जन जन में पैठ बनाती "आरोग्य भारती"-डॉ अशोक कुमार वाषर्णेय

दिंनाक: 13 Dec 2016 21:18:24


सर्व सामान्य धारणा है,कि रोगी की निःशुल्क चिकित्सा करना ही स्वास्थ्य-सेवा है,परन्तु इसके साथ –साथ स्वस्थ व्यक्तियों को स्वस्थ बनाये रखना और अगर किसी कारण से छोटे-मोटे रोग होते है तो व्यक्ति स्वयं से प्रयास करके यथा दिनचर्या व्यवस्तिथ करके ,आहार –विहार को संयमित कर थोडा शारीरिक परिश्रम करते हुए अथवा परिवार में उपलब्ध सहज वस्तुओं द्वारा अपने को स्वस्थ रख सके ,इन सबका प्रशिक्षण देकर व्यक्ति को स्वस्थ रहने में सहायक बनाना –सेवा है l

दवाओं से शारीरिक स्वास्थ तो ठीक हो सकता है ,परन्तु मानसिक ,मनोवैज्ञानिक,सामाजिक और आध्यात्मिक स्वास्थ जलवायु ,मौसम,व्यक्ति का व्यवसाय एवं उसकी स्वयं की प्रकृति पर भी निर्भर करता है l स्वास्थ सभी आयुवर्ग के सभी स्थानों पर रहने वाले एवं सभी प्रकार के व्यक्तियों के लिए आवश्यक है l स्वास्थ्य का इतना व्यापक परिक्षेत्र होने के बाद भी स्वास्थ्य को ठीक रखने के छोटे –छोटे उपक्रम और उनको नियमित रूप से अभ्यास करने के कारण कीसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रखने में प्रभावी भूमिका निभाते  है lइस प्रकार के कार्यों को करने और उनका नियमित प्रशिक्षण करने के लिए सभी पद्धतियों के चिकित्सक एवं स्वास्थ्य में रूचि रखने वाले महिला एवं  पुरुष सहायक होते हैं और अगर एक ही प्रकार की गतिविधियों को नियमित रूप से करने के लिए विकसित छोटे-छोटे प्रकल्प केवल उस विशिष्ट समूह को ही नहीं स्वस्थ करते बल्कि उस समूह के संपर्क में आने वाले दुसरे व्यक्तियों को भी स्वस्थ रहने के लिए प्रेरित करते हैं l इन सब केन्द्रीय विषयों को ध्यान में रखकर 2 नवम्बर 2002(धन्वन्तरी जयंती ) के दिन कोच्ची(केरल) में आरोग्य भारती की स्थापना हुई l

इन चौदह वर्षों में आरोग्य भारती का कार्य देश के सभी राज्यों में पहुँच गया है l लगभग 550 जिलों में कोई न कोई कार्यकर्ता नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं l लगभग 20 प्रान्तों के  सभी जिलों में आज  कोई न कोई कार्यकर्ता नियमित रूप से सक्रीय है l वर्षभर में लगभग 1500 प्रशिक्षण वर्गों के माध्यम से तैयार अलग अलग आयामों के कार्यकर्ता एवं नियमित चलने वाले प्रकल्पों के माध्यम से स्वास्थ्य-सेवा के साथ साथ स्वास्थ्य जागरण कर रहे है l इसके अतिरिक्त भी इतने ही और अन्य कार्य जो शायद इतने नियमित नहीं होंगे वे भी इस दिशा में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं,और कुछ स्थानों पर तो ऐसे प्रकल्पों से विकसित और प्रशिक्षित हुए कार्यकर्ता समाज में स्वास्थ-सेवा के प्रभावी मापदंड गढ़ रहे हैं l

