1971 के युद्ध में हमने एक हिस्सा जीता, लेकिन उसे राजनीतिक कारणों से खो दिया-नरेन्द्र जी

दिंनाक: 29 Oct 2017 19:59:41

देहरादून, विसंकेः 29 अक्टूबर 2017, हमने स्वतन्त्रता का उत्सव भौगोलिक आधार पर मनाया था। अपनी खोयी हुई स्वतंत्रता का उत्सव मनाने के बजाय 1947 में अग्रेजों ने भारत से स्वतंत्रता के जिस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराये थे वह वास्तव में विभाजन का दस्तावेज था। उक्त बात आज यहाँ विश्व संवाद केन्द्र द्वारा आयोजित ‘आजादी के सत्तर साल, क्या खोया, क्या पाया ?’ स्मारिका ‘संवाद’ के विमोचन अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र जी ने कही।

कार्यक्रम से पूर्व मंजू कटारिया द्वारा गणगीत के पश्चात् मंचासीन अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलन व डाॅ. रश्मि त्यागी रावत के द्वारा वन्दे मातरम् के उद्घोष के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ किया गया। उसके पश्चात् मंचासीन सभी अतिथियों द्वारा विश्व संवाद केन्द्र की गतिविधियों पर आधारित स्मारिका ‘संवाद’ का भी लोकार्पण किया गया। विश्व संवाद केन्द्र द्वारा समय-समय पर पत्रकारिता, पत्रलेखन, पत्रिका प्रकाशन एवं विभिन्न विषयों पर विचार गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। सालभर की अपनी इन्हीं गतिविधियों को समेटे आज विश्व संवाद केन्द्र द्वारा ‘आजादी के सत्तर साल क्या खोया, क्या पाया ?’ विषय पर एक स्मारिका का प्रकाशन किया गया। आई.आर.डी.टी. सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में बतौर मुख्यवक्ता बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय सह प्रचार प्रमुख नरेन्द्र जी ने कहा कि 1971 के युद्ध में हमने एक हिस्सा जीता, लेकिन उसे राजनीतिक कारणों से खो दिया। नीतियाँ बनाते समय हमने गहराई से उस पर विचार नहीं किया। पश्चिमी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर हमने अपनी नीतियों बनायी इसीलिए आज देश की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है। बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। एक ओर ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं खड़ी हैं तो दूसरी ओर झोपड़ पट्टी है। किसानों की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। अन्न की दृष्टि से हम आत्मनिर्भर अवश्य हुए हैं, लेकिन किसानों की दुर्दशा पर आज भी रोना आता है। शिक्षा के अंग्रेजीकरण के कारण जेएनयू और हैदराबाद जैसी घटनाएं आज अक्सर देखने को मिल रही है।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रख्यात पर्यावरणविद् ‘मैती आन्दोलन’ के प्रणेता श्री कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ ने उक्त अवसर पर कहा कि इन सत्तर वर्षों में हमने बहुत सी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, लेकिन जिन संस्कारों के द्वारा भारत का स्वभाविक निर्माण होना था वह नहीं हुआ। भारत की आत्मा गाँव में बसी है, लेकिन आज हमारे गाँव विरान पड़े हैं, लोगों में भ्रम की स्थिति है। पहले जिस हिमालय से घी, दूध की नदियाँ बहती थी वहाँ आज अभाव की जिन्दगी जीने को लोग मजबूर हैं। गाजर घास और लेण्टाना के साम्राज्य ने हमारे खेतों पर कब्जा कर लिया है। उन्हीं की आड़ में जंगली जानवर संरक्षण पा रहे हैं। हमारी सरकारों ने इन सत्तर वर्षों में शहरी क्षेत्रों पर ही ध्यान केन्द्रीत किया जिस कारण गाँव पूरी तरह उपेक्षित हो गये। हमारी शिक्षा पद्धति में आजादी के बाद आज भी कोई बदलाव नजर नहीं आता सुदूर ग्रामीण क्षत्रों के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने के लिए गाँव से शहरों की ओर पलायान कर रहें हैं, जो कि एक खराब स्थिति है। जबकि स्वतंत्रता के पश्चात् हमारे गाँव स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर होने चाहिए थे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डी.ए.वी. (पी.जी.) काॅलेज के पूर्व प्राचार्य डाॅ. अशोक सक्सेना ने सत्तर वर्षों के घटनाक्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस दौरान हमने बहुत कुछ पाया भी है और खोया भी है। अन्त में उपस्थित अतिथियों का विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष श्री सुरेन्द्र मित्तल ने आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन स्मारिका के सम्पादक राजेन्द्र पन्त ने किया। इस अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र के निदेशक विजय कुमार, सचिव राजकुमार टांक, सह सचिव रीता गोयल, हिमालय हुंकार पत्रिका के सम्पादक रणजीत सिंह ज्याला, स्मारिका के सह सम्पादक निशीथ सकलानी, सुख राम जोशी, कृष्ण गोपाल मित्तल, हिमांशु अग्रवाल, सतेन्द्र, आलोक चैहान आदि अनेक लोग उपस्थित थे।