ऐसे थे अपने दीनदयाल जी-सुशील कुमार

दिंनाक: 09 Dec 2016 21:59:22


यह रोचक घटना उस समय की है जब पं. दीनदयाल उपाध्याय आगरा में एम. ए. (अंग्रेजी साहित्य) के छात्र थे l इस घटना से उनकी सरलता ,सहजता एवं प्रमाणिकता प्रकट होती है l आज के युवा इस से बहुत कुछ सीख सकते हैं l

45-50 साल पहले तक एक पैसे का सिक्का भी चलन में था l ये सिक्के तांबे के बने होते थे l एक बड़ा सिक्का जिसमे काफी तांबा लगता था फिर उसमे एक गोल छेद करके उसका वजन कम किया गया l जो बड़ा और वजनदार सिक्का था ,जिसे डबली या डबल पैसा भी कहा जाता था ,वह जब घिस जाता था ,दुकानदार उसे खोटा पैसा कहकर लौटा देते थे l यह सारा विवरण इसलिए कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के छात्र जीवन की एक घटना इस खोटे सिक्के से जुडी हुई है l

यह प्रसंग 1939 का है l उस समय दीनदयाल जी अंग्रेजी साहित्य विषय लेकर एम.ए. पढ़ रहे थे l वे आगरा के सेंट जॉन कॉलेज के छात्र थे l अपने एक मित्र के साथ कमरा लेकर रहते थे ,दोनों मिलकर खाना बनाते और खाते l ज़माना सस्ता था ,सब्जी खरीदने के लिए 2-3 पैसे ही काफी होते थे l सब्जी बिक्री का भी एक अलग तरीका था l बड़ी बड़ी दुकानों पर सब्जी नहीं बिकती थी l आगरा जैसे बड़े शहर में भी कुछ ख़ास स्थानों पर पटरी किनारे बोरी बिछाकर सब्जी बेचने वाले बैठ जाते थे l टोकरी में सब्जी और बोरी के नीचे बिक्री के पैसे ,यही चलन था l सब्जी बेचने वालों में महिला और पुरुष दोनों होते थे और अच्छी आयु के ही अधिक होते थे l एक दिन ऐसा हुआ कि दोनों मित्र सब्जी खरीदकर परस्पर बातें करते हुए अपने कमरे की तरफ जा रहे थे कि दीनदयाल जी अचानक असहज हो गए l उनके चेहरे पर चिंता के भाव स्पष्ट झलक रहे थे l वे चलते चलते रुक भी गए थे l

मित्र के पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी जेब में एक-एक पैसे के कुल तीन सिक्के थे और उसमे एक घिसा खोटा सिक्का था l जिन अम्मा से हमने दो पैसे की सब्जी खरीदी ,उन्हें वह खोटा सिक्का दे आया हूँ l उस गरीब माँ का नुकसान हो गया और मुझे पाप लगेगा सो अलग l मित्र ने यह समझाने की कोशिश भी की कि ऐसी कोई बड़ी बात नहीं है कि तुम इतनी चिंता करो ,जैसे तुम्हारा वह सिक्का चल गया,वैसे ही उसका भी किसी ग्राहक के पास चल जायेगा ,पर दीनदयाल जी थे कि उनकी बेचैनी बढती जा रही थी l वे वापस बाज़ार गए और सब्जी बेचने वाली माँ से सारी बात बताई l दुकानदार माँ ने उसे माफ़ करते हुए कहा “बेटा! अब जैसा किसी के भाग्य में हानि-लाभ लिखा होता है –वैसा ही होता है l तुम जाओ ,तुम अपनी शुद्ध भावना के कारण खूब तरक्की करोगे l” पर दीनदयाल जी नहीं माने l तीसरा खरा सिक्का देकर और रेजकारी के ढेर में से अपना खोटा सिक्का खोजकर ही माने l इसके बाद दीनदयाल जी के चेहरे पर उभरे संतोष को कोई भी देख पढ़ सकता था  l

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा पर नियमित जाने वाले यही दीनदयाल जी आगे चलकर एक महान दार्शनिक ,लेखक और राजनीति में समाज के मार्गदर्शक व नेतृत्व संभालने वाले बने l सन 1967 में उनको भारतीय जनसंघ का अखिल भारतीय अध्यक्ष बनाया गया l उनकी कर्मठता व कर्त्तव्य परायणता और दुर्लभ गुणों की चर्चा आज भी लोकमानस में विद्यमान है और हमें प्रेरणा दे सकती है l उनके द्वारा बताया गया एकात्म मानवदर्शन का सिद्धांत आज विद्वानों के लिए जिज्ञासा व शोध का विषय बन गया है l