर विदिशा में प्रचारक या विस्तारक के रूप में कार्य किया उनमें सर्व श्री रमेश भार्गव, जीवनधर जैन, कमलाकर काले, सुरेश मुले, कमल किशोर अग्रवाल, राघवेन्द्र गौतम, संदीप राठौर आदि शामिल हैं !

जिले से निकलने बाले प्रचारक -

श्री अरुण पलनीटकर १९७७ से १९८०, श्री सौदान सिंह बघेल, श्री राजमोहन बघेल २००३ से सतत, श्री सुरेन्द्र सोलंकी २००४ से सतत, श्री लखन विश्वकर्मा २००९ से सतत, श्री राकेश शर्मा, श्री महेश गोयल, श्री आनंद जिझौतिया

विस्तारक गण –

 श्री महेश बाबू शर्मा, श्री आकाश सहगल  

संस्मरण -

* संघ कार्य प्रारम्भ करने में कार्यकर्ताओं को अनेकों प्रकार की कठिनाईयों से बास्ता पड़ता है ! एसा ही कुछ अनुभव प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री रहे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता स्व.शीतला सहाय जी ने साझा किया था ! वे स्वयंसेवक तो गुना में बने किन्तु बाद में विदिशा पहुँच गए ! उन दिनों भैयाजी कस्तूरे बहां जिला प्रचारक थे ! शिक्षा विभाग में हेड क्लर्क पद पर कार्य करने बाले श्री रामचंद्र श्रीवास्तव के साथ शीतला जी को बासोदा शाखा प्रारम्भ करने भेजा गया ! चलने के पहले ही श्रीवास्तव जी ने स्पष्ट कर दिया था कि पहली बार शाखा लगाने चल रहे हैं, इसलिए किसी के यहाँ भोजन इत्यादि नही करेंगे ! बासौदा पहुंचकर दिन भर संपर्क इत्यादि किया किन्तु शाखा लगाने की स्थिति नही बनी ! विवशतः रात बहीं रुकना पडा !  निर्देश के कारण किसी के यहाँ कुछ खाया पीया भी नही ! दूसरे दिन सुबह कुछ लोगों ने चाय नाश्ते के लिये पूछा भी किन्तु श्रीवास्तव जी ने मना कर दिया ! दूसरा दिन भी बैसे ही निकल गया ! शाम को शाखा लगी ! उसके बाद दोनों विदिशा लौटे, तभी रात को भोजन किया !

* इसी प्रकार गुलाब गंज का वर्णन भी अत्यंत रोचक है ! यहाँ शीतला जी और माधव पिशवे ने पूर्व परिचय के आधार पर एक कोयले के व्यापारी श्री ताराचंद के माध्यम से संघ कार्य शुरू किया ! ये लोग रात को गुलाबगंज जाते, ताराचंद जी के यहाँ रात को रुकते, सुबह प्रभात शाखा लगाकर बापस विदिशा आ जाते ! एक बार कुछ यह संयोग बना कि जब ये बहां पहुंचे तो मालूम हुआ कि ताराचंद तो किसी काम से बाहर गए हुए हैं ! ठण्ड का मौसम था ! अधिक परिचय ना होने के कारण किसी के यहाँ जा भी नही सकते थे ! अतः तय किया कि ताराचंद जी की कोयले की टाल पर ही रात्री विश्राम किया जाए ! बहां बिस्तर आदि की कोई व्यवस्था नही थी ! केवल एक चटाई थी  और उस पर भी बहां का चौकीदार लेटा हुआ था ! "मरते क्या ना करते" कोने में पड़े कोयले के कुछ खाली बोरे उठाकर उन पर ही जैसे तैसे लेट गए ! रात के साथ साथ ठण्ड भी बढी तो उनमें से ही कुछ बोरे उठाकर ओढ़ लिये ! जैसे तैसे रात कटी ! सबेरे उठकर शाखा जाने को निकले,किन्तु एक दूसरे को देखकर होश उड़ गए ! कोयले के बोरों को ओढ़ने के कारण दोनों पूरी तरह काले हो गए थे ! अब इस हालत में शाखा लगाने कैसे जाते ? पास में अतिरिक्त वस्त्र भी नही थे ! अतः सीधे रेलवे स्टेशन की तरफ भागे और रेल पकड़ कर विदिशा आ पहुंचे !

