समरसता के मोती-राकेश सेन

दिंनाक: 14 Mar 2017 23:40:45


भारत वर्ष में समय समय पर अनेक राष्ट्रपुरुषों ने जन्म लिया है l उन्होंने अपने जीवन काल का सम्पूर्ण समय समाज को सुधारने में लगाया l राजा राममोहन राय से डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर तक सभी राष्ट्र पुरुषों का यही प्रयास रहा है l अधोगति के आखिरी पायदान पर पहुंची हुई सामाजिक स्थिति को सुधारने में अपना सारा जीवन व्यतीत किया l रामानुजाचार्य जी से लेकर गुरु नानक देव जी, गुरु गोविन्द सिंह जी से लेकर रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महात्मा ज्योतिराव फुले , राजर्षि शाहू महाराज, डॉ आम्बेडकर, नारायण गुरु आदि इनका योगदान अपार है l भारतवर्ष में संतों की भी लम्बी परंपरा रही है l सारे संतो ने भी समरसता भाव और व्यवहार हेतु अपार योगदान दिया है l इनके विचार समय समय पर लोगों के सामने लाना यह एक समरसता प्रस्थापित करने हेतु उपयुक्त है l

आज अपने देश में समाज व्यवस्था का दृश्य क्या है ? अभिजन वर्ग, बहुजन वर्ग, वंचित, पिछड़ा वर्ग, घुमंतु समाज, वनवासी, महिला समाज, इन बहुजन वर्ग के अनेक अंगों पर विशेष ध्यान देना जरुरी है l बहुजन समाज की उन्नति उपर्युक्त समता-बंधुता-स्वतंत्रता,समरसता इन तत्वों के आधार पर हो सकती है l स्वामी विवेकानंद जी ने बहुजन समाज कि उन्नति के लिए दो बातों की आवश्यकता प्रतिपादित की है l उनमे से पहली सेवा की और दूसरी शिक्षा की l वे कहते थे कि राष्ट्र में साधारण जनता में बुद्धि का विकास जितना अधिक, उतना राष्ट्र का उत्कर्ष अधिक l अतीत में हिन्दुस्थान विनाश के इतने निकट पहुंचा , इसका कारण यही है कि विद्या तथा बुद्धि के विकास दीर्घ अवधि तक मुट्ठी भर लोगों के साथ में ही रहा l यह मानो अपने अकेले के हक़ कि बात है l

ऐसी जिद्द लेकर इन मुट्ठीभर लोगों ने समूची विद्या को अपनी कोठी में कैद कर रखा l उन्हें इसमें राजाओं का समर्थन भी प्राप्त हुआ और उसी के फलस्वरूप साधारण जनता निरी गंवार रहकर हिन्दुस्थान विनाश के रास्ते पर बढ़ा l इस स्थिति में से अगर हमें फिर से ऊपर उठाना है तो शिक्षा का प्रसार साधारण कांता में करने को छोड़कर दूसरा कोई उपाय नहीं l

भारत के लोगों को शिक्षा कैसे दी जाये ? गरीब लोग अगर शिक्षा के निकट पहुँच न पा रहे हो तो शिक्षा उनके तक पहुंचना चाहिए l दुर्बलों की सेवा यही नारायण की सेवा है l शिव भाव जीव सेवा यह रामकृष्ण परमहंस तथा स्वामी विवेकानंद जी द्वारा दिखाया हुआ मार्ग है l लोक शिक्षण तथा लोकसेवा के लिए अच्छे कार्यकर्ता होना जरुरी है l कार्यकर्ता में सम्पूर्ण निष्पक्षता, पवित्रता, सर्वस्पर्शी बुद्धि तथा सर्व विजयी इच्छा शक्ति इस सभी की आवश्यकता है l इन गुणों के बल पर मुट्ठीभर लोग भी यदि काम करने में जुट गए, तो सारी दुनिया में क्रांति हो जाएगी l समरसता स्थापित करने हेतु सामाजिक न्याय का तत्व भी उतनाही जरूरी है l आज की भाषा में “आरक्षण” यह सामाजिक  न्याय का एक साधन है साध्य नहीं l यह ध्यान रखना जरुरी है l

डॉ आंबेडकर धर्म पर गहरा विश्वास रखने वाले थे l धर्म के कारण ही स्वातंत्र्य, समता, बंधुता और न्याय की प्रतिस्थापना होगी, यह उनकी मान्यता थी l धर्म ही व्यक्ति तथा समाज को नैतिक शिक्षा दे सकता है l धर्म को राजनीतिक हथियार के रूप में उन्होंने कभी इस्तेमाल नहीं किया l बौद्ध धर्म ग्रहण कर उन्होंने –समता बंधुता-न्याय समाज में प्रतिस्थापित करने का एक मार्ग प्रस्तुत किया l इस पृष्ठभूमि पर समरसता यह तत्व आज के जमाने का प्रमुख धर्म है l जाति व्यवस्था किसी समय हिन्दू समाज में सामाजिक व्यवस्था रही होगी परन्तु आज जब हमारे हिन्दू समाज पर बोझ बन चुकी है तो इस बोझ को जितना जल्दी उतार फेंके हमारे लिए उठना ही श्रेयस्कर होगा l इसके लिए जहाँ कथित सवर्णों को अहंकार से म्नुक्त होना होगा वहीँ कथित दलितों को अपने भेदभाव के ऐतिहासिक ज़ख्मों की नुमाइश भी बंद करनी होगी l सभी जानते हैं कि अतीत में क्या हुआ और क्या नहीं l अतीत से आगे बढ़कर हमें भविष्य की ओर देखना होगा और समरस समाज के निर्माण में सभी वर्गों को अपना योगदान देना होगा l