“राजनीति के बदलते आयाम”-वीरेंद्र सिंह परिहार

दिंनाक: 10 Mar 2017 23:31:59


प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता में सुधार के लिए केन्द्र सरकार योग्य शिक्षक तैयार करने की दिशा में आधारभूत कदम उठाने जा रही है। इसके लिए मेडिकल एवं इंजीनियरिंग की तरह एक राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित कराये जाने पर सैद्धांतिक सहमति बन चुकी है, ताकि योग्य उम्मीदवारों की ही शिक्षक कोर्स में चयन हो सके। मोदी सरकार चाहती है कि अच्छे एवं सुयोग्य उम्मीदवार शिक्षक बनने के लिए सामने आएं। परीक्षा के जरिए इसे प्रतिस्पर्धी और आकर्षक बनाया जाए। केन्द्र सरकार इसके लिए शीघ्र ही राज्यों से भी बात करने वाली है, क्योंकि संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची में है। इसका आशय यह कि शिक्षा केन्द्र और राज्य दोनों के ही क्षेत्राधिकार में है। सूत्रों का कहना है कि शिक्षक कोर्स में एडमिशन के लिए एकल परीक्षा को दो भागों में बांटा जा सकता है- एक ग्रेजुएट स्तर के कोर्स और दूसरे पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के कोर्स। सरकार का ज्यादा फोकस प्राइमरी शिक्षा से जुड़े प्रशिक्षण कोर्स पर है। सच्चाई यह है कि स्वतंत्र भारत में शिक्षा और उसके भी प्राथमिक शिक्षा सबसे उपेक्षित क्षेत्र रहा है। दुनिया के विकसित दोनों की तुलना में हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में सरकारें बहुत कम खर्च करती है। चीनी दार्शनिक कन्सयूशियस ने तो एक राष्ट्र के लिए शिक्षा को रोटी और सुरक्षा जैसा महत्वपूर्ण माना है। उसका तो यहां तक कहना है कि शिक्षा ही वह माध्यम है जिसके चलते हम अपनी आजीविका बेहतर तरीके से चला सकते हैं और राष्ट्र की सुरक्षा कर सकते हैं।

लेकिन बिडम्बना यह कि देश में शिक्षा की पूरी तरह अनदेखी की गई, क्योंकि इसके माध्यम से वोट बैंक बनाने की संभावना नहीं थी। म.प्र. में एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री का तो यह रवैया था कि उन्होंने शिक्षा को उद्योग जैसा बना दिया था। यानी मतदाताओं को उपकृत करने के लिए वह उनके बच्चों को प्राथमिक स्कूलों में सीधे शिक्षक बना देते थे। उच्च शिक्षा में भी उन्होंने खूब तदर्थवाद चलाया। इसका खामियाजा पूरे प्रदेश को किस तरह से भुगतना पड़ा होगा और एक लम्बे समय तक बच्चों को किस तरह की शिक्षा मिली होगी- समझा जा सकता है। इसका एक बड़ा नतीजा यह सामने है कि कोई थोड़ा भी सक्षम व्यक्ति अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने नहीं भेजता।

प्राचीन काल में यदि भारत सम्पन्न देश था तो उसका बड़ा कारण उस समय की शिक्षा पद्धति थी। जिसमें बच्चों को विभिन्न उद्योगों में कुशल बनाया जाता था और उच्च नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती थी, जो समाज में सामंजस्य एवं समरसता बनाकर रखती थी। पर मैकाले की शिक्षा पद्धति ने हमारे सांस्कृतिक मूलाधारों पर प्रहार करते हुए हमें काले अंग्रेज बना दिया और हमें अपनी ही जड़ों से काट दिया। अपेक्षा है कि सरकार प्राथमिक शिक्षा में गुणवत्ता लाने के साथ इस पहलू को भी ध्यान में रखेगी, ताकि बच्चे भारतीय जीवन मूल्यों की ओर उन्मुख हो सके। दुनियॉ के विकसित देशों में शिक्षक का पद जहां निहायत सम्मानित होता है, वहीं भारत में सर्वाधिक उपेक्षित है। इजरायल जैसे देश में तो वैज्ञानिकों के अलावा शिक्षक ही विशेषाधिकार सम्पन्न तबका माना जाता है।

शिक्षा के क्षेत्र में ही नहीं मोदी सरकार की दृष्टि शादी-ब्याहों में होने वाले अनाप-शनाप खर्चों पर भी है। इसीलिए सरकार शादियों में अधिक खर्च को रोकने के लिए नया कानून बनाने की तैयारी कर रही है। जिससे शदियों में खर्च सीमा पर लगाम लग सकती है। यदि शादी में पॉच लाख से ज्यादा खर्च हुए तो जुर्माना भरना पड़ेगा। यही नहीं मेहमानों की संख्या पर भी रोक लगायी जाएगी। कानून में यह भी प्रावधान होगा कि जो लोग शादी-व्याह में पॉच लाख रुपये से ज्यादा खर्च करते हैं, उन्हें गरीब परिवार की लड़कियों के विवाह में इसके दस प्रतिशत राशि का योगदान करना होगा। वस्तुतः शादी-व्याह और दूसरो समारोह में जिस ढंग से फिजूलखर्ची की जाती है, और वैभव का प्रदर्शन किया जाता है उसके चलते समाज में एक अस्वस्थ प्रतियोगिता तो उत्पन्न होती है। साथ ही इसके चलते कम आय वालें लोगों का जीवन दूभर हो जाता है। शादी-व्याह उनके लिए बड़ी समस्या बन जाता है। बड़ी बात यह कि अमूमन ऐसे अवसरों पर अनाप-शनाप जो खर्च किया जाता है, वह कालाधन एवं भ्रष्ट तरीकों से अर्जित किया जानेवाला धन होता है। निस्संदेह यदि ऐसा कानून बना और उसका प्रभावी क्रियान्वयन हुआ तो कालेधन और भ्रष्टाचार को निरुत्साहित करने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।

यद्यपि किसी जमाने में कांग्रेस पार्टी की सरकार ने इस संबंध में कानून बनाया था, पर इच्छाशक्ति के अभाव में उसे लागू नहीं किया जा सकता। उसका हश्र वही राजीव सरकार के दौर में बेनामी सम्पत्ति संबंधी बनाए गए कानून जैसा ही हुआ। जिसे यही कहा जा सकता है कि ‘‘हाथी के दात खाने के और दिखाने के और।’’ हकीकत यह कि लम्बे समय तक सत्ता में रहते हुए कांग्रेस पार्टी ने ऐसी प्रवृत्तियों को रोकने की जगह उसे भरपूर पनपाया।

पर अब मोदी सरकार के दृढ़ निश्चयी ऐसे कदम यह बता रहे हैं कि उसकी राजनीति सत्ता के लिए नहीं, वरन राष्ट्र के लिए है, जैसा कि एकात्म मानववाद के प्रणेता पण्डित दीनदयाल उपाध्याय की सोच थी। वस्तुतः मोदी सरकार की नीतियॉ राजनीति की दृष्टि से कम समाजनीति की दृष्टि से ज्यादा बनायी जा रही हैं, ताकि एक स्वस्थ, सुदृढ़ एवं समर्थ समाज खड़ा हो सके।