इन्ही में से ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले युवक युवतियों को आरोग्य मित्र का प्रशिक्षण देकर अपने को स्वयं स्वस्थ रखना,अपने परिवार को भी स्वस्थ रखना और ग्रामवासियों को साथ लेकर अपने ग्राम को भी पूर्ण स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं l अकेले बंगाल में ही ऐसे 400 महिला-पुरुष आरोग्य मित्र जो 250 ग्रामों में कार्यरत हैं l पिछले दो वर्षों में ही इनमे से 150 ग्राम स्वास्थय की नयी परिभाषा स्थापित करने में सफल हुए हैं अर्थात सम्पूर्ण ग्राम में स्वास्थय के प्रति जागरूकता के परिणामस्वरूप अपने को आस-पास उपलब्ध संसाधानों और नियमित उपक्रमों से स्वस्थ रखने में सफल हुए हैं अर्थात वहाँ पर किसी को भी अब शहरों में चिकित्सकों के पास जाने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती l जैस बंगाल में यही यह कार्य प्रभावी हो रहा है उसी प्रकार से अन्य 20 राज्यों में भी लगभग 2000 आरोग्य मित्र सक्रीय रूप से कार्य करते हुए अपने जैसे अन्य आरोग्य मित्र तैयार कर रहे हैं l

कहा जाता है कि स्वस्थ रहने का स्वभाव अगर बचपन में ही आदत बन जाए तो व्यक्ति जीवन भर ऐसे नियमों का पालन करते हुए अपने को स्वस्थ रख सकता है l ऐसा ही एक प्रयोग तेलंगाना के 20 मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थियों ने प्रारम्भ किया l उन्होंने लगभग 1000 विद्यालयों का चयन कर उनका स्वास्थ्य परिक्षण ,उनके मध्य विभिन्न स्वास्थ विषयों का प्रबोधन कर ,विद्यालय परिसर में सूर्यनमस्कार जैसी गतिविधि करते हुए विद्यालयों को पूर्ण स्वस्थ्य बनाया है l जिनमे 59,182 विद्यार्थी लाभान्भित हुए l इनमे में 546 बाल आरोग्य मित्र भी तैयार हुए l इनको तैयार करने में 1200 कार्यकर्ता (चिकित्सक,शिक्षक,मेडिकल,कॉलेज,विद्यार्थी एवं अन्य सामाजिक कार्यकर्ता)लगे l कुल मिलाकर 11 जिलों के 350 विद्यालय  को पूर्ण स्वस्थ बनाया l जिनमे से 250 विद्यालयों में साप्ताहिक स्वास्थ्य दिवस मनाने की परम्परा विकसित हुई है l अब स्वास्थ उनके पाठ्यक्रम का अंग बन गया है l कुल मिलाकर 50,000 ग्रामीण परिवारों को भी इन स्कूल विद्यार्थियों ने स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है l हैदराबाद  में तो ऐसे बाल आरोग्य मित्रों ने आरोग्य जागरण यात्रा ही निकाल दी l जिसमे स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता वाले उदघोष के साथ साथ साहित्य वितरण भी कियाl तेलंगाना राज्य के समान ही देश के अन्य 28 प्रान्तों में लगभग 5000 विद्यालयों में भी ऐसी गतिविधि प्रभावी रूप से चल रही है l

सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के 40 जिलों में 1414 विद्यालयों के 51,481 विधार्थियों ने स्वास्थय ज्ञान परीक्षा में भाग लिया l इनमे से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र के विद्यालय हैं l ऐसी परीक्षा तीन स्तरों पर (विद्यालय स्तर पर ,जिला स्तर पर एवं क्षेत्र स्तर पर ) विगत 8 वर्षों से नियमित रूप से चल रही है l इन परीक्षाओं के पूर्व सभी विद्यार्थियों को बाल आरोग्य मित्र नाम की एक पुस्तिका उपलब्ध कराई जाती है l उसे पढने के बाद विद्यार्थी परीक्षा देते हैं l इन परीक्षाओं में जो स्थान प्राप्त करते हैं ,उन्हें पुरुस्कृत भी किया जाता है l कक्षा 5 से लेकर 10 वी तक के विद्यार्थी इसमें सहभागी होते हैं l लगभग 60 % विद्यार्थी इसमें पुनः भाग लेते हैं l इस सबके परिणामस्वरूप 1.25 लाख परिवार स्वस्थ रहने की दिशा में विकसित होकर दुसरे लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं l इतना ही नहीं यह विद्यार्थी पुस्तकीय ज्ञान के साथ-साथ चित्रकला प्रतियोगिता,विभिन्न स्वास्थ्य विषयक प्रबोधन और प्रश्नमंच जैसे उपक्रम भी करते हैं l

