ध्रुवीकरण का ओछा प्रयास है पादरी की चिट्ठी

दिंनाक: 29 Nov 2017 11:11:02

गुजरात चुनाव में चर्च ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सीधा प्रयास किया है। गांधीनगर के आर्चबिशप (प्रधान पादरी) थॉमस मैकवान ने चिट्ठी लिखकर ईसाई समुदाय के लोगों से अपील की है कि वे गुजरात चुनाव में 'राष्ट्रवादी ताकतों' को हराने के लिए मतदान करें। यह स्पष्टतौर पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय एवं चुनाव आयोग की आचार संहिता का उल्लंघन है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसी वर्ष जनवरी में जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) की नए सिरे से व्याख्या करते हुए निर्णय दिया था कि कोई भी धर्म, जाति, समुदाय या भाषा इत्यादि के आधार पर वोट नहीं माँग सकता। यहाँ तक कि धार्मिक नेता भी अपने समुदाय को किसी उम्मीदवार या पार्टी के पक्ष में मतदान करने के लिए नहीं कह सकता। किंतु, जिनकी आस्थाएं भारत के संविधान की जगह कहीं और हों, उन्हें संविधान या संवैधानिक संस्थाओं के निर्देशों की चिंता नहीं होती। बल्कि, उन्हें उनकी चिंता अधिक रहती है, जो उनके स्वार्थ एवं धार्मिक एजेंडे को पूरा करने में सहयोगी होते हैं।

पादरी ने अपील में बहुत चालाकी से विरोध और समर्थन के लिए किसी राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं लिया है। उन्होंने न तो यह लिखा है कि ईसाई समुदाय भारतीय जनता पार्टी को हराने के लिए मतदान करे और न ही यह कहा है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान करे। किंतु, यह उजागर सत्य है कि 'राष्ट्रवादी ताकत' का उपयोग किसके लिए किया गया है। सन् 1974 में आई फिल्म 'रोटी' का एक गाना बहुत प्रसिद्ध है- 'ये जो पब्लिक है सब जानती है...।' सब जानते हैं कि भारतीय राजनीति में 'राष्ट्रवादी' भाजपा के संदर्भ में उपयोग किया जाता है। इसलिए इसमें किसी को भ्रम नहीं होना चाहिए कि चर्च ने गुजरात चुनाव में किसको हराने का ठेका लिया है। चर्च की किसके साथ नजदीकी है और चर्च के एजेंडे को किसका समर्थन रहता है, यह भी किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर ईसाई होने के कारण भारत में चर्च को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार के कार्यकाल में चर्च का प्रभाव जिस तरह दिखाई दिया था और उसके एजेंडे पर ईसाई मिशनरीज ने जिस तरह खुलकर गतिविधियां संचालित की थीं, उससे कांग्रेस-चर्च के गठजोड़ पर लगे आरोपों को बल मिलता है।

पादरी मैकवान ने सिर्फ ईसाई समुदाय को ही प्रभावित करने का प्रयास नहीं किया है, बल्कि उन्होंने अल्पसंख्यकों, अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जातियों एवं जन-जातियों से 'राष्ट्रवादी ताकतों' के विरोध में मतदान करने की अपील की है। इसके लिए उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा है- 'गुजरात प्रांत के आर्चबिशप आपसे विनती करते हैं कि आप अपने गाँव, नगर, मोहल्लों एवं परिसरों में प्रार्थना-सभा का आयोजन करें ताकि हम लोग गुजरात विधानसभा के लिए ऐसे लोगों को चुन सकें जो भारतीय संविधान के विश्वासी हों और हर मनुष्य का बिना किसी भेदभाव के सम्मान करते हों।' उन्होंने गुजरात चुनाव को महत्त्वपूर्ण बताया है और संदेश दिया है कि किसी भी सूरत में राष्ट्रवादी ताकतों को जीतने नहीं देना है, क्योंकि गुजरात चुनाव के परिणाम का प्रभाव भविष्य में भी असर दिखाएगा। चर्च का इशारा 2019 के आम चुनाव को लेकर है।

हिंदू धर्माचार्यों एवं संगठनों के सामान्य से वक्तव्य पर वितंडावाद खड़ा करने वाले मीडिया घराने, पत्रकार, सामाजिक संगठन एवं राजनीतिक विश्लेषक चर्च के सांप्रदायिक एजेंडे पर गुड़ खाकर बैठ गए हैं। उन्हें पादरी की इस चिट्ठी में कोई खोट नजर नहीं आ रहा है। जबकि यह स्पष्टतौर पर समाज का ध्रुवीकरण करने का प्रयास है। वह लोग भी चुप्पी साध कर बैठे हैं, जो धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत करते हैं। पादरी ने राष्ट्रवादी ताकतों को चुनाव में हराने के लिए 'राष्ट्रवादी विचार' की सर्वथा मिथ्या विवेचना भी की है। उन्होंने इसी जमीन से उपजे 'राष्ट्रीय विचार' को देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए खतरा बताया है, जो सर्वथा अनुचित है।

राष्ट्रवादी ताकतों के उभार से लोकतांत्रिक ताना-बाना भले ही छिन्न-भिन्न न हुआ हो, किंतु चर्च की बेचैनी से यह स्पष्ट है कि उसके एजेंडे में अवरोध जरूर उत्पन्न हुआ है। इसलिए राष्ट्रवादी ताकतों को परास्त कर वह अपने अनुकूल सरकार चाहती है, ताकि दुनिया को ईसाई बनाने के वेटिकन सिटी के लक्ष्य की ओर बिना किसी बाधा के बढ़ सके। किंतु, चर्च और उसके पादरियों को समझना चाहिए कि अब हिंदू समाज भी जागरूक हो चुका है। प्रधान पादरी की इस चिट्ठी को गुजरात ही नहीं, अपितु समूचे देश का हिंदू समाज गंभीरता से लेगा।