केरल में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या वामदल की सुनियोजित साजिश : जे नंदकुमार

दिंनाक: 04 Nov 2017 20:38:01

रांची l राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय संयोजक जे. नंदकुमार ने कहा कि केरल में संघ कार्यकर्ताओं की हत्या कम्युनिस्ट पार्टी की एक सुनियोजित साजिश है। कम्युनिस्ट पार्टी लोकतंत्र की दुश्मन है। इसके लोग केरल में खूनी खेल खेल रहे हैं। इनका स्वभाव स्वरूप नहीं बदलने वाला। यही नहीं, कम्युनिस्ट पार्टी अपने खूनी खेल में केरल के मुस्लिम समुदाय के उन युवाओं का सहयोग ले रही है, जो आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से जुड़े हैं। जे. नंदकुमार जी बीते 28 अक्टूबर दिन शनिवार को होटवार स्थित खेलगांव के बिरसा स्टेडियम में प्रज्ञा प्रवाह की गोष्ठी में बोल रहे थे। विषय था-केरल में कम्युनिस्ट आतंक बनाम लोकतंत्र का भविष्य।

उन्होंने कहा कि हमारे भारत देश के तीन दोष हैं-कम्युनिस्टों का राष्ट्र विरोधीवाद,मुसलमानों का आतंकवाद और ईसाइयों का मिशनरीवाद। देश को इन तीनों दोषों से मुक्त करने के लिए हम सबों को एकजुट होने की जरूरत है। 

जे. नंदकुमार ने कहा कि केरल में नियोजित तरीके से संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या की जा रही है। 1969 से लेकर अब तक 286 स्वयंसेवकों की हत्या की जा चुकी है। इनमें चार महिलाएं भी हैं।

उन्होंने कम्युनिस्ट विचारधारा को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि लोकतंत्र में इस विचारधारा की कोई जगह नहीं है। वे श्रमिक तानाशाही की बात करते हैं। तानाशाही पूंजीपति की हो या श्रमिक की, दोनों ही खतरनाक हैं। उन्होंने कहा कि कम्युनिस्ट विचारधारा संविधान के खिलाफ है। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं, लेकिन दूसरी विचारधारा को पनपने ही नहीं देते।

केरल एक ऐसा प्रदेश है, जो सर्वाधिक साक्षर है, लेकिन वहां पार्टी पंचायत है। केरल में कम्युनिस्टों ने हर गांव को पार्टी से जोड़ दिया है। जो उनके खिलाफ जाता है, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता है।

केरल में संघ के इतिहास पर रोशनी डालते हुए जे नंदकुमार ने कहा कि 1942 में संघ ने यहां काम करना शुरू किया और इसके एक दशक पहले कम्युनिस्ट पार्टी ने। श्री कुमार ने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि 19वीं सदी में स्वामी विवेकानंद जब यहां आए तो यहां की जाति व्यवस्था को देखकर इसे पागलखाना करार दिया था। इसका लाभ उठाते हुए कम्युनिस्टों ने आक्रामक तरीके से काम करना शुरू किया। उन्हें यहां खुला मैदान मिल गया, जबकि संघ का काम धीमी गति का था।

केरल के राजनीतिक इतिहास का हवाला देते हुए जे.नंदकुमार ने कहा कि इस दौर में संघ अपना काम कर रहा था। कम्युनिस्ट कमजोर हो रहे थे, कम्युनिस्टों ने मुस्लिम लीग से हाथ मिला लिया और सत्ता पर काबिज हो गए। अब केरल ही उनके हाथ में है, इसलिए वे और आक्रामक होकर संघ कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्या कर रहे हैं। यह भी जिक्र किया कि कुछ लोग बोलते हैं, और निचले स्तर के कार्यकर्ता काम को अंजाम देते हैं। कम्युनिस्ट लीडरशिप का इससे मतलब नहीं है, जबकि यह भ्रम है। उनकी लीडरशिप ही इसे अंजाम देती है।

 

