मुरैना संघगाथा

दिंनाक: 30 Oct 2016 11:05:15

पृष्ठभूमि –

चम्बल नदी मुरैना की उत्तरी और पूर्वी सीमा को राजस्थान से प्रथक करती है ! इसके उत्तरी पूर्वी सीमा का छोटा सा भाग, उसेदघाट पर उत्तर प्रदेश को स्पर्श करता है ! इसके पूर्व में भिंड तो दक्षिण में ग्वालियर तथा शिवपुरी जिले हैं ! एसा कहा जाता है कि इस क्षेत्र में मोर अधिक होने के कारण इसका नाम मयूरवन था जो बाद में अपभ्रंश होकर मुरैना हो गया !  मुरैना के पास ही कुंतलपुर नामक स्थान पांडवों की माता कुंती का जन्म स्थान कहा जाता है ! ककन मठ अपने पुरातन शिव मंदिर के लिये विख्यात है ! खजुराहो शैली में बने ११४ फुट ऊंचे शिवालय के कारण इस स्थान का पुरातात्विक महत्व भी है ! अमर शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की जन्मस्थली ग्राम रूअर बरुआई इसी जिले की अम्बाह तहसील का ग्राम है ! यहाँ ही बिस्मिल का शैशव बीता था ! बड़ी रेल लाइन के द्वारा देल्ही मुम्बई आदि महानगरों से सीधा जुड़े होने के कारण मुरैना तीव्र गति से विकसित हुआ है ! अनाज और खासकर तिलहन की यहाँ अच्छी पैदावार होती है ! चम्बल नहर आ जाने के बाद तो यहाँ की अधिकांश असिंचित भूमि भी सिंचित हो गई है ! भिंड के समान यह जिला भी लम्बे समय तक दस्यु प्रभावित रहा है ! उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि यहाँ के नौजवान बड़ी संख्या में सेना में देश सेवा कर रहे हैं !

शासकीय दृष्टि से मुरैना जिले की मुरैना, अम्बाह, पोरसा तथा जौरा तहसीलों को संघ कार्य की दृष्टि से इस जिले में शामिल कर शेष तहसीलों को सबलगढ़ जिले में लिया गया है ! संघ रचना में पोरसा, अम्बाह, मुरैना ग्रामीण, वान्मोर, मुरैना नगर तथा जौरा  ६ तहसीलें गठित की गई हैं ! वर्तमान में श्री राजेश शर्मा जिला प्रचारक एवं श्री संजीव मिश्रा जिला कार्यवाह हैं !

संघ कार्य का प्रारम्भ -

सन १९४३ में ग्वालियर के श्री मनोहर राव जी परचुरे कुछ समय के लिये प्रचारक के रूप में यहाँ आये और एक कमरा किराए पर लेकर संघ कार्य बीजारोपण के लिये प्रयत्न प्रारम्भ किये ! उन्होंने मुरैना में एक शाखा प्रारम्भ की ! मोतीलाल शर्मा उस शाखा के मुख्य शिक्षक थे, जो बाद में प्रमुख कम्यूनिस्ट नेता बने ! किन्तु जल्द ही परचुरे जी को शिवपुरी का जिला प्रचारक नियुक्त कर दिया गया ! उनके बाद १९४४ में ग्वालियर के ही स्वयंसेवक श्री शंकर विनायक बेलापुरकर उपाख्य दादा बेलापुरकर को विद्यालयों के ग्रीष्मावकाश में तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री भैयाजी सहस्त्रबुद्धे ने यहाँ भेजा ! ग्वालियर में अध्ययनरत मुरैना के नवयुवक रमेश बांदिल का ग्वालियर में दादा से अच्छा संपर्क आया था ! उनके सहयोग के भरोसे दादा को लेकर होली के दिन भैयाजी मुरैना आये ! यहाँ आने पर ज्ञात हुआ कि रमेश तो बाहर गए हैं ! घर पर रमेश के पिताजी से भेंट हुई ! उन्होंने दादा को अपने घर में रहकर संघ कार्य प्रारम्भ करने की अनुमति दे दी ! बाद में गंगाविशन के बाड़े में दो रुपये मासिक पर एक कमरा किराए पर लेकर दादा ने अपना निवास बनाया !

