भोपाल संघ गाथा

दिंनाक: 30 Oct 2016 10:55:20

पृष्ठभूमि –

देश की स्वतन्त्रता के पूर्व भोपाल एक नबाबी रियासत थी | इसमें सीहोर व रायसेन दो जिले थे | भोपाल नाम का कोई जिला तो दूर कोई तहसील भी नही थी | उस समय वह सीहोर जिले की हुजूर तहसील का एक नगर मात्र था | चारों ओर घने जंगल के बीच एक परकोटे के अंतर्गत समाया हुआ छोटा सा नगर | इसकी कल्पना हम इस तथ्य से कर सकते हैं कि रोशनपुरा जहां आज बहुमंजिला अट्टालिकाएं एवं प्रमुख व्यावसायिक केंद्र हैं बहां वन विभाग का नाका था | बसाहट के नाम पर केवल एक कोठी, जिस पर होने बाली रात को रोशनी, और शायद इसी कारण इस स्थान का नाम रोशनपुरा पडा |

मुस्लिम बहुल होने के कारण तथा नबाब का शासन होने के कारण हिन्दुओं के हित में कोई कार्य करना बहुत ही कठिन था और उनके लिये कोई संगठन चलाना तो लगभग असंभव सा ही था |हिन्दू बहुत ही दयनीय स्थिति में रहकर मुसलमानों के सारे अन्याय व अत्याचार सहन किया करते थे | ऐसी परिस्थिति में सन १९३९ में संघ का कार्य प्रारम्भ हुआ था | उस समय संघ के भोपाल विभाग में भी ये ही दो जिले थे |

संघकार्य का प्रारम्भ व विस्तार

भोपाल की स्थिति से पूजनीय डाक्टर साहब परिचित भी थे और चिंतित भी | उनकी तीव्र इच्छा थी कि किसी भी कीमत पर हिन्दू संगठन का काम यहाँ प्रारम्भ होना ही चाहिए जिससे भयभीत तथा पूरी तरह दबे हुए हिन्दू समाज को गर्व से सर ऊंचा करने की स्थिति उत्पन्न हो सके | नबाबी रियासत के तौरतरीकों के कारण सीधे प्रचारक भेज कर काम खडा करना सम्भव नही था | इसलिए उन्होंने भोपाल में पदस्थ केंद्र सरकार के कर्मचारी स्वयंसेवकों पर उन्होंने ध्यान केन्द्रित किया तथा उन्हें ही मार्गदर्शन कर बहां काम खडा करने को प्रेरित किया | यही कारण है कि प्रारम्भ में शासकीय कर्मचारी सर्व श्री रघुनाथ हरकरे, धर्माधिकारी, रेखड़े, पांडुरंग वैद्य व अनंतराव केलकर आदि के माध्यम से भोपाल में संघ कार्य प्रारम्भ हुआ | इन लोगों के प्रयत्नों से कार्य प्रारम्भ हुए अभी एक वर्ष ही बीता था कि तभी रघु हरकरे का भोपाल से स्थानान्तरण हो गया | किन्तु तब तक संघ कार्य की जड़ें जम चुकी थीं इस कारण संघ कार्य अवाध गति से बढ़ता रहा | लक्ष्मीचंद जैन, विक्रमादित्य वर्मा, आत्माराम सोनी, बाबूलाल सिंघल, मुरारीलाल श्रीवास्तव अच्छे कार्यकर्ता के रूप में उभरकर सामने आये | धीरे धीरे शाखाओं का विस्तार होने लगा | गौशाला के साथ साथ शीतलदास की बगिया, कादरमियाँ के महल व चाँदवड में भी नियमित शाखा शुरू हो गईं | इसके साथ ही भोपाल के बाहर रियासत में अन्य स्थानों पर भी संघ कार्य पहुँच गया | सन १९४६ आते आते रियासत में २० स्थानों पर शाखा लगने लगी थी | ये स्थान थे बरेली, आष्टा, बेगमगंज, नसरुल्लागंज, रेहटी, बैरसिया, रायसेन, जावर, इच्छावर आदि |

सन १९४७ के मकर संक्रांति उत्सव की अध्यक्षता तत्कालीन भोपाल राज्य के अंतरिम सरकार में मंत्री मास्टर भैरव प्रसाद ने की थी | उन्होंने अपने उद्बोधन में संघ की आवश्यकता व महत्व को स्वीकार किया था |