* बासोदा में श्री कमलाकर काले प्रचारक बनाकर भेजे गए ! बहां उनके भोजन इत्यादि की कोई समुचित व्यवस्था नही थी ! अतः उन्होंने तय किया कि अपने कमरे पर ही कुछ पकाने खाने का जुगाड़ किया जाए ! बाजार में ज्वार का आटा मिला ! उससे रोटी बनाने का प्रयत्न किया ! पर बात कुछ बनी नही ! आड़ी टेढ़ी कच्ची पक्की रोटियाँ बनी, तो दूसरे दिन रोटियाँ बनाने का चक्कर छोड़कर सीधे आटा घोला और उसे पका कर काम चलाया ! इस प्रयोग में शरीर ने साथ नही दिया ! बेचारे कमलाकर जी बीमार हो गए ! भयंकर पेट दर्द से परेशान हो गए ! दस्त थे कि रुकने का नाम ही नही ले रहे थे ! उनकी इस हालत की सूचना मिलने पर विदिशा से शीतला जी वा अन्य स्वयंसेवक बासोदा गए और उनको लेकर आये ! कई दिनों की चिकित्सा के बाद वे ठीक हो पाए !

* विदिशा के जिला प्रचारक भैयाजी कस्तूरे अत्यन्य कर्तव्य कठोर थे ! कष्ट सहन करना तो मानो उनका स्वभाव ही बन गया था ! एक बार उन्होंने शमशाबाद में शाखा प्रारम्भ करने के लिये अपने एक मित्र माहेश्वरी जी से चर्चा की ! माहेश्वरी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे शाखा शुरू करने आयें, वे स्वयं कुछ लोगों से चर्चा करके रखेंगे ! उनके आश्वासन के आधार पर भैया जी ने शीतला सहाय जी के साथ किराए की साईकिल से शमशाबाद तक की दूरी तय की ! बहां पहुँचने पर ज्ञात हुआ कि माहेश्वरी जी ने तो किसी से बात ही नही की है ! यह जानते ही भैया जी बापिस लौटने को तत्पर हो गए ! माहेश्वरी जी ने आग्रह पूर्वक कहा कि आये हैं तो भोजन तो करते जाईये ! किन्तु भैयाजी ने कहा कि जब शाखा का काम नही तो भोजन भी क्यों ? इतना कह वे विदिशा के लिये लौट दिए ! संभवतः उनकी इच्छा माहेश्वरी जी को सीख देने की थी ! शीतला जी का भूख के मारे बुरा हाल था ! भूख तो भैयाजी को भी लगी होगी, किन्तु वे तो सहन करने में पारंगत थे ! बड़ी मुश्किल से उन्होंने शीतला जी को रास्ते के खेतों में से चने के बूट उखाड़ने की अनुमति दी ! किन्तु जब तक उन बूटों को भूनने आदि की व्यवस्था हो पाती, समय ज्यादा बर्बाद हो रहा है कह कर वे आगे बढ़ दिए ! और भूखे ही शीतला जी के साथ विदिशा लौटे !

* कठोर अनुशासन भैया जी की पहचान बन गया था ! उनके समय जो स्वयंसेवक तैयार हुए वे भी इन्ही सद्गुणों को आत्मसात कर गए ! विदिशा में प्रगट उत्सव की तैयारी चल रही थी ! सब उसमें जी जान से जुटे हुए थे ! मैदान की साफ़ सफाई से लेकर कार्यक्रमों के अभ्यास में सब लगे हुए थे ! अत्याधिक थक जाने के कारण शीतला सहाय जी तथा पांडुरंग मोघे खंड्ग संचालन में स्थितियां ठीक नही ला पा रहे थे ! इन दोनों को व्यवस्था के साथ साथ प्रात्यक्षिक कार्यक्रम में भाग लेने का भी उत्तरदायित्व था ! भैया जी ने उनकी त्रुटी को देखते हुए सजा दी कि जब तक अभ्यास चल रहा है वे दोनों बैठकें लगाएं ! दोनों बिना ना नुकर किये बैठकें लगाते रहे ! टाँगे पूरी तरह भर गईं ! यहाँ तक कि चलना भी कठिन हो गया ! मगर दोनों ने हार नहीं मानी !