मुरैना में माहौर (वैश्य) समाज का एक पुस्तकालय एवं बाचनालय था, जिसमें पुस्तकें पढ़ने बड़ी संख्या में नवयुवक आया करते थे ! दादा ने बहीं जाकर बैठना शुरू किया तथा कुछ नौजवानों से दोस्ती गांठी ! शुरू शुरू में उन नए दोस्तों के साथ सायंकाल घूमने फिरने का कार्यक्रम शुरू हुआ ! वे लोग अम्बाह रोड पर स्थित रमेश की बगीची तक जाया करते तथा घूमते घूमते देश और समाज की स्थिति पर चर्चा करते ! कुछ घनिष्ठता होने पर संगठन की आवश्यकता तथा संघ कार्य का विचार उन लोगों के गले उतारा ! अंततः रेलवे स्टेशन के पास संस्कृत महाविद्यालय के प्रांगण में शाखा प्रारम्भ हुई ! यहाँ छात्रावास भी होने के कारण विद्यार्थी भी शाखा आने लगे ! शाखा नियमित होने के बाद गण की रचना तथा ध्वज लगना प्रारम्भ हुआ ! श्री नथमल गोयल, श्री बाबूलाल गुप्ता, श्री रामस्वरूप चांडिल आदि उस समय संपर्क में आने बाले स्वयंसेवक थे ! १९४५ के वाराणसी संघ शिक्षा वर्ग में स्वयंसेवकों को ले जाने का प्रयत्न हुआ किन्तु सफलता ना मिलने पर दादा अकेले ही प्रथम वर्ष हेतु बहां गए !

संघ शिक्षावर्ग से लौटने पर मुरार के डा. आगरकर के सुपुत्र प्रभाकर के साथ दादा जौरा गए ! दादा के पिताजी के मित्र काले साहब उस समय जौरा के एक विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे ! उनके घर रहकर तथा उनके सहयोग से दादा ने चिकित्सालय के अहाते में बालीबाल खेलने बाले कुछ नौजवानों से मित्रता स्थापित की ! उन नौजवानों के साथ पहले एक बालीबाल क्लब गठित किया ! इन युवकों में फूलचंद जैन. भगवती प्रसाद जैन, हरीराम गर्ग आदि थे ! कुछ समय बाद बालीबाल के बाद शाखा लगाना शुरू किया गया और समय बीतते बीतते क्लब के स्थान पर केवल शाखा रह गई ! बालीबाल खेलने बालों में अलापुर का एक नवयुवक भी था ! उसने दादा से अलापुर में भी शाखा शुरू करने की इच्छा व्यक्त की ! उसके साथ अलापुर जाकर दादा ने बहां भी शाखा शुरू की !

तब तक दादा केवल विस्तारक के रूप में गर्मी की छुट्टी में ही मुरैना आते थे ! १९४७ में पूर्णकालिक प्रचारक बनकर वे श्योपुर गए ! १९४६-४७ संघ कार्य विस्तार की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहे ! इस समय मुरार के स्वयंसेवक श्री नरेश जौहरी जौरा क्षेत्र में प्रचारक रूप में कार्य करने पहुंचे ! मुरार के ही श्री जगमोहन वाजपेई अम्बाह तहसील प्रचारक बने ! और मुरैना की व्यवस्था संभाली ग्वालियर के श्री गोपाल राव टेम्बे जी ने ! अक्टूबर १९४६ में टेम्बे जी मुरैना के जैन विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक नियुक्त हुए थे ! उस विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ने बाला केवल एक ही विद्यार्थी था ! प्राचार्य के सहयोगी रुख के कारण बह भी टेम्बे जी के आवास पर ही आकर पढ़ जाया करता था ! इस कारण टेम्बे जी को विद्यालय जाना ही नही पड़ता था और उन्हें संघ कार्य के लिये पर्याप्त समय उपलव्ध हो जाता था ! यद्यपि दादा बेलापुरकर के समय मुरैना के अनेक तरुण संघ से सम्बद्ध हो गए थे किन्तु उनके श्योपुर चले जाने के बाद सब बिखर गए थे ! केवल एक प्रभात शाखा लग रही थी ! मुरैना पहुंचे टेम्बे जी को सायं शाखा लगाने के लिये नए सिरे से प्रयत्न करना पड़े !

