सामाजिक क्रांति के अग्रदूत डॉ. अम्बेडकर-डॉ किशन कछवाहा

दिंनाक: 06 Dec 2017 11:00:09

“संतन के मन होत है, सब के हित की बात” डॉ. अम्बेडकर ऐसे ही महापुरुष थे जिन का मानना था कि समाज जीवन सुचारू ढंग से चलाना है, तो समाज रचना समरसता व न्याय के तत्व पर खड़ी करनी चाहिए | समाज के किसी भी घटक के मन में ऐसी भावना उठने का अवसर नहीं दिया जाना चाहिए, जब वह सोचे कि उसके साथ अन्याय हो रहा है | इस प्रकार के समाज निर्माण के अत्यंत कठिन एवं जटिल मार्ग पर वे चले | सारे समाज की उन्नति के लिए उनका संघर्ष था | उनका यह दृढ विश्वास था की केवल अस्पृश्यता का अंत हो जाने से केवल अस्पृश्यों का ही नहीं वरन सारे समाज का कल्याण हो जायेगा |

सत्याग्रह करते समय, लेख लिखते समय और भाषण देते समय उन्होंने हर समय इसी भूमिका को प्रुस्तुत किया | भारतीय संविधान के निर्माता, समरसता के अग्रदूत, महामानव बाबा साहब अम्बेडकर  का जन्म 14 अप्रेल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में पिता श्री रामजी सकपाल एवं माता भीमा बाई के घर हुआ था | ये धर्म प्रेमी थे | उस समय महार जाती को अस्पृश्य माना जाता था | इस कारण से परिवार के बालक भीम को कदम-कदम पर समाज में विद्यालय में सभी जगह भेदभाव और असमानता का अपमान सहन करना पडा था | गरीबी और अभाव भी उनके मार्ग  के अवरोध बने लेकिन तमाम अवरोधों को पर करते हुए उन्होंने न केवल उच्च शिक्षा पूरी की वरन अध्यापकीय कार्य करते- करते सन 1923 में लंदन से बेरिस्टर की उपाधि लेकर भारत लौटे सन 24 में बाबा साहब ने अपने संकल्प को पूरा करने के लिए, निर्धन एवं निर्बलों के उत्थान की गति को आगे बढ़ने के लिए, बहिष्कृत हितकारिणी सभा, का गठन किया |

उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखी | मूकनायक नामक पाक्षिक पत्र का प्रकाशन भी प्रारंभ किया | उनका व्यक्तित्व विशाल था और अध्ययन का क्षेत्र भी विस्तृत था | डॉ. अम्बेडकर पहले भारतीय थे जिन्हें किसी विदेशी विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की डिग्री प्राप्त  थी | कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान ही अर्थशास्त्र पर एक लघु शोध निबंध ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रशासन और वित्त प्रबंध लिखा था | उनकी एक अन्य पुस्तक ‘ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त व्यवस्था का विकास’ लिखी थी  | उस आधार पर उन्हें अर्थशास्त्री भी माना जाना चाहिए | वे अर्थशास्त्री, विधि विशारद और शिक्षा शास्त्री थे | वायसराय कौंसिल में श्रम मंत्री होते हुए श्रम नीति पर दिए गए उनके भाषण उनकी मौलिक सोच को उद्घाटित करते हैं | वे देश के विधि पंडितों की पंक्ति में तो अग्रणी थे ही | उन्हें संघीय संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया था | विधमान एवं आसन्न विविध परिस्थितियों के कारण संविधान का अधिकाँश कार्य उन्हें ही करना पडा था | स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्हें प्रथम विधि मंत्री बनाया गया था |

