परमार्थ और सबका कल्याण भारतीय संस्कृति के मूल में है – इंद्रेश कुमार जी

दिंनाक: 17 Nov 2017 20:43:36

सोनीपत (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार जी ने कहा कि भारत भूखण्डों का संकलन नहीं है, जैसे की अन्य देश हैं. इसी प्रकार हिन्दुस्तान की संस्कृति में एकात्म है. जिसका मूल परमार्थ और सर्वकल्याण है. भारतीय संस्कृति बीज की तरह अभिन्न है. जिस तरह बीज के अंदर ही एक पूरा वृक्ष, उसके पत्ते, फूल व टहनियां निहित हैं, उसी प्रकार भारत का समाज एकात्म है. उन्होंने कहा कि आने वाले दस वर्षों में चीन विश्व के सामने भीख का कटोरा लेकर खड़ा होगा. इंद्रेश जी दीनबंधु छोटू राम विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, मुरथल में दीनबंधु छोटू राम चेयर द्वारा ‘भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति : एकात्म मानववाद’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यातिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि देश के किसी भी भाग पर विपदा आने पर पूरा देश उस तरफ चिंतित होकर सहायता के लिए अग्रसर होता है, जिस प्रकार मनुष्य के किसी भी अंग पर चोट लगने पर शरीर के दूसरे अंग उपचार हेतु वहां सहायता करने के लिए पहुंचते हैं. इसी प्रकार भारतीय संस्कृति सर्व समाज की संस्कृति है, जिसमें समाज के हर वर्ग का उत्थान व पोषण निहित है. भारतीय संस्कृति मांग की नहीं, बल्कि प्यार और परमार्थ की संस्कृति है. हमारे यहां पर होली खेली जाती है, जो प्यार का प्रतीक है. इंद्रेश कुमार जी ने कहा कि जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है. विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है, जिसका कभी जन्म नहीं हुआ. जबकि विश्व के अन्य देशों का जन्म का दिन है. वस्तुत: भारत नाम का मूल देश देवताओं से आया है. भारत ने हमेशा जीओ और जीने दो का संदेश देने के साथ साथ परमार्थ का संदेश दिया है. हमारी संस्कृति का जीवन मूल्य परमार्थ का था. इसलिए हमारा देश विश्व गुरु था. हिन्दुस्तान का हर अभिभावक अपने बच्चों के लिए कार्य करता है. इसलिए परमार्थ है. जबकि विदेशी अभिभावक अपने लिए करते हैं. पश्चिमी देशों का प्यार भोग की संस्कृति है, जबकि हमारा प्यार जीवन की संबद्धता है. भारतीय के प्यार में विकार उत्पन्न नहीं होता. भारत ने विश्व को जीवन मूल्य प्रदान किए हैं. भारतीय संस्कृति सनातन की संस्कृति है, जिसमें सब धर्मों व उपधर्मों को साथ लेकर चला जाता है.

एक छात्रा के प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय अपने देश से प्रेम की भावना से स्वदेशी अपनाएं और चीन के माल का बहिष्कार करें. एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था की मूल जड़ों का आकंलन विख्यात अर्थशास्त्री भी करने में असफल रहे हैं. उन्होंने प्रति प्रश्न किया कि चीन खाद्यान्न में आत्मनिर्भर नहीं है, जो किसी भी मानवता के भरण पोषण के लिए मूल आवश्यक्ता है. चीन खाद्यान्न में भारत पर निर्भर है. चीन आने वाले दस वर्षों में विश्व के सामने भीख का कटोरा लेकर खड़ा होगा. जिसे हम वर्तमान में चीन का विकास कह रहे हैं, वह चीन का विकास नहीं, बल्कि चीन का विनाश है. चीन हमारे देश के रॉ-मेटीरियल के बिना जीवित नहीं रह सकता. इंद्रेश जी ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे चीन के माल को त्याग दें तथा स्वदेशी वस्तुओं  से प्यार करें. विद्यार्थियों को इसे अपने जीवन का उद्देश्य व लक्ष्य बना लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि शिक्षा में नैतिकता भी होनी चाहिए, तभी हम अच्छे नागरिक बनेंगे.

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. राजेंद्र कुमार अनायत जी ने कहा कि किसी भी राष्ट्र के समुचित विकास के लिए उसे अपनी संस्कृति के आदर्शों के अनुकूल आगे बढञने के लिए उचित शिक्षा की आवश्यक्ता होती है, क्योंकि शिक्षा द्वारा ही समाज में वांछित परिवर्तन लाया जा सकता है. एकात्म मानववाद व्यक्ति एवं समाज की आवश्यक्ता को संतुलित करते हुए प्रत्येक मानव का गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करता है. व्यक्ति राष्ट्र, समाज, परिवार और चराचर सृष्टि से निकलने  वाली विकास क्रम का ही आविष्कार है.