कपड़ा मिल बनाम संघकार्य -

भोपाल में संघ कार्य के मजबूत होने में यहाँ की कपड़ा मिल का भी बहुत योगदान रहा | कपड़ा मिल में मुसलमानों की बहुतायत थी | २३०० मजदूर मुसलमान थे और मात्र ७०० हिन्दू | मिल में तीन पालियों में काम होता था तथा पालियों के मजदूर हर सात दिन में बदलते रहते थे | इस कारण अलग अलग मोहल्लों में रहने बाले तथा अलग अलग पालियों में काम करने बाले हिन्दू मजदूरों में अनेक स्वयंसेवक नियमित शाखा नही जा पाते थे | उन्ही दिनों रायपुर के दो स्वयंसेवक दादा देशपांडे और वसंत देशपांडे मिल में काम करने भोपाल आये | दादा देशपांडे पहले रायपुर में प्रचारक भी रह चुके थे | उन्होंने सुझाव दिया कि अपने स्वयंसेवकों की रोज शाखा हो इसलिए मिल में ही पाली के अनुसार शाखा लगाई जाए | इसके बाद प्रातः ७-३०, दोपहर ३-३० और रात्री ११-३० बजे शाखा लगाई जाने लगी | धीरे धीरे सभी मजदूर शाखा आने लगे | इस पाली शाखा से ही बाद में सर्व श्री माणिक चंद चौबे, नानूराम दादा, शिवचरण भैयन, मुकुंदीलाल आदि संघ के संपर्क में आये |

 

सन १९६४ में भोपाल नगर को दो भागों में बांटा गया | एक था पुराना भोपाल इसमें बैरागढ़, गांधीनगर व पुराना भोपाल का क्षेत्र आता था | और दूसरा भाग था नया भोपाल व बिद्युत नगर का क्षेत्र | इसी समय भोपाल के एकनिष्ठ स्वयंसेवक सरदारमल जी ललवानी ने संघ चालक का दायित्व सम्भाला तथा कार्यवाह बने सिंध से भोपाल आकर वकालत करने बाले श्री उत्तमचंद जी इसराणी | सन १९६९ में जब श्री उत्तमचंद जी इसराणी को विभाग कार्यवाह का दायित्व सोंपा गया तब नगर कार्यवाह बने श्री गुलाबचंद जी खंडेलवाल | अन्नाजी मुकादम सन १९६८ में भोपाल के जिला प्रचारक बनकर आये |

सन १९७३ में शासन ने सीहोर जिले को विभाजित कर दो जिले बनाए | सीहोर में पांच तहसीलें रही और हुजूर व बैरसिया को लेकर भोपाल जिला बनाया गया | बीच बीच में बैरसिया तहसील को लेकर कई प्रकार के प्रयोग होते रहे | कभी बह भोपाल महानगर के साथ संयुक्त रही तो कभी विदिशा जिले के साथ, कभी उसका स्वतंत्र अस्तित्व रहा तो कभी भोजपुर जिले में शामिल की गई |

सन २००६ में संघ कार्य की द्रष्टि से भोपाल महानगर को तीन जिलों में बांटा गया | ये थे तात्या टोपे, विद्युत तथा प्रताप | २०१० में प्रताप जिले को दो भागों में विभक्त कर प्रताप तथा विक्रम जिले बनाए गए |

संघ कार्य की दृष्टि से जब प्रांत का पुनर्गठन हुआ तब विदिशा जिले को ग्वालियर से प्रथक कर भोपाल विभाग में मिला दिया गया था | सबसे पहले इस विभाग के विभाग प्रचारक का दायित्व श्री दिगंबर राव तिजारे को दिया गया और उनके साथ सहयोग करने के लिये भैयाजी कस्तूरे को सह विभाग प्रचारक बनाया गया |

सन १९६२ में महाकौशल के दो जिले होशंगावाद व बैतूल भी भोपाल विभाग में मिला दिए गए किन्तु १५ जून १९८४ को उज्जैन में सम्पंन हुई प्रांतीय बैठक में इन दोनों जिलों को मिलाकर प्रथक होशंगावाद विभाग की रचना की गई | तथा भोपाल में शासकीय दृष्टि से भोपाल, सीहोर, रायसेन व विदिशा जिले रहे | भोपाल महानगर को प्रथक जिला मानते हुए भोपाल की हुजूर वा बैरसिया तथा रायसेन की गौहरगंज तहसील को मिलाकर प्रथक भोजपुर जिले की रचना की गई |

सन १९८९ में भोपाल विभाग के दो विभाग बनाए गए | महानगर को विभाग का दर्जा देकर शेष भाग को विदिशा के नाम से अलग विभाग बनाया गया | भोपाल के विभाग प्रचारक बने श्री श्रीधर पराड़कर और विदिशा विभाग के डा. राजकुमार जैन |

