श्री सुदर्शन जी (पूर्व सरसंघचालक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)

दिंनाक: 27 Sep 2016 21:56:53


अंग्रेजों का शासनकाल था | तमिलनाडु और केरल की सीमा पर स्थित कर्नाटक के तिरुनेलवेल्ली जिले के शेन्कोटे नामक स्थान पर कौशिक गोत्र के संकेती तमिल ब्राह्मण परिवार में जन्मे सुदर्शन जी के पूर्वज 250 साल पहले कर्नाटक के कुप्पहर्ली गाँव में आकर बसे थे | इस प्रकार तमिल और कन्नड़ संस्कृतियों को अपने संस्कारों में समेटे उनके पिता श्री कुप्पहल्ली चिन्नप्पा सीतारामैया को उनका भाग्य तत्कालीन सी.पी एंड बरार के रायपुर जिले में वनविभाग की सेवा में खींच लाया था | रायपुर में ही उनके प्रथम पुत्र सुदर्शन का 18 जून सन 1931 को जन्म हुआ | 

समय समय पर पिताजी का स्थानान्तरण बैतूल, दमोह, महासमुंद, सिरोंचा, चंद्रपुर जिले के आलापल्ली आदि स्थानों पर होता रहा, अतः सुदर्शन जी की प्रारम्भिक पढाई भी अलग अलग स्थानों पर हुई | तीसरी से पांचवी तक का अध्ययन दमोह में हुआ, तो छठवीं से दसवीं तक की पढाई मंडला में हुई | ग्यारहवीं की परीक्षा चंद्रपुर में दी | इस प्रकार की अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे अत्यंत मेधावी छात्र सिद्ध हुए | आगे की पढाई के लिए 1947 - 48 में जबलपुर आ गए | यहाँ के रावार्ट्सगंज कोलेज से इंटरमीडिएट की परिक्षा उत्तीर्ण की | 

पांचवी कक्षा के विद्यार्थी रहते ही उन्होंने संघ शाखा जाना प्रारम्भ कर दिया था | वह क्रम सतत जारी रहा | इंटरमीडिएट में अध्ययन के समय ही गांधी जी की ह्त्या का दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय घटा | संघ पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया | उस समय सुदर्शन जी छात्रावास में रहते थे | 11 दिसंबर 1948 को सुदर्शन जी की छात्रावास शाखा के स्वयंसेवकों ने सत्याग्रह किया | तीन माह तक जेल में रहे | ठीक परिक्षा के पूर्व उन्हें छोड़ा गया | इसके बाद भी इंटरमीडिएट की बोर्ड परिक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए और छठा स्थान प्राप्त किया | 

1949 में उसी परिसर में नया इंजीनियरिंग कोलेज प्रारम्भ हुआ | उसी इंजीनियरिंग कोलेज से टेलीकम्यूनिकेशन में बी.ई (ओनर्स) की डिग्री प्राप्त की |

सुदर्शन जी की कार्यनिष्ठा, लगन, हठ और सातत्य के उदाहरण बचपन से ही दिखने लगे थे | एक बार लगभग 12 वर्ष की उम्र में माताजी के कहने पर वे घर में किसी पूजा के लिए बाजार से कुछ अमरूद खरीद कर लाये | माताजी गले हुए अमरूदों को देखकर नाराज हुईं, और अमरूद वापस करने बाजार भेजा | तब तक वह महिला, जिससे सुदर्शन जी ने अमरूद खरीदे थे, घर जा चुकी थी | सुदर्शन जी शाम तक भूखे प्यासे वहीं बैठकर अमरूद बेचने का प्रयत्न करते रहे | उधर घर में माताजी चिंतित रहीं और सुदर्शन जी को झिड़कने को लेकर पश्चाताप करती रहीं | देर शाम जब अँधेरा होने लगा और एक वृद्ध सज्जन ने उनसे वे अमरूद खरीद लिए, तब कहीं जाकर सुदर्शन जी वापस घर आये और माँ को पैसे वापस लौटाए | माँ की आँखों में प्रेमाश्रु छलछला आये |

