"ह्रदय को उचित पोषण मिलता है सदा हरित अर्जुन से"

दिंनाक: 10 Dec 2016 20:25:38


"आम बोलचाल की भाषा में कहुआ और सादड़ो के नाम से जाना जाने वाला अर्जुन धवल ,ककुभ और नदिसर्ज़ आदि नामों से भी पुकारा जाता है" l लगभग 60 से 80 फुट ऊँचाई वाले इस पेड़ को नदिसर्ज़ इसीलिए कहते हैं क्योंकि यह प्रायः नदी-नालों के किनारे होता है l यह वृक्ष हिमालय की तराई ,शुष्क पहाड़ी क्षेत्रों में नालों के किनारे तथा अधिक संख्या में मध्यप्रदेश,बिहार आदि राज्यों में पाया जाता है l इस सदारहित वृक्ष की छाल ही प्रायः विभिन्न रोगों के उपचार में प्रयोग की जाती है l एक बार इस पेड़ की छाल उतार लेने के बाद दुबारा छाल आने के लिए कम से कम दो वर्षा ऋतुओं का समय लगता हैl एक वृक्ष में छाल तीन साल के चक्र में मिलती है l इसकी छाल बाहर से सफ़ेद तथा भीतर से चिकनी ,मोटी तथा हलके गुलाबी रंग की होती है जिसकी मोटाई लगभग 5 मिलीमीटर होती है l इसका स्वाद कसैला तथा तीखा होता है lबसंत ऋतु में इस वृक्ष में फल आते हैं जो सर्दियों में पकते हैं l यह फल ही इस वृक्ष का बीज होता हैl बीटा साइटोस्टेरोल,अर्जुनिक अम्ल तथा फिन्डालीन आदि अर्जुन की छाल में पाए जाने वाले प्रमुख घटक है l इसमे उपस्तिथ अर्जुनिक अम्ल ग्लूकोज के साथ एक ग्लूकोसाइड बनाता है जिसे अर्जुनिक कहा जाता है l इसके अतिरिक्त इसकी छाल का 20 से 25 प्रतिशत भाग टैनिन्स से बना होता है और कैल्शियम कार्बोनेट ,सोडियम,मैग्नीशियम तथा एल्युमिनियम भी इसमें पाए जाते हैं l चूँकि छाल में कैल्शियम-सोडियम प्रचुर मात्र में होता है इसीलिए यह ह्रदय की मांसपेसियों के लिए बहुत लाभकारी होता है l

घी,दूध या गुड़ के साथ नियमित रूप से अर्जुन कि छाल के चूर्ण का सेवन करने से ह्रदय रोग ,जीर्ण ज्वर,रक्तपित्त आदि कभी नहीं होते l इसका सेवन मनुष्य को चिरंजीवी बनता है l ह्रदय रोगों में प्रयुक्त होने के कारण यह हृदय की मांसपेसियों के लिए एक टॉनिक प्रदान करता है l चिकित्सा की होमियोपैथी पद्धति के अन्दर अर्जुन को ह्रदय को बल प्रदान करने वाला माना गया है l विभिन्न ह्रदय रोगों विशेष रूप से त्रिया विकार तथा यांत्रिक अनियमितता से उत्पन्न विकारों के उपचार के लिए इसके तीन एक्स व तीसवी पोटेंसी का प्रयोग किया जाता है l अर्जुन से रक्तवाही नलिकाओं का संकुचन होता हैl  सूक्ष्म कोशिकाओं तथा छोटी धमनियों पर विशेष रूप से इसके प्रभाव से रक्त मिश्रण त्रिया बढती है l इससे ह्रदय को उचित पोषण मिलता है l यह ह्रदय के विराम काल को बढ़ाकर उसे बल देता है l अर्जुन का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह शरीर में इकठ्ठा नहीं होता अपितु मूत्र की मात्रा बढ़ाकर मूत्र के द्वारा बाहर निकल जाता है l इसी गुण के कारण यह उन रोगों में विशेष रूप से लाभकारी है जिसकी परिणिति हार्ट फैल के रूप में होती है l

ऐसा रोगी जिसकी ह्रदयपेशियाँ कमज़ोर हो या रक्त न मिलने के कारण म्रत्प्राय हों ,धमनियों का रक्तदाब कम हो गया हो व ह्रदय फूला हुआ हो ,उसे अर्जुन के सेवन से अत्याधिक लाभ मिलता है l यह केरोनरी धमनियों में रक्त प्रवाह बढ़ाकर ह्रदय को सामान्य बनाता है l आयुर्वेद के जानकारों के अनुसार ,पेट बढ़ने के रोग का कारण ह्रदय की दुर्बलता होती है तथा ह्रदय दुर्बल होता है मेड़ो वृद्धि से l अर्जुन इस दूषित चक्र को तोड़कर मेड़ो वृद्धि को रोक देता है और ह्रदय के रक्त स्त्रोतों को बल प्रदान करता हैl आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि अर्जुन से ह्रदय का स्पंदन ठीक व सबल होता है तथा उसकी प्रति मिनिट गति भी काम हो जाती है l स्ट्रोक वॉल्यूम तथा कार्डियक आउटपुट बढती है l अर्जुन में रक्त स्तंभक तथा प्रति रक्त स्तंभक दोनों ही गुण होते हैं l अति रक्तस्त्राव की स्तिथि में रूक्षता के कारण कोशिकाओं को टूटने से बचाने के लिए यह स्तंभक की भूमिका अदा करता है परन्तु कोरोनरी धमनियों में यह थक्का नहीं जमने देता तथा बढ़ी धमनी से प्रतिमिनिट भेजे जाने वाले रक्त की मात्र बढाता है l

ह्रदय में कमजोरी आने पर अर्जुन की छाल तथा गुड़ को दूध में मिलाकर औटाकर पिलाते हैं l ह्रदय शूल में अर्जुन की छाल को दूध में औटाकर देते हैं l सभी प्रकार के ह्रदय रोगों में अचूक औषधि है अर्जुन घृत l इसे बनाने के लिए आधा किलो अर्जुन की छाल को कूट पीस कर लगभग चार किलो पानी में पकाया जाता है l चौथाई जल बाकी बचने पर उसमे लगभग 50 ग्राम अर्जुन कल्क तथा 250 ग्राम गाय का घी मिलाकर पकाएं l यह रक्त पित्त भी दूर करता है l वासा की पत्तियों के रस में मिलाकर देने से यह टीबी की खासी दूर करता है l

अर्जुन कफ तथा पित्त प्रकोपों का भी शमन करता है l व्रणों में या बाह्य रक्तस्त्राव में इसके पत्तों का रस या त्वक चूर्ण का प्रयोग किया जाता हैl पेशाब की जलन तथा चर्म रोगों में इसका चूर्ण विशेष रूप से लाभकारी होता है l हड्डी टूटने पर इसकी छाल का स्वरस दूध के साथ रोगी को देतें हैं इससे सूजन व दर्द कम होते हैं तथा रोगी को जल्दी सामान्य होने में मदद मिलती है l