नई पौध की घटती स्वाध्याय वृत्ति-डॉ विकास दवे

दिंनाक: 31 Jan 2017 20:15:07


“परिवार ही दे सकता है बच्चों को संस्कार और सदसाहित्य पढने की आदत”

विगत दिनों इन्टरनेट पर संयुक्त राष्ट्र संघ के एक वैश्विक सर्वेक्षण के निष्कर्ष को पढ़ रहा था l वह सर्वेक्षण बच्चों की पढने-लिखने की आदतों को लेकर हुआ था l निष्कर्ष के शब्दों ने मुझे चौका दिया l आप भी देखिये उस निष्कर्ष को –आज विश्व के समक्ष आतंकवाद से भी बड़ी एक चुनौती आ खड़ी हुई है l हमारी नई पीढ़ी अब केवल “लिसनर” और “दर्शक” बन कर रह गई है l वह “रीडर” ही नहीं बची तो “राइटर” होने का तो प्रश्न ही नहीं आता l यदि हमारी पीढ़ी समय रहते नहीं चेती तो परिणाम बहुत भयावह होंगे l

हम समझ सकते हैं इस संकट को विश्व यदि आतंकवाद से बड़ा संकट मान रहा है तो निश्चय ही यह अत्यंत संवेदनशील विषय भी है और सार्वभौम भी l इस विषय पर एक अभिभावक के रूप में हम विचार करें तो सर्वप्रथम हमें अध्ययन करना होगा इस रोग के कारण का l सबसे बड़ी विभीषिका तो यह है कि पुरुष क्या पढ़ेगा यह वह स्वयं तय करता है l मातृशक्ति क्या पढ़ेंगी वे स्वयं तय करती हैं किन्तु बच्चा क्या पढ़ेगा यह वह स्वयं तय नहीं करता l हम बड़े उस पर अपनी पसंद को आरोपित करते हैं l मुझे प्रवास का एक दृश्य याद आ रहा है l ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी और पिता जी दौड़कर बुक स्टॉल से “चम्पक” और “लोटपोट” खरीद कर ले आये l उन्हे लगा था बेटा प्रसन्न हो जायेगा किन्तु वह मुंह चढ़ाकर बोला –“मैं क्या इतना छोटा हूँ कि ‘चम्पक’ और ‘लोटपोट’ पढूंगा ?” प्रश्न यह है कि क्या हम बाल साहित्य बाल-गोपाल के आयु वर्ग अनुसार खरीद कर देते हैं क्या ? यह विकल्प पत्रिकाओं और बाल साहित्य की पुस्तकों दोनों पर लागू होता है l

दूसरी बात बाल पाठक को स्वयं अपना साहित्य क्रय करने का अधिकार दें l अर्थात् राशि उनके हाथों में दें l इन दिनों विज्ञापन में बच्चे दिखाई देने लगें हैं l कारण केवल इतना कि प्रत्येक उत्पादक चाहता है घर के बच्चे हमारा उत्पाद क्रय करने का आग्रह करें l जब हम बड़े उनसे फ्रिज, कूलर, मिक्सर, पर उनकी राय का महत्व समझते है तो साहित्य पर क्यों नहीं ?

स्वाध्याय वृत्ति  कम होने के बड़े कारणों में हम टेलीविजन , कंप्यूटर और मोबाईल को मानते है l क्या हम  बच्चों से चर्चा कर स्नेह पूर्वक यह तय कर सकते है कि वे जितना समय इन साधनों पर गुजारते है उसका एक चौथाई समय आवश्यक रूप से पढ़ने में गुजारें ? यह  ध्यान रहे पढ़ने कि परिभाषा में पाठ्य –पुस्तकें नहीं अपितु अन्य साहित्य ही आएगा l अपने घर में हम बच्चों को उनका स्वंय का वाचनालय तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करें l कैसा हो हमारा घरेलु वाचनालय ? इसमें बच्चों के लिए छोटी-छोटी पुस्तकें हों ,पुस्तकों की भाषा एवं विषय सरल हो,सामाजिक या पारिवारिक समस्याएं दर्शाने वाला साहित्य न रखें l यही हो तो समाधान कारक भी हो l केवल आध्यात्मिक पुस्तकों का बाहुल्य न हो अपितु उसमें विज्ञान ,सिनेमा और कंप्यूटर की दुनिया के रोचक साहित्य को भी प्रवेश दें l पत्रिकाओं को माह के क्रम से जमाकर संग्रह करने और प्रसंग विशेष पर उसमे से सामग्री निकालने का अभ्यास बच्चों को करवाएं l पुस्तकों पर क्रमांक डालकर एक रजिस्टर में उनका अंकन करने को कहें l किसी को पढने के लिए पुस्तक बगैर अंकित किये न देने का अभ्यास बनायें l