संस्कारों की प्रथम पाठशाला है परिवार -तुषार कोठारी

दिंनाक: 07 Feb 2017 17:06:25


वर्तमान समय संस्कारों के क्षरण का समय है l समाज अजीब सी उलझन में है l बच्चों का बचपन डोरेमोन और शिनचैन जैसे अश्लील विदेशी कार्टून कार्यक्रमों से प्रेरित हो रहा है l जन्मदिन पर केक काटकर हैप्पी बर्थडे बोलना मानो वैदिक संस्कार बन चुका है l मोबाइल गेम्स और टीवी कार्यक्रमों के चलते बच्चों में पढने की आदत समाप्त सी हो गई है l इन्ही सब बातों का परिणाम यह हो रहा है कि आज के बच्चे अच्छे इंसान बनने की बजाय उलझन भरे मानवों के रूप में तैयार हो रहे हैं l कहने को तो वे प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता हासिल करके आकर्षक पैकेज और सुख-सुविधाएं प्राप्त करने में सक्षम हो रहे हैं ,लेकिन दूसरी ओर जीवन के भावनात्मक पक्ष में पूरी तरह असफल हो रहे हैं l इसका सम्मिलित परिणाम,परिवारों के टूटने ,तलाक के प्रकरणों के बढ़ने ,अवसाद और आत्महत्याओं में वृद्धि के रूप में सामने आ रहा है l जीवन में कतिथ तौर पर सफल ये लोग अपने बूढ़े माता –पिता की चिंता करने को तैयार नहीं हैं l इतना ही नहीं अपने अहं के सामने उन्हें अपने स्वयं के बच्चों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है l पति – पत्नि तलाक लेने के पहले अपने नन्हे बच्चों के जीवन के बारे में सोचने को कतई तैयार नहीं होते l वे यह तक नहीं सोचते कि किसी बचे को सुव्यवास्तिथ विकास के लिए उसे माता और पिता दोनों की आवश्यकता होती है l किसी एक के न होने के दुष्परिणाम बच्चे में बड़े होने के बाद विभिन्न मानसिक समस्याओं के रूप में नज़र आते हैं l

या भयावह स्तिथि,महानगरों और नगरों को अपनी चपेट में ले चुकी है l छोटे शहर और गाँव फिलहाल इससे काम प्राभावित है,लेकिन बड़ी तेज़ी से यह असर छोटे शहरों ,कस्बों और गांवो तक भी पहुचने लगा है l कहते हैं कि किसी बच्चे की प्रथा गुरु उसकी माँ होती है l इसी तरह संस्कारों की प्रथम पाठशाला परिवार होता है l इस भयावह स्तिथि से निपटने का सिर्फ एक ही उपाय शेष बचा है ,और वह है परिवार म संस्कारित वातावरण का निर्माण l लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि परिवार के प्रमुख आधार स्तम्भ अर्ताथ माता पिता स्वयं को भारतीयता के आधार पर ढालें l तभी जाकर वे अपने बच्चों को उन संस्कारों में ढाल सकेंगे ,जिसकी आवश्यकता आज स्वयं उन्हें ,समाज व् देश को है l

हमारी चुनौती तो सीधे वहां से शुरू होती है ,जब एक बछा जन्म लेता है और अपने मुह से पहले शब्द का उछारण कर्ता है सामान्य तौर पर बोलना शुरू करने पर शिशु सबसे पहले अपनी माता को पुकारना सीखता है l जीवन का पहला शब्द ही हमारे शिशु विदेशी भाषा का सीख रहे हैं l यह बीमारी तो छोटे छोटे गांवो तक जा पहुंची है l छोटे से छोटे गाँव में जन्म लेने वाले बालक को भी अपनी माता को माँ की बजाय मम्मी और पिताजी को पापा या डेडी और अंकल-आंटी बोलना सिखाया जा रहा है l जीवन कि शुरुआत ही यदि ऐसी होगी .तो समझा जा सकता है कि भविष्य क्या होगा l

अपनी भाषा के प्रति आग्रह ही हमें अपने संस्कारों के प्रति आग्रही बना सकता है l समाज जीवन में ऐसी सैकड़ों छोटी छोटी बातें हैं ,जिन्हें बदलने का प्रयत्न करते हुए कोई परिवार अपने बच्चों को भारतीय संस्कारों की ओर ले जा सकता है l किस घर में यदि पुत्र अपने पिता को पापा या डेडी कहत है ,तो उसका शिशु भी वही बोलना सीखेगा l इसलिए जरुरत इस बात की है कि पहले माता-पिता स्वयं अपने संस्कारों को याद करें और तब अपने बच्चों को संस्कारित करने की दिशा में आगे बढ़ें l भारतीय मूल्यों और संस्कारों को पुनर्जीवित करके ही हा नित नए खुल रहे वृद्धाश्रमों पर रों लगा सकेंगे और विभिन्न मानसिक समस्याओं के बढ़ने पर भी रोक लग सकेगी l