भारत के महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन-जन्मदिवस/22 दिसम्बर, 1887

दिंनाक: 22 Dec 2017 17:56:47


भोपाल(विसंके). तमिलनाडु प्रदेश में कुम्भकोणम के पास ‘इरोद’ नामक छोटे से गांव में निवास करने वाले श्रीनिवास अय्यंगर व माता कोमलम्माल के उदर से 22 दिसंबर सन 1887  में पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम रामानुजन रखा गया. पूरा परिवार नामक्कुल गाँव की ‘नामगिरी’ देवी का भक्त था. कहते हैं कि इनकी नानी  रंग्म्माल जो इनके परिवार के साथ ही रहती थी वह देवी की भक्त थी. देवी इनके मुंह से बोलती थी. जब देवी शरीर में आयीं तभी माता-पिता द्वारा पुत्र की कामना करने पर कुशाग्र बालक होने का वचन दिया था. पाँच वर्ष की आयु में गाँव की शाला में प्रवेश हुआ. दो वर्ष बाद ही कुम्भकोणम के हाईस्कूल में प्रवेश हो गया. गणित विषय में बचपन से ही विशेष रूचि होने के कारण इतनी छोटी आयु में भी यही प्रश्न कि “गणित का सबसे बड़ा सत्य कौन सा है ?” विद्यालय में जब शिक्षक पढ़ाते समय कुछ कमजोर अनुभव करते तब रामानुजन उठकर उनका सहयोग करते. साथियों के साथ ही शिक्षकों के वे अतिप्रिय बन गए. अपनी विलक्षण बुद्धि के कारण ‘दसवीं’ में पढ़ते समय ही उन्होंने बी.ए. में पढ़ाई जाने वाली ‘त्रिकोणमिति’ शास्त्र का अभ्यास पूर्ण कर लिया था. इसके बाद पाश्चात्य लेखक ‘लोनी’ द्वारा लिखित ‘ट्रिगनोमेट्री’ पर दोनों ग्रंथो को आत्मसात कर आवश्यक संशोधन भी किये. रामानुजन दिसंबर 1903 में मेट्रिक की परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए जिससे पुरस्कार के रूप में सुब्रह्मण्यम छात्रवृत्ति प्रदान की गई. रामानुजन को कुम्भकोणम के महाविद्यालय में बी.ए. में प्रवेश मिल गया परन्तु गणित को छोड़ सभी विषयों में फेल हो गए जिससे मिलने वाली छात्रवृत्ति बंद होने से पेट और आगे की पढ़ाई का संकट खडा हो गया. कुम्भकोणम को छोड़कर वह मद्रास आ गए. वहाँ कुछ ट्यूशन के द्वारा अर्थोपार्जन कर आगे की पढ़ाई प्रारम्भ की पर 1908  में दी परीक्षा में गणित को छोड़ सभी विषयों में अनुत्तीर्ण होने से हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ दी . 1909 में 9 वर्ष की बालिका जानकी के साथ 22 वर्षीय रामानुजन का विवाह हो गया. अब धन कमाना और जरूरी हो गया था. पिताजी एक निजी कपड़ा व्यापारी के यहाँ काम करते थे. नौकरी के लिए वह मद्रास के ‘इन्डियन मैथेमेटिकल सोसाइटी’ के उच्चाधिकारी रामास्वामी से मिले जिससे उन्होंने ‘रामास्वामी प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्राध्यापक शेषु अय्यर को पत्र लिखने से महालेखाकार  कार्यालय में अस्थायी नौकरी मिल गयी. एक बार एक मित्र ने कहा कि सुना है तुम बड़े असामान्य पुरुष हो तो रामानुजन ने उन्हें हाथ दिखाए. मित्र ने कहा ये कैसे हुआ ? तो उत्तर दिया कि स्लेट पर लिखते और पोंछते यह दशा हो गयी है. तब मित्र के यह कहने पर की स्लेट की बजाय कागज-पैन का उपयोग क्यों नहीं करते तब उन्होंने दुखी स्वर से उत्तर दिया “भले आदमी ! जहाँ रोज पेट के लिए एक बार अन्न मिलने की मुसीबत हो वहाँ कागज के लिए