अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ

दिंनाक: 04 Oct 2016 18:07:24

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ

केन्द्रीय कार्यालय – शैक्षिक महासंघ सदन, 606/13, कृष्णा गली न.9, मौजपुर

दिल्ली – 110053

दूरभाष – 011-22914799         website: www.abrsm.in         

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पूर्व प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक के सम्पूर्ण राष्ट्र के शिक्षकों का राष्ट्रवादी एवं भारतीयता से ओतप्रोत संगठन अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ का विधिवत प्रारंभ वर्ष 1988 में हुआ | 23 राज्यों के 35 राज्यस्तरीय संगठन तथा 54 विश्वविद्यालय संगठन महासंघ से सम्बद्ध हैं और 80 से अधिक विश्वविद्यालयों में संपर्क है |

29 सितम्बर 2013 को नागपुर में संपन्न महासंघ की राष्ट्रीय साधारण सभा ने तीन प्रस्ताव पारित कर आवश्यक कार्यवाही के लिए सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों/ शिक्षामंत्रियों एवं भारत सरकार के प्रधानमंत्री तथा मानव संसाधन विकास मंत्री को प्रेषित किया –

1 मिड डे मील योजना का प्रभावी, पारदर्शी एवं कुशल प्रबंधन हो

2 शाश्वत जीवन मूल्यों से युक्त शिक्षा पद्धति की पुनः संरचना आवश्यक

3 उच्च शिक्षा में पिछले दरवाजे से विदेशी विश्वविद्यालयों एवं देश के व्यावसायिक संस्थानों के प्रवेश के आदेशों को वापस लिया जाए |

12 जनवरी से 23 जनवरी (स्वामी विवेकानंद जयन्ती से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जयन्ती) के मध्य कर्तव्य बोध दिवस के कार्यक्रम महासंघ के सभी सम्बद्ध संगठनों की नीचे तक की इकाईयों द्वारा संपन्न किये गए |

इसी वर्ष जन जागरण के लिए “शाश्वत जीवन मूल्य (Eternal Values) विषय को स्वीकार किया गया है | इसकी विस्तृत रूपरेखा बनाकर सभी सम्बद्ध संगठनों को इस योजना को क्रियान्वित करने का आग्रह किया गया है |

शिक्षाविदों/ विषय विशेषज्ञों के डेटा बेंक को अधिक व्यापक बनाने के उद्देश्य से इस वर्ष से देश भर के प्रमुख शिक्षाविद/ विषय विशेषज्ञ अपना प्रोफाईल सीधे महासंघ की वेवसाईट abrsm.in पर अपलोड कर रहे हैं | इस डेटा बेंक का उपयोग आवश्यकतानुसार किया जा रहा है | अगले वर्ष से इसे समविचारी अन्य संगठनों को भी उपलब्ध कराने की योजना है |

संसद के समक्ष जंतर-मंतर नई दिल्ली पर 25 अप्रेल 2013 को धरना-प्रदर्शन के पश्चात मा. प्रधानमंत्री जी को दिया गया मांगपत्र

  1. राष्ट्रीय अस्मिता, भारतीय जीवन मूल्यों, मानव एवं चरित्र निर्माण, सामाजिक सरोकार, मौलिक चिंतन, शोध एवं नवाचार से युक्त सम्पूर्ण शिक्षा पद्धति की पुनःसंरचना की जाये |

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था सूचना सम्प्रेषण तक सीमित होती जा रही है | शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य मानव एवं चरित्र निर्माण की द्रष्टि से शिक्षा हाशिये पर चली गई है | उत्सुकता, समीक्षा, आलोचना, दृष्टि, कल्पना, मौलिक चिंतन, नवाचार, अनुसंधान, राष्ट्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक मूल्यों एवं सामाजिक सरोकार की दृष्टि से शिक्षा बिलकुल खोखली प्रतीत हो रही है | मानव निर्माण के लिए शिक्षा में राष्ट्रीय अस्मिता, भारतीय जीवन मूल्यों, सामाजिक निर्माण, मौलिक चिंतन, शोध एवं नवाचार से ओत-प्रोत शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना आज की अहम् आवश्यकता है |