जाहर सिंह शर्मा जैसे जोशीले नौजवान को आधार बनाकर टेम्बे जी ने काम शुरू किया ! जाहरसिंह जी के परिवार का आढत का काम था, जिसके कारण उनके परिवार का मुरैना में अच्छा प्रभाव था ! इसी दौरान रामप्रकाश भट्टजीबाले, उनके दोनों भाई तथा गेंदालाल गोलस, जोटाईबाले केदारनाथ भी स्वयंसेवक बने ! टेम्बे जी दंड और खड्ग में सिद्ध हस्त थे ! इसी कारण शाखा में आने बाले स्वयंसेवकों की संख्या निरंतर बढ़ती ही गई ! पहले रेलवे स्टेशन के पश्चिम में खाली पड़े मैदान में तथा बाद में जैन विद्यालय के प्रांगण में लगने बाली शाखा में सारे कार्यक्रम व्यवस्थित रूप से होने लगे ! इसके बाद पुराने बस स्टेंड के पास भी एक शाखा प्रारम्भ कर दी गई ! इस शाखा के मुख्य शिक्षक गंगानगर (राजस्थान) के मूल निवासी श्री जगदीश गुप्ता "भाई साहब" थे !

अनूठा कार्यालय -

टेम्बे जी ने अपने रहने के लिये जो आवास बनाया, बही मुरैना का पहला कार्यालय बना ! देश भर के संघ कार्यालयों के इतिहास में यह सबसे अनूठा था ! लोहिया बाज़ार में बाबूलाल छंगाराम के मकान में ग्राउंड फ्लोर पर दूकाने थी तथा पहली मंजिल पर रुई का गोदाम तथा दूसरी मंजिल पर एक कमरा था ! उस गोदाम में आग लग जाने कारण ऊपर जाने बाली सीढी पूरी तरह टूट गई थी ! तीसरी मंजिल पर जाना किसी पहाडी पर चढ़ने के समान था ! तीसरी मंजिल का बही कमरा स्वयंसेवक होने के नाते गृह स्वामी बाबूलाल जी ने टेम्बे जी को बिना किराए के दे रखा था ! टेम्बे जी ने कमरे तक पहुँचने के लिये एक रस्सा सीढी के पास बांध दिया था ! उस रस्से के सहारे ही बचीखुची सीढियों पर पाँव टिकाते उस आवास तक पहुँचना सम्भव हो पाता था ! यही था उनका आवास और मुरैना का पहला संघ कार्यालय !

बाद में हनुमान चौराहे के पीछे सिकरवारी बाज़ार के कोने पर एक मकान किराए पर लिया गया ! इसके बाद प्रतिवंध काल तक लोहिया बाज़ार में फूलसिंह मृगपुरा बालों के मकान में कार्यालय रहा ! अब गांधी कालोनी में संघ का अपना स्वयं का कार्यालय भवन निर्मित हो चुका है !

संघ शिक्षा वर्ग -

सन १९५७ में सर्व प्रथम श्री कृष्ण कुमार जी अष्ठाना, श्री राजेन्द्र गुप्ता और राम प्रकाश गुप्ता(सर्राफ) ने जयपुर से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग किया ! कुछ तो मुरैना में संघ कार्य बिलम्ब से शुरू हुआ और कुछ यह इलाका दस्यु प्रभावित भी रहा, इस कारण संघ शिक्षा वर्ग जाने का सिलसिला कुछ बिलम्ब से शुरू हुआ ! अष्ठाना जी को भी बिना परिवार की अनुमति लिये कालेज टूर का बहाना बनाकर ही प्रथम वर्ष जाना पडा ! मार्गव्यय के लिये भी मित्रों से उधार लेकर व्यवस्था की ! किन्तु अगले वर्ष १९५८ में उनकी दृढ इच्छा देखकर पिताजी ने अनुमति तो दे दी किन्तु आवश्यक व्यय इस बार भी बाबूलाल जी गुप्ता से उधार लेकर ही सम्भव हुआ ! १९५९ में अष्ठाना जी अडोखर में शिक्षक नियुक्त हो चुके थे ! विगत दो वर्षों में ली गई उधारी भी पटाई जा चुकी थी, किन्तु बहिन की शादी के लिये प्रयत्न पहले करने की पिताजी की इच्छा थी ! सहकर्मी चिकटे जी और ग्वालियर के तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री मिश्रीलाल जी तिवारी जी के साथ तृतीय वर्ष करने के संकल्प के कारण अष्ठाना जी इस बार भी जैसे तैसे पिताजी के कहे वाक्य "जैसा ठीक समझो करो" को अनुमति मानकर नागपुर रवाना हो ही गए !