पैसा कहाँ से लाऊं ?” नौकरी छूटने के बाद शेषु अय्यर ने वेल्लूर (आँध्रप्रदेश) के जिलाधिकारी रामचंद्रन को सिफारिशी पत्र लिख दिया जिसमें ‘पोर्ट ट्रस्ट’ में लिपिक की पच्चीस रुपये प्रतिमाह की नौकरी मिल गयी पर गणित विषय की साधना अनवरत चलती रही. रामानुजन न जन के न धन के वह केवल गणित के उपासक थे. सन 1911 में रामानुजन का 14 पृष्ठ का शोध पत्र व 9 प्रश्न इंडियन मैथमेटिकल सोसाइटी की शोध पत्रिका में प्रकाशित हुए. फलस्वरूप फ्रांसिस स्प्रिंग व सोसाइटी के कोषाधिकारी नारायण अय्यर के निवेदन से भारत की वैधशाला प्रमुख गिल्बर्ट के कहने से मद्रास विश्वविद्यालय से उन्हें 75 रुपये मासिक की छात्रवृत्ति 26 फरवरी 1913 से मिलने लगी और 1 मई 1913  से वह पूर्णकालिक व्यावसायिक गणितज्ञ बनकर शोध करने लगे. रामानुजन के गणित के सूत्रों से विश्व प्रसिद्द गणितज्ञ प्राध्यापक जी.एच.हार्डी व जे.ई. लिटलवुड इस मेट्रिक पास युवक से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय आने का निमंत्रण दे दिया. उन दिनों समुद्र की यात्रा निषिद्ध मानी जाती थी. पर माँ की अनुमति से वह जाने को तैयार हो गए. मद्रास विश्वविद्यालय ने 1 अप्रेल 1914 को 250 /- पौण्ड की दर से छात्रवृत्ति व प्रवास व्यय प्रदान कर दिया जिससे वह प्राध्यापक नेबिल के साथ नेवासा जलयान में बैठकर इंग्लैंड चले गए. 250/- पौण्ड में से 60/- प्रतिमाह परिवार को देने का अनुरोध विश्वविद्यालय ने मान लिया था. 14 अप्रैल को लन्दन पहुँच 18 अप्रेल को केम्ब्रिज पहुँच गए जहाँ डेढ़ महीने बाद ट्रिनिटी कॉलेज में रहने के लिए छात्रावास मिल गया. 1914 से 1918 तक 24 शोध पत्र प्रकाशित हुए. 1917 में रॉयल सोसाइटी की फेलोशिप 77 वर्ष बाद किसी भारतीय को प्रदान की गयी. अत्याधिक श्रम के कारण क्षयरोग हो गया. वह 27 फरवरी 1919 को नायोगा जलयान में बैठकर 27 मार्च 1919 को भारत में घर आ गए लेकिन परिवार और भारत की जलवायु के कारण भी स्वास्थ्य अच्छा न हो सका. पर शोध कार्य को जारी रख 12 जनवरी 1920 को नयी नियामिका जिसका नाम ‘माक-थीटा’ दिया. प्रो. हार्डी को यह शोध पत्र उदाहरण के साथ भेज दिए. इसके बाद जो प्रमेय इस बीमारी में भी सूझे उन्हें व्यवस्थित कर प्रो. हार्डी को भेजने की तैयारी ही थी कि 26 अप्रेल 1920 को 33 वर्ष की अल्पायु में विश्व को अपनी-भारत की प्रतिभा से चमत्कृत कर देने वाले महान गणितज्ञ का दु:खद निधन हो गया. एक स्नेही, कुशाग्र, हंसमुख स्वभाव व माँ के लिए अपार आदर मन में रखने वाले गणितज्ञ रामानुजन की मृत्यु का समाचार ड्यूजबरी ने जब अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गणितज्ञ प्रो. हार्डी को दिया तो उन्होंने शोक पत्र में लिखा “रामानुजन को प्राप्त यश तथा उसके लिए कार्य को मिली सर्वमान्यता अन्य किसी भी भारतीय गणितज्ञ को मिली होती तो वह फूला न समाता. किन्तु सत्य तो यह है कि रामानुजन एक महान व्यक्ति थे. वह जैसे गणितज्ञ थे वह वैसे इंसान भी थे” |

लेखक :- धीर सिंह पवैया                                                                                               साभार:- एकात्मा के स्वर