राष्ट्र के निर्माण में जनजातीय का योगदान भी अहम : दत्तात्रेय होसबाले

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने प्रज्ञा प्रवाह के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश के निर्माण में जितना कथित सभ्य समाज का योगदान है, उतना ही जनजातीय समाज का भी। उन्होंने भारतीय संस्कृति, सभ्यता पर प्रकाश डालते हुए कहा जो नगर में रहे, वे नागरिक कहलाए, गांव में रहने वाले ग्रामीण और जंगल में रहने वाले जनजातीय। इन सबका योगदान राष्ट्र निर्माण में है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता का मुद्दा उठाते हुए कहा कि कुछ लोग इस पर प्रश्न उठा रहे हैं। वे आजादी के सत्तर सालों के बाद भी मानसिक औपनिवेशिकवाद के शिकार हैं।

श्री होसबाले ने कहा कि पश्चिम की अवधारणा के अनुरूप हम अपने राष्ट्र को नहीं देख सकते। उनकी अवधारणा अलग है। भारत में राष्ट्र मनुष्य को कर्म की प्रेरणा देने वाली ईकाई है। राष्ट्रीयता की भावना से ही लागों में एकता आती है। आज देश में पहचान और अस्मिता के अनेक प्रश्न खड़े हो रहे हैं। यह प्रश्न जानबूझकर खड़े किए जा रहे हैं, लेकिन अपने देश में कई अस्मिता के लोग साथ-साथ रहते आए हैं। कहीं कोई विरोध नहीं। राष्ट्र के लिए अस्मिता बाधक नहीं है।

उन्होंने कहा कि देश स्वतंत्र तो हो गया, लेकिन राष्ट्र प्रकट नहीं हुआ। सत्य और सत्व उजागर होना चाहिए था, लेकिन आजादी के बाद यह हो नहीं पाया। गुलामी ने हमें शिथिल कर दिया था। जैसे वृक्ष एक समय बाद बूढ़ा होकर खत्म हो जाता है, वैसा ही अपने देश के साथ हुआ, लेकिन अब समय आ गया है कि हम फिर से उठ खड़े हों। अपने देश के गौरव को पुन: प्रतिष्ठापित करें। भारत के प्रति घृणा रखने का काम नव अंग्रेजवाद ने किया। भारत को जो 70-80 सालों में करना चाहिए था, नहीं कर पाया। अब इस कार्य को प्रज्ञा प्रवाह ने अपने हाथ में लिया है। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, संस्कृति, सभ्यता को स्थापित करना और गुलामी की मानसिकता को दूर करना ही इसका उद्देश्य है। इसी के मद्दनेजर भोपाल में 11 महीने पहले लोक मंथन का कार्यक्रम हुआ था। उसमें जो विचार आया, उसे दो पुस्तकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। हर दो साल में ऐसे कार्यक्रम होंगे।

 

 

 

 

 

 

 

दो पुस्तकों का लोकार्पण : इस मौके पर भोपाल में हुए कार्यक्रम से छनकर आए विचारों की दो पुस्तकों एवं एक काफी टेबल बुक का लोकार्पण केंद्रीय विवि के कुलपति डा. नंद कुमार यादव, दत्तात्रय होसबोले, कनार्टक विधानपरिषद के सदस्य पीवी कृष्ण भट्ट आदि ने किया। अध्यक्षता करते हुए कुलपति नंद कुमार यादव ने कहा कि काफी ज्ञानवर्धक यह सत्र रहा है। दिमाग को काफी खुराक मिली। नई चीजों को जानने का मौका मिला। औपनिवेशिक शक्तियां राष्ट्र के सामने गंभीर चुनौतियां हैं, जिनका सामना हमें करना है। कार्यक्रम में देश भर से आए प्रतिनिधि शामिल थे। कार्यक्रम में केंद्रीय राज्य मंत्री सुदर्शन भगत जेएनयू में प्रोफेसर रहे प्रो. कपिल कपूर, भोपाल साहित्य अकादमी के अध्यक्ष उमेश कुमार सिंह, दीपक शर्मा, प्रसन्न देशपांडेय, डा. मुकेश मिश्रा सहित रांची शहर के भी संघ के लोग मौजूद थे।