संघ कार्य की दृष्टि से १९८९ तक मुरैना बृहद ग्वालियर के अंतर्गत ही आता था किन्तु १९८९ से १९९३ तक उस समय बनाए गए भिंड विभाग में सम्मिलित रहा ! श्री विजय जी शर्मा इस दौरान विभाग प्रचारक रहे ! श्री राधेश्याम गुप्ता ने इस दौरान विभाग कार्यवाह का दायित्व निर्वाह किया ! १९९३ में पुनः वृहद ग्वालियर विभाग गठित किया गया जो २००७ तक रहा ! २००७ में गठित मुरैना विभाग के प्रथम विभाग प्रचारक श्री गणेश मिश्रा नियुक्त हुए ! उनके बाद वर्तमान में २०११ से श्री अशोक पोरवाल यह उत्तर दायित्व निर्वाह कर रहे हैं ! कृष्ण विहारी लाल श्रीवास्तव तथा श्री हरिश्चंद्र शर्मा विभाग कार्यवाह रहे हैं तथा श्री राधेश्याम गुप्ता व श्री सुरेश जैन ने विभाग संघ चालक का दायित्व निर्वहन किया है !
मुरैना विभाग में चार जिले समाहित हैं ! मुरैना, भिंड, दतिया और सबलगढ़ ! शासकीय दृष्टि से सबलगढ़ जिला नही है ! बह श्योपुर जिले की एक तहसील है किन्तु संघ कार्य में सुविधा की दृष्टि से उसे मुरैना जिले में  जोड़ा गया है !

एक अनूठा आयोजन –

विभाग प्रचारक श्री अशोक पोडवाल की प्रेरणा से २८ दिसंबर २०१० से एक साहसिक साईकिल यात्रा का आयोजन हुआ ! पीताम्बरा पीठ पर जिला संघचालक मा.गोविंदराव काले ने इस यात्रा को प्रारम्भ किया ! १४ दिवसीय इस यात्रा में कुल ३१६ कि.मी. की दूरी तय की गई ! प्रतिदिन न्यूनतम १५ कि.मी. से अधिकतम ३५ कि.मी. दूरी यह यात्रा चली ! यात्रा के दौरान कुल ४६ नुक्कड़ सभाओं के माध्यम से अस्प्रश्यता निवारण, पर्यावरण सुरक्षा, स्वदेशी, ग्राम विकास तथा हिंदुत्व आदि विषयों पर जन चेतना जाग्रत करने का प्रयत्न हुआ ! कुल ७१ वक्ताओं ने इन सभाओं को संबोधित किया ! जहां भी रात्रि विश्राम होता बहां तहसील बैठकें आयोजित की जातीं तथा प्रत्येक पड़ाव स्थल पर एकत्रीकरण कर शाखा लगाई जाती ! इस कार्यक्रम में कुल २०३ कार्यकर्ताओं ने भाग लिया ! दतिया से प्रारम्भ होकर यह यात्रा इन्दरगढ़, सेंवढा, लहार, रौन, ऊमरी, भिंड, मेहगांव, गोरमी, पोरसा, अम्बाह, मुरैना, जौरा, केलारस तथा सबलगढ़ पहुँची ! इस प्रकार इस यात्रा द्वारा सम्पूर्ण मुरैना विभाग में संपर्क हुआ ! साईकिल यात्रा में विभाग संघचालक मा. सुरेश जैन तथा विभाग कार्यवाह श्री हरिश्चंद्र शर्मा भी साईकिल यात्री के रूप में सम्मिलित हुए !

