भारत की स्त्रियों में रत्न -महान विदुषी गार्गी

दिंनाक: 23 Dec 2017 13:52:37


 भोपाल(विसंके). इनका जन्म वचक्नु ऋषि के यहाँ पर हुआ इसलिए इन्हें ‘वाचक्नवी’ कहते थे और गर्ग गोत्र के कारण गार्गी नाम पड़ा. शास्त्रों और वेदों का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया था. एक बार राजा जनक ने एक बड़ा यज्ञ किया जिसमे कुरु और पांचाल से लेकर देश के मूर्धन्य विद्वान बुलाये गए थे. राजा जनक बड़े विद्या व्यसनी थे. उन्हें शास्त्र के गूढ़ तत्वों का विवेचन और परमार्थ चर्चा अधिक प्रिय थी. इसलिए आये ब्राह्मणों से तात्विक विवेचन करने वाला कौन है ? यह जानने के लिए दस हजार गायों के प्रत्येक सींग में दस-दस पाद स्वर्ण मुद्राएँ बंधवा दी और राजा ने कहा कि आप में से जो सबसे बढ़कर ब्रह्मवेत्ता हो वह इन गायों को ले जा सकता है. राजा की इस घोषणा को सुनकर कोई भी ब्राह्मण गायों को ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा सका. अपने ब्रह्मवेत्तापन में संदेह हुआ. तभी सबको मौन देख महर्षि याज्ञवल्क्यजी ने अपने ब्रह्मचारी (जो सोमदेव का अध्ययन करता था) से कहा सौम्य, इन गायों को तू हांक ले चल, ब्रह्मचारी ने वैसा ही किया. तभी विदेहराज जनक का होता अश्वबल याज्ञवल्क्य से प्रश्नोत्तर करने लगा. फिर क्या था, शास्त्रार्थ शुरु हो गया. एक-एक कर सभी प्रश्न पूछने लगे और सभी अपना समाधान पाकर बैठते गए. सभी को परास्त होते देख वाचक्नवी गार्गी ने पूछा भगवन यह जो पार्थिव पदार्थ है वह सब जल में ओतप्रोत है और जल किस्मे ओतप्रोत है ? जल वायु में उत्तर मिला. इस प्रकार क्रमश: वायु, आकाश अंतरिक्ष, गन्धर्वलोक आदित्यलोक, चंद्रलोक नक्षत्रलोक, देवलोक, इन्द्रलोक और प्रजापति लोक के सम्बन्ध में प्रश्न्नोतर होने पर गार्गी ने पूछा कि ब्रह्मलोक किसमें ओत-प्रोत है. तब याज्ञवल्क्य ने यह तो अति प्रश्न है. गार्गी यह उत्तर की सीमा है. अब इसके आगे प्रश्न नही हो सकता. अब तू प्रश्न न कर नहीं तो तेरा सिर गिर जायेगा. विदुषी गार्गी ने ऋषि के अभिप्राय को समझ लिया और चुप हो गयी. एक अन्य प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य ने अक्षर तत्व का जिसे परब्रह्म परमात्मा कहते हैं, भलीभांति निरूपण किया. गार्गी और याज्ञवल्क्य एक दुसरे की विद्वता का लोहा मान गए. ऐसी महान विदुषी थी, ऋषि कन्या गार्गी.  

लेखक:-धीरसिंह पवैया                                                                                                  साभार:-एकात्मा के स्वर