गुरु गोविन्द सिंह -जन्मदिवस/25 दिसम्बर, 2017

दिंनाक: 25 Dec 2017 17:21:49


भोपाल(विसंके). गुरु गोविन्दसिंह का जन्म सिक्ख पंथ की स्थापना करने वाले गुरु नानकदेव की नौवीं पीढ़ी तेगबहादुर के यहाँ माता गुजरी से 22 दिसंबर सन 1666 पौष सुदी सप्तमी को पटना साहेब विहार में हुआ. नाम गोविन्दराय रखा गया. फरवरी 1671  में गोविन्दराय परिजनों के साथ आनंदपुर आ गए. जहाँ बज्जरसिंह से घुड़सवारी, सतीदास से फ़ारसी और गुरुबख्स से गुरुमुखी सीखी. दिल्ली में औरंगजेब के अत्याचारों से दुखी हो कश्मीर के ब्रह्म्वृंद  1675 में गुरु तेगबहादुर के पास आये तब अपने पिता को विचार मग्न बैठे होने का कारण जान नौ वर्ष के गोविन्दराय ने कहा, “आपसे बढ़कर और कौन गौरवशाली धर्मात्मा पुरुष हो सकता है.” गुरु ने कहा, ब्राह्मणों, जाकर कह दो, यदि गुरु तेगबहादुर धर्मान्तरण कर ले तो हम सब तैयार हैं. 11 नवम्बर 1675 को औरंगजेब ने गुरु को पकड़ इस्लाम न स्वीकारने के कारण चांदनी चौक दिल्ली में मरवा डाला. गुरूजी ने पूर्व में ही 8 जुलाई 1675  गोविन्दराय को नौ वर्ष की आयु में गुरु गद्दी पर आसीन कर दिया था. सन 1689 में पहले युद्ध में पहाड़ी राजा कलिहुर को सैय्यद बुद्धूशाह के सहयोग से परास्त किया. इसके बाद लोट्गढ़ आनंदगढ़ केशगढ़ और फतेहगढ़ दुर्गों का निर्माण करवाया.