साईकिलों पर लगी तख्तियों में नारे अंकित थे – कौन हमारे सुखदाता-धरती गंगा गौमाता, हम सब भारत मां के लाल-भेदभाव का कहाँ सवाल, स्वदेशी अपनाएं-देशभक्त कहाएँ, जल है तो कल है, हिंदू घटा-देश बटा, बेटी ह्त्या क्यों ?, एक पेड दस पुत्र सामान आदि ! इसी प्रकार सेवाकार्य, पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, ऊर्जा संरक्षण, गौ संवर्धन, जैविक कृषि, सामाजिक समरसता तथा आतंरिक सुरक्षा आदि विषयों पर जन जागृति का प्रयत्न हुआ !

 

संघर्ष गाथा -

प्रथम प्रतिवंध -

प्रतिवंध लगने के बाद मुरैना से भली प्रकार परिचित टेम्बे जी को मुरैना भेजा गया ! उनकी प्रेरणा से जाहर सिंह शर्मा के नेतृत्व में पहला सत्याग्रही जत्था निकला जिसमें सर्व श्री थोलू राम, लक्ष्मी नारायण वर्मा, सीताराम गोयल, ओमप्रकाश गोयल, किशनलाल कुम्हार, राम प्रकाश भट्टजीवाले, गेंदालाल गोलस आदि शामिल थे ! सरकारी कार्यालय में चपरासी होते हुए भी स्वयंसेवक रामचरण सत्याग्रह में शामिल हुए ! इनमें से चार को छः छः माह के कारावास की सजा हुई ! जौरा क्षेत्र के कई स्वयंसेवकों  ने भी मुरैना आकर सत्याग्रह में भाग लिया !

आपातकाल -
१९७५ में आपातकाल लगते ही सर्व श्री जाहर सिंह शर्मा, राम प्रकाश सर्राफ, राम कुमार मिश्र, बाबूलाल जी गुप्ता तथा उनके पुत्र राधेश्याम गुप्ता, रामजीलाल मंगल, स्व. रामनाथ सिंह सिकरवार, स्व. पदम् गंगिल, श्यामबाबू गोयल, राजाराम बांदिल, सीताराम गोयल, हरिचरण शर्मा,रमेश चन्द्र अग्रवाल अम्बाह, रामनाथ शर्मा दिमनी,शांती लाल अग्रवाल एडवोकेट जौरा, बृजराज सिंह केलारस, गंजरामपुर के फेरनसिंह सहित ५ स्वयंसेवक, गिरफ्तार हुए ! कुल २५ लोगों की मीसा में गिरफ्तारी हुई ! 

मुरैना से सात तथा जौरा से छः स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह करके गिरफ्तारी दी ! श्री सीताराम गोयल ने पत्नी के देहांत के बाद भी सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी ! 

प्रेरक प्रसंग -

* मुरैना हाईस्कूल के छात्रावास में अधिकाँश क्षत्रिय समाज के ग्रामीण छात्र रहते थे ! इस कारण इसे राजपूत बोर्डिंग के नाम से जाना जाता था ! टेम्बे जी ने जब उनसे संघ के बारे में चर्चा की तो वे संघ के विचारों से तो सहमत हुए किन्तु शाखा में बनियों के लड़कों के साथ खेलने के स्थान पर अपनी अलग रात्री शाखा लगाने की शर्त रखी ! टेम्बे जी ने उनसे कहा रात्री शाखा लगाने में बैसे तो कोई दिक्कत नही है किन्तु अँधेरे में खेलोगे कैसे ? इस पर उन्होंने गैस बत्ती की व्यवस्था कर ली ! बस फिर क्या था, शुरू हो गई राजपूत छात्रावास में ही रात्रि कालीन शाखा ! प्रारम्भ में तो इन छात्रों ने केवल तलवार सीखने के उद्देश्य से ही यह शाखा प्रारम्भ करबाई थी, किन्तु टेम्बे जी के संपर्क में आकर संघ विचारों से एकाकार हो शीघ्र ही वे अच्छे स्वयंसेवक बन गए और शेष समाज से स्वयं को श्रेष्ठ मानने का उनका अहंकार भी विलोपित हो गया ! देखते देखते बह रात्री शाखा भी सायं शाखा में परिवर्तित हो गई ! इन स्वयंसेवकों में से उदयसिंह तथा धर्म सिंह नामक दो छात्र अच्छे स्वयंसेवक बने ! 