लोग क्या कहेंगे, या सोचेंगे, इसकी सुदर्शन जी ने कभी चिंता नहीं की | उनके मन को जो ठीक लगा, उन्होंने वही किया | तय किया कि पेंट नहीं पहनना है तो इंजीनियरिंग कोलेज में भी कभी पेंट नहीं पहना | कोलेज में भी कमीज और पायजामे या धोती में ही जाते | इंजीनियरिंग की वर्कशॉप में ढीले ढाले कपडे पहिनकर जाना मना था तो वहां संघ की हाफ पेंट और कमीज पहिनकर जाते | कोलेज के अंतिम वर्ष विदाई समारोह आयोजित हुआ | अधिकांश विद्यार्थियों ने फिल्मी गाने गाये | जब सुदर्शन जी से गाने के लिए आग्रह किया गया तो इन्होने गाया –
“जाग उठा है आज देश का, वह सोया अभिमान”
इतना भावपूर्ण व लयताल में गाया कि बाद में अपने उद्बोधन में प्रधानाचार्य ने उस पर विशेष टिप्पणी की, और कहा सिम्पल लिविंग एंड हाई थिंकिंग |

3 भाई व एक बहिन वत्सला में वे ज्येष्ठ थे | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचार व कार्य-पद्धति के मार्ग पर चल पड़े और कभी भी मुड़कर नहीं देखा | संघ में सभी स्तर के प्रचारक रहकर वे सरसंघचालक पद तक पहुंचे | संघ में यह पद मार्गदर्शक का होता है | संघ के अ.भा. शारीरिक प्रमुख व बौद्धिक प्रमुख रहते हुए उन्होंने दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण आयाम स्थापित किये |

प्रचारक बनने के बाद सदैव ध्यान रखा कि स्वयं पर कोई भी फिजूल खर्च न हो | इसका एक अद्भुत उदाहरण है | एक बार जब वे घर आये तो माँ ने देखा कि उनके पैरों में चप्पल नहीं है | कारण पूछने पर सुदर्शन जी ने बताया कि उनके पास अच्छी चप्पलें थीं, किन्तु वे मंदिर में चोरी हो गईं | संघ के पैसों से ली गई चप्पलों का इस प्रकार खो जाना उन्हें बहुत बुरा लगा | इस कारण उन्होंने दूसरी चप्पल खरीदी ही नहीं | माताजी ने उन्हें दूसरी चप्पल खरीदने के लिए दस रुपये दिए | उस समय दस रुपये बड़ी राशि हुआ करती थी | सुदर्शन जी ने एक रुपये मूल्य की साईकिल के टायर से बनी चप्पल खरीदी और नौ रुपये माँ को यह कहकर वापस कर दिए कि अब अगर ये चप्पल चोरी भी चली जायेंगी तो दुःख नहीं होगा | 

वे अच्छे गीत गायक भी थे | वृन्दावन के प्रचारक वर्ग में प.पूज्य सरसंघचालक श्रीगुरूजी के मार्गदर्शन पूर्व का गीत उन्होंने ही कहा था | स्वयंसेवक नई नई पुस्तकें पढ़ें, इसके प्रति उनका विशेष आग्रह रहता था | इसलिए वे हर बैठक में पुस्तकों की जानकारी देते व पढ़ने के लिए आग्रह करते थे | अपनी दिनचर्या का वे कठोरता से पालन करते थे | नियमित संध्या हेतु वे अपने पात्र सदैव साथ ही रखते थे | बालशास्त्री हरदास जी की पुस्तक “वैदिक राष्ट्र जीवन” का उन्होंने अनुवाद भी किया |

उपनिषदों में वर्णित ब्रह्म निरूपण का वैज्ञानिक आधार, आधुनिक शोधों जेसे अणुबिखंडन, सृष्टि में व्याप्त तत्व की खोज आदि के आधार पर वे भारतीय मूल्यों की श्रेष्ठता बड़ी प्रखरता से निरूपित करते थे | महर्षि अरविंद की भविष्यवाणी कि भावी भारत भव्य होगा, अपने प्रयासों के आधार पर होगा यह विश्वास दिलाना वे कभी नहीं भूलते थे | 

एक बार सुदर्शन जी को अपनी भतीजी की कन्या के भरतनाट्यम के रंगप्रवेश कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए अपने भाई श्री रमेश जी के साथ अमरीका जाना पड़ा | लोस एंजिल्स के पास पहुंचते समय एक फॉर्म सबको भरना होता है | सुदर्शन जी ने भी भरा | उसमें भारतीय पते के अंत में उन्होंने इंडिया के स्थान पर भारत लिखा | भाई रमेश जी ने ने सलाह दी कि अच्छा हो आप इंडिया लिखें, या भारत के साथ कोष्ठक में इंडिया भी लिख दें | क्योंकि यहाँ भारत नाम कोई जानता नहीं होगा | किन्तु सुदर्शन जी ने साफ़ इनकार कर दिया | बोले अगर ये भारत नाम जानते नहीं हैं, तो इनको बताएगा कौन ? रमेश जी की आशंका सही निकली | कस्टम अधिकारियों ने भारत नाम पर आपत्ति जताई, इतना ही नहीं तो चिढ़कर सारे सामान की दुबारा तलाशी ली गई | और आखिर बड़ी हील हुज्जत के बाद सुदर्शन जी को क्लियरेंस मिल पाया | लेकिन सुदर्शन जी ने इण्डिया नहीं लिखा तो नहीं ही लिखा | वे आखिर तक अड़े रहे कि भारत हमारा संविधान सम्मत नाम है | यह हम पर है कि हम इंडिया लिखें या भारत |

