23 दिसंबर - स्वामी श्रद्धानंद बलिदान दिवस

दिंनाक: 23 Dec 2016 20:25:57


समाज-जीवन  के विभिन्न  क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभाने वाले स्वामी श्रद्धानंद का जन्म १८५६ में पंजाब के जालंधर जिले के तलवन  नामक कस्बे में हुआ था lजीवन की  आरंभिक अवस्था में उनका सामना धर्म के नाम से चलने वाली कुरीतीयों से हुआ जिससे उनका मन अनास्था से भर उठा और वो नास्तिक हो गए lपर आगे चलकर जब वो आर्य समाज के दयानंद सरस्वती के संपर्क में आये तो उनका झुकाव पुनः धर्म की ओर हो उठा l फिर तो आगे चलकर वेदों के अपने अध्ययन और धर्म का अपने जीवन में प्रत्यक्ष आचरण के बल पर उनकी ख्याति चारों ओर स्वामी श्रद्धानंद के रूप में हो गयी l वैसे सन्यास आश्रम में प्रवेश करने के पूर्व उन्होंने नायब तहसीलदार के पद पर भी कार्य  किया l ये पद उन्हें उनकी शिक्षा और अंग्रेजी के अच्छे ज्ञान के बल पर मिला l पर ये वो समय था जबकि अंग्रेज फौजी सामान खरीदकर  स्थानीय व्यापारियों को अक्सर पैसे नहीं दिया करते थे l श्रद्धानंद ने इसके विरुद्ध कार्यवाही की तो कमिश्नर ने उनको रोकना चाहा, इस अन्याय में झुकने के स्थान पर उन्होंने अपने पद से इस्तीफा देना पसंद दिया और उन्होंने वकालत करना शुरू कर दी l  न्यायालय में क्रांतिकारीयों को उनसे निशुल्क सहायता मिलती l

आगे चलकर जब वे आर्य-समाज में ज्यादा सक्रिय होते गए तो उन्होंने इस बीच वेदों का अध्ययन पूर्ण किया l फिर तो उन्हें वैदिक धर्म के पक्ष में शास्त्रार्थ करने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा l देश के परालंबन के मूल में वे हिन्दू-समाज के विघटन को देखते थे l इसके उन्मूलन के लिए उन्होंने जातपात-मुक्त सामुहिक हवन, उपासना व प्रीतिभोज की  प्रथा शुरू करी l हरिजन मोहल्लों में कथाएं आयोजित करना शुरू करी, साथ ही बड़े पैमाने पर अस्पर्श्य बंधुओं का  मंदिरों में प्रवेश शुरू करवाया l

ये उनके हर संभव प्रयास और  उसके पीछे अटल इच्छा-शक्ति  का ही परिणाम था कि अंततः पंजाब में बाल-विवाह के निषेद्ध और बाल-विधवाओं के  पुनर्विवाह के समर्थन में लोग आगे आने लगेl वेद के तत्व-ज्ञान को जन सुलभ बनाने के लिए उन्होंने पंजाबी भाषा में वेद मन्त्रों की व्याख्या करी l वे आधुनिक शिक्षा के पक्षधर थे, पर नवशिक्षितों में पाए जाने वाले भारतीय संस्कारों के आभाव से अनभिज्ञ भी न थे l इसको दूर करने के लिए उन्होंने एक गुरुकुल खोलने का निश्चय किया l इसमें लगने वाला आवश्यक धन जुटाने के लिए ‘जब तक ये इकठ्ठा नहीं होता, में घर पर कदम नहीं रखूँगा’ ऐसा उन्होंने प्रण किया, और जिसे निभा कर  दिखा भी दिया l हिमाचल प्रदेश के कांगड़ी में स्थापित इस गुरुकुल के लिए उन्होंने  प्रेस,कोठी,पुस्तकालय सहित अपनी सब संपत्ति दान में दे दी l इसमें विद्यार्थी को वेद, संस्कृत पढ़ने के साथ-साथ ब्रह्मचर्य का भी पालन करना होता था. इतिहास,विज्ञान, अर्थशास्त्र जैसे आधुनिक विषय भी पाठ्यक्रम में शामिल किये गए थे. श्रद्धानंद के दोनों बेटों ने गुरुकुल में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी करी lआगे चलकर यही गुरुकुल क्रांतिकारियों व अंग्रेजों के सताए हुए लोगों की शरण स्थली बनकर उभरा l दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीयों के अधिकारों के लिए गांधीजी संघर्षरत थे, उनके सहयोग के लिए  गुरुकुल  के ब्रह्मचारी धन इक्कट्ठा करते और वहां भेजते l  भारत लौटने से पहले गांधीजी दक्षिण अफ्रीका में सक्रिय ‘फीनिक्स’ सत्याग्रह आश्रम के विद्यार्थियों को भारत भेजना चाहते थे l इसके लिए उन्होंने जो स्थान चुना वो गुरुकुल ही था l

                 सन्यास-आश्रम में उनका प्रवेश उन्हें राष्ट्रीय सरोकार से विमुख न कर सका l इस दौरान गांधीजी के ‘सत्याग्रह-आन्दोलन’ में भाग लेकर उन्होंने दिल्ली की कमान संभाली lसत्याग्रह को दबाने के लिए दिल्ली में दो स्थानों पर गोलीकांड हुए, जिसमे अनेक लोग मारे गए l इसमें एक सुप्रसिद्ध मुसलमान भाई का भी निधन हो गया था l शोक में जामा मस्जिद में एक सभा रखी गयी, इसमें स्वामी श्रद्धानंद ने वेद मन्त्रों के साथ  अपना भाषण दिया, जो कि अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना थी l धीरे-धीरे वो एकमेव  हिंदुत्व के कार्य में   जुट गए l

एक दिन २३ दिसम्बर १९२६ को जब श्रद्धानंद बीमारी की अवस्था आराम कर रहे थे, एक युवक जिसका नाम अब्दुल रशीद था उनसे मिलने आया, ये कहकर कि उनसे इस्लाम पर चर्चा करना चाहता है.श्रद्धानंद की सेवा में लगे स्वयंसेवकों ने उनसे अनुमति मिलने पर उसे उनके कक्ष में प्रवेश दे दिया l अब्दुल रशीद जैसे ही अन्दर पहुंचा और  उसकी दृष्टि श्रद्धानंद पर पड़ी उसने अपने साथ लायी पिस्तौल निकालकर उन पर गोली दाग दी l श्रद्धानंद कुछ समझ पाते इसके पहले गोली उनके शरीर में जा धंसी,धोखे से किये गए इस वार को स्वामी श्रद्धानंद झेल ना सके और शरीर ने प्राण त्याग दिए l

- इंजि. राजेश पाठक