  1. शिक्षा व्यवस्था के नियोजन, नियमन एवं नियंत्रण के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा शिक्षाविदों से युक्त स्वतंत्र एवं स्वायत्त शिक्षा आयोग का निर्माण हो |

पिछले वर्षों में निजी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ सी आ गई है | नियमन एवं नियंत्रण की लचर व्यवस्था के कारण सैंकड़ों विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों ने शिक्षा को धन कमाने का व्यवसाय बना लिया है | इन शिक्षण संस्थाओं का शिक्षा से कोई गंभीर सरोकार नहीं है और शिक्षार्थी व अभिभावक पूर्ण रूप से निराश एवं असहाय हैं | शिक्षा संस्थाओं के प्रारम्भ, संचालन, शुल्क का ढांचा, पाठ्यक्रम, वेतन निर्धारण, फैकल्टी चयन आदि यातो निजी प्रबंधन की मनमानी का शिकार हैं या केंद्र एवं राज्य सरकारों के अधिकार में | शिक्षा को बचाने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा शिक्षाविदों से युक्त स्वतंत्र एवं स्वायत्त नियामक आयोग का निर्माण किया जाना आवश्यक है, जिससे कि सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को नियमित एवं नियंत्रित किया जा सके |

  1. सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) का 15 प्रतिशत केंद्र सरकार तथा राज्य अपने बजट का 30 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय सुनिश्चित करे ताकि आधारभूत सुविधाएं जैसे शिक्षक, पुस्तकें, भवन, खेल के मैदान आदि उपलब्ध हो सकें |

स्वतन्त्रता प्राप्ति के 65 वर्ष पश्चात भी शिक्षा शिक्षकों, पुस्तकों, भवनों, खेल के मैदानों को तरस रही है | उभरती हुई अर्थ व्यवस्था के बावजूद केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा सकल घरेलू आय का 04 प्रतिशत से कम शिक्षा पर खर्च किया जा रहा है | इससे हजारों लोग ज्ञान अर्जन से वंचित हो रहे हैं और शोध, अनुसंधान एवं नवाचार बुरी तरह से प्रभावित हो रहे हैं | शिक्षा की गुणवत्ता तार तार होती दिख रही है और सम्पूर्ण जगत को ज्ञान देने वाले भारत के विद्यार्थियों की स्थिति आज संसार के आख़िरी कुछ देशों में की जा रही है | स्थिति में सुधार के लिए देश की सकल राष्ट्रीय आय का 15 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च किया जाना अतिआवश्यक है |

  1. सम्पूर्ण देश में शिक्षा की स्वायत्तता को बहाल किया जाए एवं शिक्षा संबंधी सभी निर्णयों में शिक्षकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए तथा राजनैतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप बंद हो |

आज शिक्षा राजनैतिक एवं प्रशासनिक हस्तक्षेप से त्रस्त है और सभी शैक्षणिक निर्णयों में इन्ही का एकाधिकार है | यहाँ तक कि आजकल तो पाठ्यक्रमों का निर्धारण भी सरकार करने लगी है | शिक्षा की स्वायत्तता को बहाल करने के लिए इसे पूर्ण रूप से सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त करना होगा | सभी शैक्षणिक निर्णयों में शिक्षकों की सक्रिय सहभागिता को सुनिश्चित करना होगा और शिक्षा व्यवस्था में प्रजातंत्रीय व्यवस्था को स्वीकार करना होगा |

  1. निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के प्रावधानों को सुसंगत एवं व्यवहारिक बनाया जाए तथा उनकी पालना सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संसाधन एवं सुविधाएं प्रदान की जाए |

निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार क़ानून का हम स्वागत करते हैं लेकिन इसमें कुछ ऐसे प्रावधान हैं जिन्हें व्यवहारिक एवं सुसंगत बनाने की आवश्यकता है | आठवीं तक किसी विद्यार्थी को अनुत्तीर्ण न करने के निर्णय, समग्र मूल्यांकन के अंतर्गत शिक्षकों को औपचारिकताओं में समय व्यतीत करने, अधिनियम के सफल क्रियान्वयन के लिए आधारभूत सुविधाओं की कमी के विन्दुओं पर समग्र रूप से विचार करने की आवश्यकता है | इस क़ानून को व्यवहारिक बनाने के लिए कसके कुछ प्रावधानों पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है |