                पराजितों से संधि कर औरंगजेब को कर दिलाना बंद करवा दिया. दिल्ली के निर्देश पर लाहौर से सूबेदार दिलावर खान की आक्रमण के लिए आई सेना को भी भगाकर लुटेरे हुसैन खां को पराजित कर दिया. औरंगजेब जो उस समय दक्षिण में था, ने अपने पुत्र मुअज्जम को भेजा तो पहाड़ी राजाओं को तो परास्त कर दिया पर आनंदपुर का बाल बांका न कर सका. सन 1699 को वैशाखी के दिन बुलायी गई अनुयायियों की भरी सभा में गुरूजी सिक्खों के सन्मुख नंगी तलवार लेकर बोले “है कोई ऐसा जो धर्म के लिए अपने प्राण दें.” सन्नाटा छा गया, गुरूजी को क्या हो गया? सब एक दूसरे की और डरे, सहमें हुए से देख रहे थे. तभी लाहौर का दयाराम खत्री उठा, “मैं प्रस्तुत हूँ” शामियाने में ले गए, खच्च की आवाज आई, रक्त लगी नंगी तलवार ले वही आवाज फिर लगायी. और इसी क्रम में धर्मदास जाट दिल्ली, मोहकमचन्द्र द्वारका, हिम्मतराय रसोइया जगन्नाथपुरी और पाँचवा साहिबचंद नाइ बीदर सामने आया. थोड़ी देर में गुरु इन पाँचो को लेकर सभा के सामने लाये, पंज प्यारे कहकर “खालसा पंथ” की स्थापना की. खालसा को गुरु व गुरु को खालसा का स्थान दिया. केश, कड़ा, कंघा, कच्छा और कृपाण रखने के निर्देश दिए. ऊंच-नीच, जाति-पांति को समाप्त कर अपने नाम के साथ सिंह शब्द लिखने को कहा. स्वयं गुरु गोविन्दराय से गुरु गोविन्द सिंह बने. अमृत छकाया और स्वयं छका, जय घोष दिया-“वाहि गुरूजी का खालसा, वाहि गुरूजी की फ़तेह” खालसा-ईश्वर का है और ईश्वर की विजय सुनिश्चित है. पहाड़ी राजा अभी भी शांत नहीं बैठे थे. सभी ने एकत्रित हो बीस हजार की सेना ले आक्रमण कर दिया जिसका उत्तर केवल आठ हजार की सेना द्वारा दिया गया जिन्हें परास्त कर रोपड़ तक भगाया. चिंतित औरंगजेब ने 22  पहाड़ी राजाओं को साथ ले सरहिंद, लाहौर और जम्मू के सूबेदारों के साथ आनंदपुर साहिब पर आक्रमण कर दिया. प्रथम में तो मुग़ल सेना को परास्त होना पड़ा पर किले का घेरा कड़ा कर देने से बाहर का सम्बन्ध टूट गया. संकट जान 21  दिसंबर सन 1708  को पत्नी, चारों बच्चों, सैनिकों को ले किला छोड़कर निकल गए. पता लगने पर युद्ध हुआ जिसमें 19  वर्षीय अजीतसिंह और 14 वर्षीय जुझारसिंह युद्ध में शहीद हो गए 40  सिक्खों को ले गुरूजी चमकौर की गढ़ी में पहुँच गए. पर परिवार के शेष लोग, दोनों छोटे बालक व माता गुजरी भटक कर पुराने रसोइया गंगाराम के गाँव पहुंचे जहाँ उसने विश्वासघात कर सरहिंद के सूबेदार वजीर खान को सौंप दिया. वजीर खान ने जीवित ही जोरावरसिंह और फ़तेहसिंह को दीवार में चुनवा दिया पर मुस्लिम धर्म स्वीकार नहीं किया. यह दु:खद समाचार सुन माता गुजरी ने प्राण त्याग दिए. गुरु की दोनों पत्नियाँ सुंदरी व साहिबादेवी भाई मनिसिंह के साथ दिल्ली पहुँच गयीं. गुरूजी ने चमकौर से तीन साथियों के साथ निकलकर पुनः सेना एकत्रित की तभी खिंडराना (मुक्तसर) में वजीरखान की सेना से मुठभेड़ हो गयी. चालीस सिक्खों के पराक्रम से वजीर खान को पराजित कर तलवंडी साबू (दमदमा) पहुँच गए. यहां पर रहते गुरु ने ‘गरु ग्रन्थ साहिब’ को पुनः संपादित किया. आगे यह स्थान सिक्खों की “काशी”  के रूप में परिचित हो गया.

                दक्षिण को जाते समय गुरूजी की उज्जैन के संत नारायणदास के बताये अनुसार “नावेर” के बैरागी माधोदास से भेंट नांदेड में हुई. गुरु गद्दी पर जा बैठे. माधोदास ने वहां से हटाने के लिए मन्त्रों का प्रयोग किया पर सफलता न मिलने से उनकी शक्ति को समझ, उनके द्वारा पूरे देश की स्थिति को सुन, वह गुरूजी का बंदा (गुलाम) हो गया. अब वह बंदा बैरागी कहलाने लगा. गुरूजी ने अपने छूटे हुए कार्य को करने के लिए उत्तराधिकारी के नाते पंजाब भेज दिया. वीरों को प्रेरित करते हुए कहते “सवा लाख से एक लडाऊं, चिड़ियों से में बाज लडाऊं गायों से में सिंह लडाऊं, तो गुरु गोविन्द सिंह नाम कहाऊँ” खालसा पंथ की सफलता के लिए भगवती की प्रार्थना- “सकल जगत में खालसा पंथ गाजै- जगे हिन्दू धर्म हन्दू सकल भंड भाजै” करने वाले वीर शिरोमणि गुरु गोविन्द सिंह जब नांदेड (महाराष्ट्र) में विश्राम कर रहे थे तभी एक पठान ने आक्रमण कर दिया यद्यपि गुरूजी ने अपनी तलवार से उसे मार डाला व अन्य दो साथियों को भी बाहर खड़े लोगों ने मार डाला. तीन चार दिन के बाद 7 अक्टूबर 1707 में ‘वाहि गुरूजी का फ़तेह’ बोलकर अपने प्राण छोड़ दिये.


लेखक:- धीर सिंह पवैया                                साभार:-एकात्मा के स्वर