सन १९९३ में फिर से विदिशा व भोपाल विभाग को मिलाकर पूर्व की भांति एक कर दिया गया और इस एकीकृत विभाग का दायित्व दिया गया श्रीधर पराड़कर को | १९९६ तक वे भोपाल विभाग प्रचारक रहे, तदुपरांत अनिल जी दवे को विभाग प्रचारक तथा सुहास जी भगत को सहविभाग प्रचारक का दायित्व सोंपा गया |

प्रारम्भ से अब तक भोपाल में विभाग संघ चालक, विभाग कार्यवाह व विभाग प्रचारक का दायित्व संभालने बाले कार्यकर्ता निम्नानुसार हैं -

विभाग संघचालक -

मा. परमेश्वरी वल्लभ शर्मा, मा. शशीकांत सेठ (शशिभाई), मा. डा. माधव हरि कान्हेरे, मा. कांतीलाल चतर |

 

विभाग कार्यवाह -

श्री उत्तमचंद इसराणी, श्री गुलाब चंद खंडेलवाल, श्री लक्ष्मण राव जोशी, श्री विभीषण सिंह, श्री ज्ञान प्रकाश तिवारी, श्री विलास बालकृष्ण गोले, श्री चंद्रकांत निमाडे |

 

विभाग  प्रचारक -

श्री दिगंबर राव तिजारे, श्री दत्ताजी कस्तूरे, श्री गोपालराव येवतीकर, श्री अरविन्द मोघे, श्री अन्नाजी मुकादम, डा. राजकुमार जैन, श्री श्रीधर पराड़कर, श्री अनिल दवे, श्री सुहास भगत, श्री अशोक पोरवाल, श्री राजमोहन सिंह बघेल |

 

कार्यालय -

संघ का पहला कार्यालय लोहा बाजार में होरीलाल वकील के सामने ३ रु, मासिक किराये पर एक कमरा लेकर प्रारम्भ किया गया | यहाँ विजली तथा शौचालय तो था किन्तु पेयजल की व्यवस्था नही थी | अतः दूसरे स्थान की खोज शुरू हुई | सरदारमल ललवानी के माध्यम से दिगंबर जैन पंचायती धर्मशाला में एक अच्छा स्थान कार्यालय के लिये प्राप्त हो गया | तदुपरांत प्रांत कार्यवाह ईसरानी जी के आवास में भी काफी समय तक कार्यालय रहा | बढ़ती हुई आवश्यकता को देखते हुए भोपाल के अरेरा कालोनी में एक भूखंड लेकर भवन "समिधा" बनाया गया और संघ की समस्त गतिविधियाँ बहीं से संचालित होने लगीं | बाद में "समिधा" को प्रांतीय कार्यालय बनाकर विभाग के लिये पुराने भोपाल की राजदेव कालोनी में "केशव नीडम" बनबाया गया |

 

संघ शिक्षा वर्ग –

* सन १९४२ में खंडवा में आयोजित शिक्षा वर्ग में भोपाल से सबसे पहले कन्हैया द्विवेदी, नेमीचंद कक्कड़ व लक्ष्मीचंद जैन संघ का प्रशिक्षण प्राप्त करने गए थे | सन १९४३ में लगातार दूसरे वर्ष इन तीनो ने इंदौर से द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया और शंकरलाल शर्मा ने प्रथम वर्ष का | सन १९४४ में अकेले कन्हैया द्विवेदी तृतीय वर्ष करने गए | सन १९४७ में सागर शिक्षा वर्ग में भोपाल से १५० स्वयंसेवक शिक्षा वर्ग में भाग लेने गए थे |

* भोपाल के जिला कार्यवाह रहे बिहारीलाल जी के संघ शिक्षा वर्ग करने का बड़ा ही रोचक साथ ही प्रेरक प्रसंग है | संघ शिक्षावर्ग जाने का निश्चय कर चुके बिहारीलाल जी के परिजनों ने उनका विवाह कोटा में तय कर दिया | बिहारीलाल जी ने कहा कि विवाह की तारीख शिक्षावर्ग के बाद की तय करें, किन्तु घरबालों ने उनकी बात को गंभीरता से नही लिया और विवाह की तारीखें बही रखीं जिनमें शिक्षावर्ग था | बिहारीलाल जी भी धुन के पक्के थे | बाराती तो कोटा पहुँच गए किन्तु दूल्हा कोटा ना जाते हुए संघ शिक्षावर्ग करने विदिशा पहुँच गया | मजबूर होकर घर बालों को विवाह टालना पडा | शिक्षावर्ग से लौटने के बाद ही उनका विवाह संपन्न हुआ |