  1. प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए |

बच्चा अपनी मातृभाषा में अधिक आसानी से सीखता है और इससे उसकी सृजन करने की शक्ति में वृद्धि होती है, अतः प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए |

  1. देश के सभी महाविद्यालयों में विभिन्न शिक्षक पदों का नामकरण एक सामान यू.जी.सी. की अनुशंसा के अनुरूप सहायक प्रोफ़ेसर, एसोसियेट प्रोफ़ेसर तथा प्रोफ़ेसर के रूप में किया जाए |

यू.जी.सी. द्वारा शिक्षा पर समग्र रूप से विचार करते हुए सम्पूर्ण देश में एक समान पदनामों के अपनाने की अनुशंसा इस अपेक्षा से की थी जिससे अलग-अलग नामों से जाने जाने वाले शिक्षकों के पदनाम में एकरूपता लाई जा सके | पदनाम बदलने के निर्णय से सरकार पर किसी भी प्रकार का वित्तीय भार नहीं आयेगा और इससे उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार भी होगा | महाविद्यालयों में सहायक प्रोफ़ेसर, एसोसियेट प्रोफेसर तथा प्रोफ़ेसर के पदनाम देने से न केवल पदों की भ्रान्ति दूर होगी बल्कि सम्पूर्ण देश में पदनामों में एकरूपता भी आयेगी |

  1. अनुदानित विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में शिक्षकों को वेतन भुगतान की कोषागार भुगतान व्यवस्था हो |

अनुदानित विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में वितान भुगतान में अनेक विसंगतियां पनपी हैं और इनके कारण अनेक शिक्षण संस्थान शिक्षकों का शोषण करने से नहीं हिचकते हैं | सभी शिक्षकों को वेतन का पूर्ण एवं नियमित भुगतान सुनिश्चित करने के लिए वेतन के भुगतान की कोषागार व्यवस्था किया जाना श्रेयस्कर रहेगा |

  1. शिक्षा के बाजारीकरण पर नियंत्रण सुनिश्चित हो |

शिक्षा के बाजारीकरण के दुष्परिणाम अब देश में दिखने लगे हैं | आज शिक्षण संस्थाएं डिग्री एवं सर्टीफिकेट बांटने vaali संस्थान बनती जा रही हैं | इनके नियमन एवं नियंत्रण की ऐसी व्यवस्था हो जिससे शिक्षा व्यापार का विषय न बने | शिक्षा व्यवस्था के नियोजन एवं नियंत्रण में केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा शिक्षाविदों से युक्त स्वतंत्र व स्वायत्त नियामक शिक्षा आयोग उपयोगी भूमिका निभा सकता है |

  1. सम्पूर्ण देश में एक समान राष्ट्रीय वेतनमान नीति लागू की जाए और सम्पूर्ण देश में समान सेवा शर्तें एवं अन्य सुविधाएं प्रदान की जाये |

देश के भिन्न भिन्न राज्यों में शिक्षकों के वेतनमानों एवं सेवा शर्तों में अनेक प्रकार की विसंगतियां हैं | इनके वेतनमान भिन्न भिन्न हैं और सेवा शर्तों में अनेक प्रकार की भिन्नताएं हैं | सामान कार्य के लिए सामान वेतन के सिद्धांत का पालन करते हुए सम्पूर्ण देश में शिक्षकों के लिए सामान वेतनमान नीति लागू किये जाने की आवश्यकता है | इससे सम्पूर्ण देश में सामान वेतनमान, सेवाशर्तों एवं सुविधाओं की पालना सुनिश्चित की जा सकेगी |

  1. देश के सभी राज्यों एवं केंद्र में प्राथमिक, माध्यमिक, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय शिक्षकों के लाखों पद रिक्त हैं | सम्बंधित सरकारें वेतनमानों के आर्थिक भार से बचने के उद्देश्य से विद्यार्थी मित्र, पैराटीचर, संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, प्रबोधक, शिक्षा मित्र, अंशकालीन शिक्षक आदि नामों से अस्थाई व्यवस्था कर रही है | शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए इस व्यवस्था को तुरंत समाप्त किया जाए और इसके लिए शिक्षक-शिक्षार्थी अनुपात को सुधारकर 1:30 किया जाए तथा सभी विषयों के अध्यापकों एवं प्राध्यापकों की नियमित एवं स्थाई नियुक्ति की जाये और शिक्षकों के प्रशिक्षण कि सुद्रढ़ व्यवस्था हो |