उनके मन में यह बात सदा कचोटती रहती थी कि इतने सामाजिक उत्थान के कार्यों, तमाम प्रयासों, के सत्याग्रहों के बावजूद वे छुआछुत को हिन्दू समाज से समाप्त नहीं कर पाए | अंततः उन्होंने अपने मित्र तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री दत्तोपंत ठेंगडी से कहा- मैं अपने जीवन के संध्या काल तक पहुँच गया हूँ | मुझपर यह बहुत बड़ा दायित्व है कि मैं अपने जीवन काल में ही अपने लोगो को सही दिशा दे जाऊं, जिससे मेरे बाद वे कहीं गलत दिशा में न चले जावें | डॉ. आंबेडकर ने यह सिद्ध करने के लिए पूरी पुस्तक ही लिख डाली की शुद्र वास्तव में क्षत्रिय थे और अस्पृश्य लोग भी इसी भारतीय समाज के अंग थे | इस तरह आर्यों के विदेशी होने, भारत पर आक्रमण करने या भारतीय लोगों को अछूत बनाने वाली बातें झूठी हैं  | डॉ  अम्बेडकर ने हिन्दूधर्म छोड़ने के बाद किसी दूसरे धर्म में जाने की बात सोची थी, तो उन्होंने इस्लाम को इसलिए अस्वीकार किया था, क्योंकि उनके अनुसार इस्लाम एक विदेशी धर्म है और इस प्रकार मुस्लिम होने का अर्थ, धर्म का परिवर्तन ही नहीं बल्कि देश का परिवर्तन भी है | डॉ. अम्बेडकर ने यह बात बार-बार और बिना लग लपेट के पूरी स्पष्टता के साथ कही है |  डॉ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म इसलिए चुना, क्योंकि वे बोद्ध धर्म को एक ‘भारतीय धर्म मानते थे | 6 दिसंबर 1956 को उन्होंने अपना नश्वर शरीर छोड़ दिया | शिक्षा के विस्तार तथा हिन्दुत्व के जागरण के कारण छुआछुत जैसी व्यवस्था अब समाप्त प्राय है | यह अब डॉ. अम्बेडकर जैसे महापुरुषों के परिश्रम और प्रयासों का ही दूरगामी सुपरिणाम है | डॉ. अम्बेडकर ने सन 1948  में ही एक सार्वजनिक वक्तव देकर पाकिस्तान के हरिजनों से कहा था कि वे धर्म परिवर्तन न करें और भारत आ जायें | उन्होंने उसी वक्तव्य में यह भी कहा था कि यदि हरिजन भाईयों को वहां जबरदस्ती मुसलमान बना लिया गया है तो वे उन हरिजन भाइयों को उनके पुराने धर्म में वापिस कराएँगे |

आधुनिक काल में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार, बुद्ध, विवेकानंद और बाबा साहब आंबेडकर को व्यवहार और आचरण में उतार लायें क्योंकि जब तक अत्यधिक जिम्मेदार हैं | जब तक जाती अभिमान प्रबल है, हिन्दू समाज प्रबल शक्ति के रूप में आकार नहीं ले सकेगा | डॉ. अम्बेडकर एक युगपुरुष थे | जिन्होंने दलित समाज के कुंठाओं और कुरीतियों के बाहर आकर स्वाभिमान का जीवन जीने की प्रेरणा दी वे जीवन भर दलितों के साथ ही नहीं, वरन देश के पुरे वंचित समाज के साथ खड़े रहे | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री रामशंकर अग्निहोत्री ने एक उपन्यास “नया मसीहा” लिखा जिसकी प्रस्तावना पं. अटल बिहारी बाजपेयी ने लिखी, जो आज भी प्रासंगिक है | प्रस्तावना में लिखा है” डॉ. अम्बेडकर की गणना स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गाँधी, तथा डॉ. हेडगेवार जैसे युग प्रवर्तक राष्ट्र पुरुषों के रूप में की जायेगी | वे एक समाज सुधारक ही नहीं सामाजिक क्रांति के संघर्षशील अग्रदूत थे |” आज उनका पुण्यस्मरण करते समय उनकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति का स्मरण करना आवश्यक है | उन्होंने कहा था” हमने देशभक्ति के आभाव एवं विश्वासघात के कारण अपनी स्वतंत्रता खोयी... हम लोग तय करें कि अपने दलगत अथवा वर्गगत हितों को देश के हितों के ऊपर नहीं करेंगे, नहीं तो हमारी स्वतंत्रता फिर से खतरे में पड़ सकती है | आज हम संकल्प करें कि अपने रक्त की अंतिम बूँद तक देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष करते रहेंगे |”