न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पूर्व आधुनिक गणित के सिद्धांत की खोज हो चुकी थी

दिंनाक: 29 Nov 2017 10:55:40

 


मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के एक शोध में चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। जिसमें कहा गया है कि केरल के एक छोटे से विद्यालय में न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पूर्व आधुनिक गणित के सिद्धांत की खोज हुई थी। 

मैनचेस्टर विश्वविद्यालय के अध्यापक डॉ जॉर्ज घेवरही जोसफ ने दावा किया है कि केरल के इस विद्यालय ने लगभग 1350 ई० में कैलकुलस के महत्वपूर्ण घटक अनंत श्रेणी (इंफाईनाईट श्रेणी) की पहचान की थी। इस शोध में कहा गया है कि सत्तरहवीं सदी के अंत में गलत तरीके से इसे सर आइजैक न्यूटन और गॉटफ्रिड लाइबनिज की पुस्तक में प्रकाशित किया गया। 

कई महत्वपूर्ण शोध से इस बात के भी प्रमाण मिले है कि गति का नियम न्यूटन ने नहीं बल्कि वैशेषिक दर्शन (Vaisheshika Sutra) के रचनाकार महर्षि कणाद ने लगभग २ या ६ ईसा पूर्व दिया था। 

दुनिया को पहला परमाणु का ज्ञान देने वाले भी ऋषि कणाद ही है । इन्ही के नाम पर परमाणु का एक नाम कण भी कहा जाता है।  महर्षि कणाद ने वैशेषिक दर्शन में गति के तीन नियम का उल्लेख किया है। 

 वेग: निमित्तविशेषात्‌ कर्मणो जायते

The change of motion is due to impressed force.

 वेग निमित्तापेक्षात्‌ कर्मणो जायते नियत्दिक्‌ क्रिया प्रबंध हेतु

The change of motion is proportional‌ to the motive force impressed and is made in the direction of the right line in which‌ the force is impressed.

वेग: संयोगविशेषाविरोधी

To every‌ action there is always an equal‌ and opposite reaction .

मैनचेस्टर विश्वविद्यालय और एक्सेटर विश्वविद्यालय की टीम ने यह भी खुलासा किया कि केरल विद्यालय ने ही यह पता लगाया कि पाई श्रृंखला की राशि कितनी है। साथ ही इसकी सहायता से पाई के 9, 10 तथा बाद में दशमलव के 17 स्थानों की गणना की गयी।

इस बात के प्रमाण भी मिलते है कि पंद्रहवीं सदी में भारतीयों ने अपनी खोज संबंधी जानकारी भारत की यात्रा पर आये जेसुइट मिशनरियों को दे दिया। उन्होंने इन मिशनरियों को अपनी खोज के बारे में शिक्षित किया और अंतत: यह खोज न्यूटन के हाथ लग गयी। 

डॉ जोसफ ने प्रिंसटन यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित अपनी सर्वश्रेष्ठ सेलिंग पुस्तक 'द क्रेस्ट ऑफ द पीकॉक: द नॉन-यूरोपियन रूट्स ऑफ मैथमैटिक्स' के तीसरे संस्करण में खुलासा किया है कि आधुनिक गणित की शुरुआत आमतौर पर यूरोपीय उपलब्धि के रूप में देखी जाती है लेकिन मध्य युग में चौदहवीं और सोलहवीं शताब्दी के बीच भारत की खोज को नजरअंदाज कर दिया गया है या भुला दिया गया है।

सत्तरहवीं शताब्दी के अंत में न्यूटन के काम की प्रतिभा प्रशंसनीय है।  खासकर के एल्गोरिदम कैलकुलस का सिद्धांत। लेकिन केरल स्कूल के अन्य नाम, खासकर माधव और निलाकंठ, को भी उनके साथ कंधे से कंधा मिला के खड़ा होना चाहिए क्योंकि उन्होंने कैलकुलस के अनंत श्रृंखला के दूसरे महान घटकों की खोज की है। 

केरल स्कूल के योगदान को नकारने के पीछे कई कारण थे -

  गैर यूरोपीय दुनिया से उत्पन्न वैज्ञानिक विचारों की उपेक्षा करना।

यूरोपीय उपनिवेशवाद की विरासत और उसके परे।

साथ ही केरल के योगदान को नकारने के पीछे वहां की स्थानीय भाषा, मलयालम की कम जानकारी होना भी था। जिसमें गणित के उल्लेखनीय सिद्धांत जैसे युक्तिभास आदि में लिखे गए हैं। उन्होंने कहा कि कुछ अन्य कारणों में यह भी कहा गया है कि पूर्व से पश्चिम तक ज्ञान के संचरण का दावा करने के लिए आवश्यक प्रमाणों के मानक पश्चिम से पूर्व तक के ज्ञान के लिए आवश्यक साक्ष्य के स्तर से कही अधिक है।

निश्चित रूप से यह सोचना मुश्किल है कि पश्चिम के देश भारत और इस्लामिक दुनिया से ज्ञान और पुस्तकों को आयात करने की 500 साल पुरानी परंपरा को छोड़ देंगे। 

लेकिन हमने जिन सबूतों को पाया है उससे कही अधिक प्रमाण मिलते है। उस समय जानकारी इकट्ठा करने के लिए बहुत अवसर थे, क्योंकि यूरोपीय ईसाइ उस समय क्षेत्र में मौजूद थे।

उन्होंने गणित को मजबूती के साथ सीखा। साथ ही वे स्थानीय भाषाओं से भी अच्छी तरह से परिचित थे। तब वहां मजबूत प्रेरणा थी। पोप ग्रेगरी XIII ने जूलियन कैलेंडर के आधुनिकीकरण को देखने के लिए एक समिति की स्थापना की थी। 

इस समिति में जर्मन जेसुट खगोलशास्त्री/ गणितज्ञ क्लेवियस थे जिन्होंने बार-बार यह जानने की कोशिश किया कि दुनिया के अन्य स्थानों पर कलेंडर कैसे बनते है। तब इस क्षेत्र में केरल विद्यालय निस्संदेह एक अग्रणी केंद्र था। 

इसी तरह अन्वेषण की यात्रा पर सटीक समय रखने सहित बेहतर नौवहन विधियों की जरूरत बढ़ती गयी। साथ ही वैसे गणितज्ञों को बड़े पुरस्कारों की पेशकश की गई जिन्होंने खगोल विज्ञान में विशेषज्ञता प्राप्त की थी। उस समय यूरोप के अग्रणी जेसुइट शोधकर्ताओं से पुरी दुनिया में सूचना देने के लिए कई बार अनुरोध किए गए थे। उस समय केरल गणितज्ञ इस क्षेत्र में अत्यधिक कुशल थे। -इंद्रभूषण