* युगबोध के सम्पादक श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना मूलतः मुरैना के ही स्वयंसेवक हैं ! प्रारम्भ में दुबले पतले और संकोची कृष्ण कुमार जी को उनके पिताजी ने स्वास्थ्य लाभ की दृष्टि से शाखा जाने को प्रेरित किया, किन्तु किसी ने उन्हें भड़का दिया कि संघ पर गांधी ह्त्या का आरोप है, जिसके कारण बहां जाने बालों को शासकीय नौकरी नहीं मिलती है ! अपने पुत्र को शासकीय सर्विस में भेजने की इच्छा रखने बाले पिताजी ने उनका शाखा जाना बंद करा दिया ! किन्तु तब तक कृष्ण कुमार जी संघ के विचारों से ओतप्रोत हो चुके थे ! उन्होंने नेकर के ऊपर पाजामा पहिन कर घूमने जाने के बहाने शाखा जाना शुरू कर दिया ! इसी बीच प्रांत प्रचारक श्री केशवराव जी गोरे का मुरैना आगमन हुआ तथा वे भोजन के लिये इनके घर पर पधारे ! चर्चाओं में उन्होंने ना जाने क्या जादू किया कि पिताजी ने स्वयं बुलाकर कृष्ण कुमार जी को कहा कि रोज शाखा जाया करो !

 

प्रमुख कार्यक्रम –


* ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के मुख्य आतिथ्य में २१ नवम्बर १९४७ को जीवाजीगंज के तवरघार ब्लोक के मैदान में संघ का एतिहासिक कार्यक्रम हुआ ! उस समय की दृष्टि से यह एक उल्लेखनीय घटना थी, क्योंकि पहलीबार किसी संगठन के कार्यक्रम में खुले मंच पर महाराजा श्री सिंधिया उपस्थित हुए थे ! मंच पर उनके दाहिनी ओर विभाग प्रचारक भैयाजी तथा बाईं ओर ग्वालियर संघ चालक श्री कृष्णराव महादेव शेजवलकर एडवोकेट थे ! कार्यक्रम में मुरैना के अतिरिक्त भिंड तथा ग्वालियर के भी स्वयंसेवक गणवेश में सम्मिलित थे ! अकेले ग्वालियर से ६०० स्वयंसेवक कार्यक्रम में भाग लेने आये थे ! पूरा मैदान दर्शकों से ठसाठस भरा हुआ था ! मैदान के चारों ओर के मकानों की छतों पर भी महिलायें बैठी हुई थीं ! स्वयंसेवकों  ने प्रभावी ढंग से शारीरिक कार्यक्रम किये ! संघ के घोष ने भी सबका मन मोह लिया ! व्यक्तिगत गीत के बाद विभाग प्रचारक भैयाजी सहस्त्रबुद्धे ने  संघ कार्य के आधारभूत तथ्यों का विवेचन करते हुए संघ कार्य के महत्व को रेखांकित किया ! महाराज स्वयं सेवकों के कार्यक्रम तथा भैयाजी के सार गर्भित भाषण से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने अपने उद्बोधन में संघ के अनुशासन की भूरि भूरि प्रशंसा की ! उन्होंने संघ कार्य के यशस्वी होने की शुभ कामना भी दी तथा सभी से संघ कार्य में सहयोग देने का आह्वान भी किया ! कार्यक्रम का संचालन बाबा साहब राजबाड़े ने किया !

* २८ जनवरी १९४८ को माननीय भाऊराव जी देवरस का मुरैना में प्रवास हुआ ! स्थानीय संस्कृत महाविद्यालय प्रांगण में स्वयंसेवकों के शारीरिक कार्यक्रम उपरांत मा. भाऊराव जी का बौद्धिक हुआ !

* सन १९६२-६३ में प.पू.सर संघ चालक श्री गुरूजी का मुरैना प्रवास हुआ ! ग्वालियर जिले के स्वयं सेवकों को भी इसमें सम्मिलित होना था ! इस कारण अनेक धर्मशालाओं तथा सार्वजनिक स्थानों पर आवास व्यवस्था की गई ! कार्यक्रम के लिये पंचायती धर्मशाला का अहाता तय हुआ ! कई दिन तक ठेलों से मिट्टी आदि डालकर स्थान को समतल बनाया गया तथा सामर्थ्य भर सजाया संवारा गया ! किन्तु तभी आई भीषण वारिश ने मैदान में बिछाई गई मिट्टी को कीचड़ में बदल दिया ! बैठने लायक स्थान भी नहीं बचा ! दोपहर बाद वर्षा थमने पर धर्मशाला की छत पर कार्यक्रम किया गया !