* भेल के स्वयंसेवक बद्री संघ शिक्षा वर्ग तो जाना चाहते थे किन्तु अर्थाभाव आड़े आ रहा था | एक अन्य स्वयंसेवक बराठे जी भी उन दिनों भेल में ही अधिकारी के रूप में पदस्थ थे | बद्री ने बराठे जी से साईकिल में हवा भरने का पम्प लेकर कारखाने के बाहर खड़ा होना शुरू किया | साईकिल के पहियों में हवा भरकर उन्होंने संघ शिक्षावर्ग जाने हेतु पैसे जुटाए और अपने संकल्प को पूर्ण किया |

* संघ के वरिष्ठ अधिकारी अपने आत्मीय व्यवहार से कार्यकर्ता के मन पर चमत्कारिक संस्कार व प्रभाव डालते हैं | स्वयंसेवक के सुख दुःख में वे एसे सहभागी होते हैं जैसे बह उनके परिवार का ही अंग हो | विभीषण सिंह जी ने अपना अनुभव कुछ इस प्रकार बयान किया था - मैं भोपाल संघ शिक्षा वर्ग की व्यवस्था में था कि तभी हर्निया के कारण चलना फिरना तो दूर हिलने डुलने में भी परेशानी होने लगी | मुझे वर्ग के चिकित्सालय में रखा गया | उस वर्ग के सर्वाधिकारी थे रतलाम के अम्बालाल जी जोशी तथा कार्यवाह थे इंदौर के रामकृष्ण विजयवर्गीय | उस दिन पूजनीय गुरूजी वर्ग में थे तथा सभी व्यवस्थापकों की बैठक लेने बाले थे | वर्ग कार्यवाह विजयवर्गीय जी ने चिकित्सा व्यवस्था में लगे सभी व्यवस्थापकों को बैठक हेतु भेज दिया तथा उनके स्थान पर स्वयं बहां के रोगियों की देखभाल में जुट गए | मुझे लघुशंका इत्यादि के लिये भी जाने में कठिनाई थी, इसलिए एक पात्र पास में ही रखा गया था | उस समय भी मुझे लघुशंका हेतु जाना पडा | मेरे लाख मना करने के बाद भी विजयवर्गीय जी ने बह पात्र उठाया और साफ़ कर पुनः यथास्थान रखा | इतने बड़े आदमी होकर भी इस प्रकार निर्विकार भाव से सेवा में जुटे रामकृष्ण जी को देखकर मुझे संघ की महत्ता का साक्षात्कार हुआ | इसका मेरे मन पर जो प्रभाव हुआ बह आज भी अमिट है तथा प्रेरणा देता है |

भोपाल में संघ के कार्य को जिन्होंने दायित्व लेकर आगे बढाया, एसे जिला संघचालक, जिला कार्यवाह और जिला प्रचारकों के नाम निम्नानुसार हैं -

महानगर संघ चालक -

मा. सरदारमल ललवानी, मा. सरदार गुरमुख सिंघ जी, मा. शशीकांत सेठ (शशिभाई), मा. डा. जगदीश प्रसाद द्विवेदी, मा. नारायण दास वासवानी, मा. डा. माधव हरि कान्हेरे, मा. कांतिलाल चतर

 

महानगर कार्यवाह -

श्री बिहारीलाल लोकवानी, श्री मोरेश्वर रानाडे, श्री डा. लक्ष्मण राव जोशी, श्री विभीषण सिंह, श्री सदानंद दामोदर सप्रे, श्री ज्ञान प्रकाश तिवारी, श्री विलास गोले, श्री हेमंत मुक्तिवोध, श्री चंद्रकांत नेमाडे

 

महानगर प्रचारक -

श्री लक्ष्मीकांत मुकादम, श्री मोरेश्वर रानाडे, डा.राजकुमार जैन, श्री श्रीधर पराड़कर, श्री अनिल दवे, श्री सुहास भगत, श्री अशोक पोरवाल

 

भोपाल से निकले प्रचारक -

श्री नेमीचंद कक्कड़, श्री नारायण प्रसाद गुप्ता, श्री गोविन्द सारंग,  श्री जयरामदास टहलियानी, श्री नर्मदा प्रसाद किंकर,  श्री जयराम सदाशिव उपाख्य राजा मोघे १९७२ से १९८८, श्री अभय जैन, श्री विलास गोले १९७७ से १९८६, श्री श्रीराम अरावकर १९७७ से सतत, श्री प्रभाकर केलकर १९७७ से सतत, श्री अरुण कुलकर्णी १९७७ से सतत, श्री तपन भौमिक, श्री दिनकर सबनीस १९७८ से सतत, श्री मिलिंद कोपरगांवकर, श्री सुहास भगत, श्री मंगेश पराडकर १९८३ से सतत, श्री पंकज जोशी १९९२ से सतत, श्री राकेश शर्मा, श्री जीवन्धर जैन, श्री ओमप्रकाश कुंद्रा, श्री नितिन केकरे, श्री चंदर सिंह