सुदर्शन जी ने महान बनने हेतु कार्य नहीं किये, अपितु उनके कार्यों ने उन्हें महान बनाया | उनकी सादगी, सरलता व कार्यकर्ताओं के साथ उनके व्यवहार का एक उदाहरण स्वदेश इंदौर के तत्कालीन संपादक श्री जयकृष्ण जी गौड़ ने लिखा है | सुदर्शन जी उन दिनों प्रांत प्रचारक हुआ करते थे | एक दिन अकस्मात माणिकचन्द्र जी वाजपेई "मामाजी" के साथ गौड़ साहब के घर जा पहुंचे और बोले भोजन करना है | उनका दो कमरों का किराये का मकान | घर में केवल वृद्ध माताजी | घर में गैस भी नहीं | जैसे तैसे जल्दी जल्दी में दाल रोटी बनी | माताजी ने भोजन परोसा, पर थाली में कटोरी नहीं थी | सुदर्शन जी और मामाजी ने थाली में ही दाल उड़ेल ली और चूर कर प्रेम से दाल रोटी का भोजन किया | जाते समय माताजी को कहा, बहुत स्वादिष्ट भोजन बना है | जयकृष्ण जी की भावनाओं का प्रवाह आँखों से आंसू बनकर बह निकला | सुदर्शन जी बोले हम तो अपना घर समझकर ही आये हैं |

सुदर्शन जी का दृढ विश्वास था कि मनुष्य हाड-मांस का पुतला मात्र नहीं, बल्कि एक चैतन्य आत्मा है | व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होना चाहिए | श्री सुदर्शन जी मानते थे कि राष्ट्र की शक्ति तभी प्रबल होगी, जब धर्म की शक्ति प्रबल होगी | भारत एक भूखंड मात्र नहीं, बल्कि घनीभूत आध्यात्मिक विचार है | वे यह भी मानते थे कि संघ इस कार्य में अपनी भूमिका निभाएगा |

13 सितम्बर को पूर्व सांसद श्रीगोपाल जी व्यास के यहाँ रायपुर में वे श्रीमद्भागवत कथा के समापन में उपस्थित रहे | इस अवसर पर उन्होंने बैसा ही व्यवहार किया, जैसा कि श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के यज्ञ में झूठे पत्तल उठाकर किया था | सुदर्शन जी ने भागवत सुनने पधारे भक्तों के इधर उधर बिखरे जूतों को पंक्ति में रखने का कार्य किया | दूसरे दिन 14 सितम्बर को व्यास जी की औपन्यासिक कृति “सत्यमेव जयते” का विमोचन करते हुए लगभग पाने दो घंटे का धाराप्रवाह उद्बोधन दिया | अपने उद्बोधन में उन्होंने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्र्रीय सन्दर्भों सहित उन राजनैतिक षडयंत्रों पर प्रकाश डाला जो भारतीय प्रजातंत्र के लिए संकट बन रहे हैं | और अगले ही दिन 15 सितम्बर को प्रातःकाल अपने जन्मस्थान रायपुर में ही किसी योगी के समान संध्या वंदन व प्राणायाम करते मानो योजनापूर्वक उन्होंने महाप्रयाण किया | एक संत के समान जीवन जिया, और देहत्याग भी ऋषियों की भांति की |

प्रयाणकाले मनसाचलेन, भक्त्यायुक्तो योगबलेन चैव,
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक, स ते परे पुरुषमुपैति दिव्यम |
(वह भक्तियुक्त पुरुष, अन्तकाल में योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार से स्थापित करके, फिर निश्छल मन से परम पुरुष का स्मरण करते हुए, उसी दिव्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है |)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आदर्श प्रचारक पूज्य सुदर्शन जी के अखंड कर्ममय राष्ट्रार्पित जीवन को नमन |