बौद्धिक से १५ मिनट पूर्व स्वयंसेवकों को कार्यक्रम स्थल पर पहुँचने की सूचना थी ! किन्तु बसती गृह की अधिक दूरी तथा स्थान ढूँढने में कठिनाई होने के कारण ग्वालियर के कुछ स्वयं सेवकों को बिलम्ब हो गया ! प्रवेश द्वार पर व्यवस्था में तैनात कार्यकर्ताओं ने उन्हें प्रवेश नहीं दिया ! प्रांत प्रचारक केशवराव जी गोरे ने नगर कार्यवाह श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना जी से कहा की "तुम चाहो तो बाहर खड़े स्वयं सेवकों को अन्दर आने की अनुमति दे सकते हो ! अभी श्री गुरू जी के आने में समय है ! इन लोगों से बाद में बात करेंगे ! कार्यकर्ता को गढ़ने में बहुत समय लगता है , तोड़ने का काम तो एक झटके में हो जाता है !" अष्ठाना जी ने द्वार खुलवा दिया और गोरे जी द्वारा कहे गए शब्दों को सूक्ति वाक्य के रूप में ह्रदय में बसा लिया ! गोरे जी चाहते तो स्वयं द्वार खुलबा सकते थे किन्तु व्यवस्था की जिम्मेदारी देख रहे अष्ठाना जी से ही यह कार्य करबाना उचित समझा ! यही पद्धति है संघ की ! स्वयं को पीछे रखकर कार्यकर्ता को गढ़ने की !

मुरैना में दायित्व लेकर संघ कार्य को पल्लवित पुष्पित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करने बाले कार्यकर्ता -

जिला संघ चालक -

(१) मा. बाबूलाल गुप्ता (२) स्व.श्रीराम जी सर्राफ (३) स्व. रामप्रकाश जी सर्राफ (४) मा. दलवीर सिंह तोमर (५) मा. रामअवतार सिंह गुर्जर 

जिला कार्यवाह -

(१) श्री बाबूलाल गुप्ता (२) श्री भगवान दास गुप्ता (३) श्री लक्ष्मीनारायण हर्षाना (४) श्री राम कुमार मिश्रा (५) श्री राम अख्त्यार सिंह गुर्जर (६) श्री राजीव डंडौतिया (७) स्व.रामनारायण जी शर्मा (८) श्री संजीव मिश्र 

जिला प्रचारक -

(१) श्री शंकर विनायक बेलापुरकर (२) श्री दादा गणपतराव दहीफले (३) श्री शरद लघाटे (४) श्री कृष्ण मुरारी मोघे (५) श्री ओम प्रकाश गुप्ता (६) श्री श्रीराम अरावकर (७) श्री राज कुमार जैन (८) श्री माधव सिंह दांगी (९) श्री अरविंद कोठेकर (१०) श्री ओमप्रकाश सिसौदिया (११) श्री गणेश मिश्रा (१२) श्री राजेश शर्मा !

 मुरैना से निकले प्रचारक -

श्री बालमुकुन्द झा १९६८ से सतत, श्री विष्णुदत्त शर्मा १९९५ से सतत, श्री हरि प्रसाद गुप्ता १९९९ से सतत, श्री नंददास डंडौतिया, श्री जितेन्द्र जादौन ग्राम सुमावली २००४ से सतत, श्री पंकज शर्मा २००३ से सतत  

विस्तारक गण –

श्री राज किशोर सविता, श्री रवि गुप्ता, श्री संजीव मिश्रा, श्री  राधेश्याम गुप्ता, श्री विवेक शर्मा, श्री दिनेश शर्मा ग्राम दोहरी, श्री विशम्भर दयाल राजपूत, श्री दिलीप तोमर ग्राम कोंथर, श्री देवेन्द्र शर्मा, श्री दलवीर सिंह तोमर,