प्रकृति ने मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए उसकी आवश्यकता के अनुसार स्थानीय जलवायु और मौसम को देखते हुए बहुत सारे औषधीय पौधे उपलब्ध कराए हैं l कई बार तो यह पौधे इतने साधारण होते है कि लोग उनको नज़रअंदाज़ कर देते हैं l अकेले नागपुर शहर में ही वहां के महिला-पुरुष कार्यकर्ताओं ने 10000 परिवारों में ऐसे औषधीय पौधों के बारे में जानकारी दी ,रोपण कराया,उपयोग की विधि की भी जानकारी दी l आज शहर में इनकी मांग और जागरूकता होने के कारण 12 नर्सरी केंद्र विकसित हो गए हैं l शहर में प्रातः टहलने के 13 स्थानों पर नियमित रूप से प्रशिक्षण की व्यवस्था भी हो गयी है l इन सब प्रयासों के परिणामस्वरूप स्थानीय निवासी अच्छे,सस्ते और स्थाई उपचार के लिए औषधीय पौधों का उपयोग करते हुए दिखाई देते हैं l नागपुर के ही समान देश के अन्य 28 राज्यों के 500 स्थानों पर ऐसे अलग अलग प्रकार के उपक्रम हो रहे हैं l

इसी प्रकार केरल में सूर्यनमस्कार और योग के माध्यम से 152 केंद्र नियमित रूप से ( दैनिक एवं साप्ताहिक ) चल रहें हैं l महिला और पुरुषों के अलग अलग केंद्र निर्धारित हैं l इनमे से प्रशिक्षण लेकर अन्य 450 योगासन केंद्र योगसाधक अपनी स्वयं की योजना से चला रहे हैं l जिनसे लगभग 30000 परिवार लाभान्वित होने के साथ-साथ समाज के लिए प्रेरणा का काम कर रहे हैं l इन योगासन केन्द्रों में शारीरिक व्यायाम और ध्यान का भी प्रशिक्षण होता है l स्वस्थ जीवन शैली से जुड़े हुए अनेक विषयों का प्रबोधन भी इसमें होता है l समय समय पर औषधीय पौधे और घरेलु उपचार का प्रशिक्षण भी इनका महत्वपूर्ण अंग हैl केरल के समान देश के अन्य 30 प्रान्तों में 600 ऐसे नियमित केंद्र चल रहे हैंl

 उपर्युक्त सेवाकार्यों के अतिरिक्त भी जीवनशैली जनित रोग – मधुमेह का प्रबंधन करने के लिए भी अलग-अलग शिविरों के माध्यम से प्रशिक्षण देना,प्रत्येक जिले में एक ग्राम को पूर्ण स्वस्थ बना सके उसके लिए उत्तरोत्तर बढ़ते क्रम से स्थानीय व्यक्तियों का सहयोग लेकर स्वस्थ ग्राम के रूप में विकसित करना l विद्यालयों के विद्यार्थियों,युवक-युवतियों,मजदूरों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रथमोपचार से सम्बंधित नियमित प्रशिक्षण देकर वे स्वयं दूसरों को प्रशिक्षण देने के योग्य बने ऐसी रचना व्यवस्था खड़ी करना ऐसे सेवा कार्यों का एक महत्वपूर्ण आयाम है l

प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करते हुए सम्पूर्ण परिवार में स्वास्थवर्धक वायुमंडल तैयार करना और पूर्ण स्वस्थ रहने के लिए नियमित उपक्रम करना,इन सेवाकार्यों का महत्वपूर्ण चरण है l जिनसे प्रेरणा लेकर स्थानीय समाज में भी स्वास्थ्य जागरण का कार्य विकसित हो रहा है l अवश्य ही उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ यह कार्य एक दिन सम्पूर्ण देश में स्वास्थ्यवर्धक वायुमंडल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा l