राष्ट्रवाद को समझने से पहले राष्ट्र को समझें-डॉ गुलरेज शेख

दिंनाक: 22 Mar 2017 22:23:32

भोपाल में पाञ्चजन्य पाठक सम्मेलन का हुआ आयोजन, लेखक गुलरेज शेख ने राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर दिया व्याख्यान


विसंकें(भोपाल) l यह हमारा सौभाग्य है कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता के विषय पर हम चर्चा कर पा रहें हैं l राष्ट्रवादी पत्रकारिता की जो आवश्यकता है,उसको प्रत्येक  राष्ट्रवादी व्यक्ति महसूस कर रहा है l पत्रकारिता का जो स्तर आज गिरता जा रहा है और निम्न से भी नीचे होता जा रहा है वो हम सभी को दिखता है l यह विचार लेखक,स्तंभकार और शिक्षाविद डॉ गुलरेज़ शेख ने पाञ्चजन्य पाठक  सम्मलेन  में व्यक्त किये l सम्मलेन का आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचार  विभाग द्वारा  बीते  रविवार को विश्व संवाद केंद्र भोपाल में किया गया l इस अवसर पर कई स्वयंसेवक उपस्तिथ रहे l

सभी उपस्थित पाठकों एवं गणमान्य जनों को संबोधित करते हुए डॉ गुलरेज़ शेख ने कहा कि राष्ट्रवादी पत्रकारिता के विषय में बात करने से पहले कई अन्य विषयों में बात करना जरूरी है l राष्ट्रवाद…..राष्ट्र से बना है राष्ट्रवाद तो बिना राष्ट्र के राष्टवाद नहीं हो सकता l यदि राष्ट्र को समझना है तो सर्वप्रथम अगर कुछ समझने की आवश्यकता है तो वो ये कि राष्ट्र क्या है ? क्या हम एक देश हैं ? कि हम एक राष्ट्र हैं ? और इस सभागार में बैठे सभी लोगों का यह जानना धर्म बनता है कि जो हम राष्ट्र की बात करते हैं l वो राष्ट्र क्या होता है या क्या होतें हैं ? क्या यह ज़मीन का टुकड़ा होता है ?

पंडित दीनदयाल जी ने एक बात कही थी कि यदि भारत माता में से माता शब्द हटा लिया जाए तो भारत केवल एक भूखंड मात्र बचेगा l अरे यदि हम राष्ट्रों की गणना करने बैठे कि विश्व में राष्ट्र कितने हैं तो हम उँगलियों में गिन लेंगे और जब देशों की बात करने बैठे तो आप पीछे मुड़कर देखेंगे कि लगभग लगभग हर दशक में एक नया देश बना है l  और सबसे नवीनतम देश बना है वो है दक्षिणी सूडान l हम देखते हैं कि देशों की संख्या बढती जाती है और वो स्वयं को भी नेशन बोलते हैं नेशन स्टेट बोलते हैं l और दुःख होता है जब अधिकांश लोग संसार में और भारतवर्ष में भी यह नहीं जानते कि राष्ट्र क्या होता है ? और नेशन स्टेट क्या होता है ? देशों और राष्ट्रों में क्या अंतर होता है ?

राष्ट्र एक काल्पनिक चीज़ नहीं है या कोई एक ऐसी वस्तु नहीं है कि कुछ रेखाएं खीच दी जाएँ और राष्ट्र का निर्माण हो जाये l हाँ देश बनते हैं नक़्शे में रेखाएं खीचकर l यहाँ तक कि इतनी अप्राकृतिक रेखाएं खींची गई हैं कि अफ्रीका के कुछ देशों के ऐसे नक़्शे हैं जैसे वर्ग की आकृति बना दी गई हो l स्केल से लाइन खीच दी और देश बन गया l परन्तु एक भी देश आपको ऐसे नहीं मिलेगा जहाँ सीधी लाइन खीचकर राष्ट्र का निर्माण हो जाये l जो राष्ट्र् होता है वो स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है l देश बनाये जाते हैं लेकिन राष्ट्रों का जन्म होता है l राष्ट्र के निर्माण में उसके कारक तत्व बहुत महत्वपूर्ण होते हैं l भू-भाग,निवासरत लोग,नस्ल और उनकी संस्कृति,यदि आप इन चारों कारक तत्वों का मेल करले,जोड़ करले तो राष्ट्र का निर्माण होता है l 

भारत की आत्मा भारत की संस्कृति में है l राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर आगे बढ़ने से पहले यह जरूरी था कि हम राष्ट्र और देशों का अंतर समझ जाएँ l जहाँ जहाँ देश बने हैं सब कृत्रिम हैं और वहां हमेशा समस्या लगी रहती है l ये देश राष्ट्र से अलग हो चुके हैं l जहाँ जहाँ पन्थो के आधार पर देश बने वो फैल हो गए क्यूंकि ये प्रकृति के विरुद्ध थे l

भारत में सभ्यताओं का जन्म हुआ l आप सभी करोडपति लोग हैं क्यूंकि अगर आप टीवी पर कोई बाइट देते हैं हैं या अखबार में कुछ लिखते हैं तो उसे लाखों करोड़ों लोग देखेंगे,पढेंगे तो हुए न आप करोडपति l यदि राष्ट्र निर्माण में आप लोग सहयोग नहीं करेंगे तो कौन करेगा l पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की जीवन गाथा को लिखने में मुझे लगभग 1 वर्ष लगा और जब मैं लिख रहा था तो मैं उनके जीवन से बहुत प्रभावित हुआ और उनके प्रति प्रेम भाव जाग्रत हो गया l जब मैं रात में सोता था तो मुझे लगता था कि दीनदयाल जी मेरे आसपास हैं l ये उनका विचार था और विचार हमेशा जीवित रहता है l

भारत में जो पत्रकारिता हुई है उसके चार चरण हैं l पहला चरण स्वतंत्रता के पूर्व का है आप देखेंगे जो भी बड़े बड़े स्वतंत्रता के नायक रहें हैं वो सब पत्रकारिता करते थे परन्तु वो पत्रकारिता किसकी थी .... वो पत्रकारिता राष्ट्रहित की पत्रकारिता थी ये पहला चरण था l स्वतंत्रता उपरान्त दूसरा चरण आया जब नेहरु जी की सरकार थी और ये सरकार बनी थी 1947 में और उसी समय हमारे राष्ट्र में POWER OF TRASFER हुआ और 1948 में कुछ घोटाले हुए और उस समय के कुछ पत्रकार थे,समाचार पत्र थे  जिनका काम था सरकार की गलतियों को दबाना l इसके उपरान्त विभिन्न ऐसे आयाम हुए l नेहरु जी ने पाकिस्तान से एक एग्रीमेंट कर भारत की कुछ भूमि पाकिस्तान को दे दी और किसी जनमानस को यह पता भी नहीं चला l जब पाकिस्तान की असेंबली में इसकी घोषणा हुई तब रेडियो के माध्यम से भारत की जनता को पता चला कि नेहरु जी ने जगह दे दी l उसी समय के जो बड़े बड़े समाचार पत्र थे किसी ने इस खबर को नहीं लिखा किन्तु पाञ्चजन्य ने लिखा था,ऑर्गनाइज़र ने लिखा था और खूब लिखा था l

पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइज़र धारा के साथ राष्ट्रहित के विषयों पर सारी ख़बरें लिखता था l एक बार जब हमारे स्वतंत्रता संग्रामियों पर गोली चली तब किसी ने नहीं लिखा सिवाय पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइज़र के l तीसरा चरण आया इंदिरा जी के समय जब आपातकाल लगाया गया था और प्रेस की अभिव्यक्ति की,लिखने की स्वतंत्रता को पूर्णतः दबा दिया गया था l एडिटर के सामने अधिकारी बैठता था और जांच करता था कि सरकार के हित में कौन सा समाचार है l जो नकारात्मक होता था उसे हटा दिया जाता था l अगर किसी ने प्रकाशित किया तो उनके कार्यालयों की बिजली काट दी जाती थी और ये हमारे साथ भी हुआ, पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइज़र के कार्यालयों की बिजली भी कटी,हमारे  लोग  जेल भी गए लेकिन हमने हमेशा सच और राष्ट्रहित पर ही लिखा l जब आपातकाल समाप्त हुआ तब पत्रकारिता का नया आयाम आ चुका था और वो था सरकार से बदला लेना l उस समय एक कार्य अच्छा हुआ सरकार की तानाशाही ताश के पत्तों के घर जैसी बिखर गई l और चौथा चरण आया टीवी क्रान्ति के बाद 90 के दशक में जब समाचार पत्रों एवं संस्थाओं का व्यवसायीकरण हुआ l और विज्ञापनों की दौड़ चालू हो गई l

अभी हाल ही में जो DU में हुआ एक लड़की ने ट्वीट क्या कर दिया 8-8 दिन तक प्राइम टाइम न्यूज़ चल रही है उसकी, किन्तु देश के लिए, समाज के लिए उसकी क्या योग्यता थी l ऐसे ही प्रेस में हमारा वो वास्तविक  कन्हैया नहीं आएगा जिसने सिद्धांतों की रक्षा के लिए महाभारत में संघर्ष किया बल्कि वो लाल कन्हैया आएगा ये नकारात्मकता है प्रेस की l

और यदि आप आज भी पाञ्चजन्य को उठा कर देखें l सरकारे आती रही और जाती रही,एडिटर बदलते रहे किन्तु राष्ट्रहित के लिए हमेशा पाञ्चजन्य और ऑर्गनाइज़र ने लिखा और धार वही रही धारा वही रही l आप पाञ्चजन्य को उठा कर देखें वो विचार वाली होती है राजनीति वाली नहीं l भारत चलता है विचार से इसीलिए मेरा आपसे निवेदन है है कि जो भी लिखे तो उसमे भारत को सर्वोपरि मान कर लिखें l पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने भी कहा था कि हम विचार से समझौता नहीं करेंगे l भारत विचार है और भारत की संस्कृति आज भी प्रभावशाली है l    

 पाञ्चजन्य का उद्देश्य देश और समाज हित के समाचार जन-जन तक पहुंचाकर उनकों जागृत करना रहा है। जिसमें राष्ट्रीयता के भाव जगाने वाले लेख, जीवनी, बोध कथा, समसामयिक विषयों पर लेख, भारतीय परम्परा इतिहास की जानकारी एवं प्रबुद्धजनों के विचार प्रकाशित होते है। राष्ट्रीय चेतना के जिस भाव भूमि में पाञ्चजन्य का जन्म हुआ, स्वाधीन भारत की भौगोलिक अखण्डता, सुरक्षा, उसकी सामाजिक समरसता एवं राष्ट्रीय एकता को पुष्ट करते हुये उसे ससम्मान श्रेष्ठ सांस्कृतिक जीवन मूल्यों के आधार पर युगानुकूल सर्वांगीण पुर्नः रचना के पथ पर आगे ले जाने के जिस संकल्प को लेकर पाञ्चजन्य ने अपनी जीवन यात्रा आरम्भ की थी वो आज भी उसी कर्त्तव्य पथ पर डटा हुआ है।

वक्ता परिचय :

डॉ. गुलरेज़ शेख़ नियमित रूप से "पांचजन्य", "पंजाब केसरी" आदि में लिखते रहते हैं। "पं दीनदयाल उपाध्याय जी" के जीवन पर केन्द्रित पुस्तक "राजनीति के संत" के वे लेखक हैं। अभी हाल ही में डॉ शेख, ज़ी टीवी के लोकप्रिय कार्यक्रम "फतह का फतवा" मे भी प्रगतिशील विचारक के रूप मे शामिल हुये थे।