आज लाखों पद पूरे देश में रिक्त पड़े हुए हैं और इनके स्थान पर अस्थाई व्यवस्था के आधार पर काम चलाया जा रहा है | इससे शिक्षा की गुणवत्ता का ह्रास तो हो ही रहा है, परानु शिक्षा का सम्पूर्ण ढांचा ही चरमरा गया है | कामचलाऊ व्यवस्था के स्थान पर शिक्षकों की नियमित एवं स्थाई नियुक्ति की आवश्यकता है | शिक्षा में गुणवत्ता के लिए सभी स्तरों पर शिक्षकों के प्रशिक्षण कीई ऐसी व्यवस्था हो जिससे शिक्षक शिक्षार्थी के सम्पूर्ण विकास में सकारात्मक योगदान कर सके एवं नवीनतम ज्ञान से उनका परिमार्जन कर सके |

  1. सम्पूर्ण देश में शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु एक सामान 65 वर्ष की जाए |

देश के विभिन्न राज्यों में विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय शिक्षकों की सेवानिवृत्ति आयु अलग-अलग है | राजस्थान में 60 वर्ष, केरल में 55 वर्ष, उड़ीसा में 58 वर्ष, उत्तरप्रदेश में 62 वर्ष, बिहार और केंद्र सरकार में 65 वर्ष है | शिक्षण संस्थाओं में शिक्षकों की कमी की स्थिति से निबटने, उनके अनुभव का लाभ उठाने एवं शिक्षा के केरियर को अधिक आकर्षक बनाने की द्रष्टि से सम्पूर्ण देश में शिक्षकों की सेवा निवृत्ति आयु एक सामान 65 वर्ष की जानी चाहिए | जीवन प्रत्याशा में अनवरत वृद्धि तथा शिक्षा सेवा में प्रवेश की आयु में हो रही वृद्धि के कारण सेवा निवृत्ति की आयु 65 वर्ष करना न्यायोचित होगा |

  1. 1 जनवरी 2004 से पूर्व की पेंशन योजना सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में बहाल की जाए |

नवीन पेंशन योजना एक प्रतिगामी कदम है | इसके स्थान पर 1 जनवरी 2004 से पूर्व की पेंशन योजना को सभी शिक्षकों के लिए बहाल किया जाये ताकि भारत के कल्याणकारी राज्य की संकल्पना को सही साबित किया जा सके |

  1. सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को समुचित चिकित्सा सुविधा के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य कार्ड की सुविधा प्रदत्त की जाए एवं उसका प्रभावी क्रियान्वयन हो |

उचित चिकित्सा सुविधा मुहैया कराया जाना शिक्षकों की क्षमता में अभिवृद्धि करेगा, अतः सभी शिक्षकों के लिए समुचित चिकित्सा सुविधा की कारगर एवं व्यवहारिक व्यवस्था की जानी चाहिए |

  1. विद्यार्थी मित्र, पैराटीचर, संविदा शिक्षक, अतिथि शिक्षक, प्रबोधक, शिक्षा मित्र, अंशकालीन शिक्षक, शिक्षाकर्मी आदि नामों से कार्य करने वाले शिक्षकों को न्यूनतम वेतन एवं सेवाशर्तों का अविलम्ब निर्धारण कर उनका पालन सुनिश्चित किया जाए |

अनेक नामों से जाने जाने वाले अस्थाई शिक्षक अल्प वेतन एवं नाम मात्र की सुविधाओं के आधार पर कार्य कर रहे हैं, जिससे जीवन यापन करना भी संभव नहीं हो पा रहा है | इसके अलावा वे नियोक्ता के शोषण के शिकार भी हो रहे हैं | जब तक इनके स्थान पर नियमित एवं स्थाई नियुक्ति हो तब तक इन्हें एक आधारभूत वेतनमान एवं सेवाशर्तें सुनिश्चित करने की व्यवस्था करनी होगी जिससे वे समाज में सम्मान से रह सकें |