परंपरागत ‘शिक्षा संस्कृति’ के संरक्षण की आवश्यकता”- चेतन कौशल नूरपुरी

दिंनाक: 28 Feb 2017 18:34:00


यह शाश्वत सत्य है कि हम जैसी संगत करते हैं ,हमारी वैसी भावना होती है l हमारी जैसी भावना उत्पन्न होती है,हमारा वैसा विचार होता है l हमारा जैसा विचार पैदा होता है,हमारा वैसा ही कर्म पैदा होने लगता है और जब हम जैसा काम करते हैं,तब हमें उसका वैसा फल मिलने लगता है l 

गृहस्थ जीवन में गर्भाधान के पश्चात एक माँ के गर्भ में जब शिशु पूर्णतया विकसित हो जाता है तब उसके साथ ही उसके सभी अंग भी सुचारू ढंग से अपना-अपना कार्य करना आरम्भ कर देते हैं l माँ के सो जाने पर शिशु भी सो जाता है और उसके जाग जाने पर वह भी जाग जाता है l इस अवस्था में माँ-बाप के द्वारा उसे जो कुछ सिखाया जाता है शिशु सहजता से सीख जाता है l इसका उदाहरण हमें महाभारत के पात्र वीर अभिमन्यु से मिलता है l


जन्म लेने के पश्चात शिशु सबसे पहले माँ को पहचानता है और उनसे बहुत कुछ सीख लेता है l शिशु के साथ सीखने-सिखाने के इस क्रम में सबसे पहले माँ-बाप की बहुत बड़ी भूमिका रहती है l उसके सामने माँ-बाप जैसा कार्य करते हैं ,वह उन्हें जैसा कार्य करते हुए देखता है,वह उन्हें जैसा बोलते हुए सुनता है ,वह तत्काल उसका अनुसरण भी करने लगता है l हर माँ-बाप चाहते हैं कि उनकी संतान अच्छी हो l वह भविष्य में उन्नति करे l इसी बात का ध्यान रखते हुए उन्हें अपने बच्चो के लिए एक अच्छा वातावरण बनाना होता है l एक अच्छे वातावरण में ही बच्चों को अच्छे संस्कार मिलते हैं ,और वे अपने जीवन में दिन दुगनी –रात चौगनी उन्नति करते हैं l


घर से बच्चों को अच्छे संस्कार मिलने के पश्चात विद्यालय में गुरुजनों की बड़ी भूमिका होती है l विद्यालय में अच्छे संस्कारों का संरक्षण होता है ,होना चाहिए l यह कार्य कभी भारत के परंपरागत गुरुकुल किया करते थे l वहां गुरुजनों के द्वारा ऐसी होनहार प्रतिभाओं को भली प्रकार परखा और तराशा जाता था जो युवा होकर अपने-अपने कार्यक्षेत्र में जी-जान लगा कर कार्य करते थे l परिणाम स्वरुप हमारा भारत विश्व मानचित्र पर अखंड महाभारत बन कर उभरा और सोने की चिड़िया नाम से विख्यात हुआ l उन्नति के पश्चात पतन होना निश्चित है ,देश का पतन हुआ l वर्तमान भारत जिसे हम सब देख रहे हैं ,वह वास्तविक भारत नहीं है जो विश्व मानचित्र पर अखंड भारत दिखता था l विभिन्न षड्यंत्रों के कारण उसके कई महत्वपूर्ण क्षेत्र ,अब उससे कट कर विभिन्न राष्ट्र बन चुके हैं l देश में अब भी अनेकों षड्यंत्र जारी हैं l ऐसी स्तिथि में सरकारों को देशहित में कठोर फैसले लेने होते हैं ,लेने चाहिए और जनता द्वारा उन्हें अपना भरपूर सहयोग देना चाहिए l


भविष्य में सावधान रहने की आवश्यकता है l भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना के पश्चात अंग्रेजों ने भारतीय परंपरागत गुरुकुलों की मान्यता समाप्त कर दी थी और उसके स्थान पर उन्होंने पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली जारी की थी l पाश्चात्य शिक्षा-संस्कृति पर आधारित वर्तमान शिक्षा –संस्कृति पर बुरा प्रभाव पड़ा है ,पड़ रहा है और निरंतर जारी है l भारतीय परंपरागत गुरुकुलों की विशेषता यह थी कि ब्रम्हचर्य जीवन में जब बच्चे पूर्णतया विद्या प्राप्त करके स्नातक बन कर युवाओं के रूप में गुरुकुल छोड़ने के पश्चात समाज में आगमन करते थे l तब वे समाज की दृष्टि में सच्चे ज्ञानवीर,शूरवीर धर्मवीर तथा कर्मवीर ही जाने जाते थे l लोग उनका हार्दिक सम्मान करते थे l परन्तु पराधीनता से मुक्ति पाने के पश्चात भी भारतवर्ष में आज हर युवा अव्यवस्था के दंश से दुखी,अपनी इच्छा का कार्य,कार्यक्षेत्र न मिल पाने के कारण असहाय सा अनुभव कर रहा है l