“सामाजिक और व्यावहारिक है भारतीय नववर्ष”-रश्मि मुकेश व्यास

दिंनाक: 29 Mar 2017 17:24:16


हिन्दुस्तान की असली धरोहर है, हिन्दू संस्कृति । हमारी संस्कृति हमें अपने-अपने तरीके से खुशियां मनाने के अवसर प्रदान करती है। हिन्दू धर्म से जुड़े देवी-देवता एवं संत-महात्मा हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं। इनके जन्म दिवस, अवतरण दिवस और विवाह दिवस को धूमधाम से त्यौहार के रूप में मनाये जाने की सनातन पंरपरा है। उत्सवधर्मी संस्कृति के पास उसका अपना नववर्ष है, जो चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को आता है। ऐसी मान्यता है कि लगभग दो अरब साल पूर्व इसी तिथि को ब्रह्मा जी ने सृष्टी की रचना की थी । इसी कारण हमारी संस्कृति में भारतीय पंचांग के अनुसार नववर्ष का प्रथम दिन गुड़ी पड़वा को माना जाता है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र के साथ ही पूरे भारत में यह पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

सामाजिक समरसता और ऐतिहासिक दृष्टीकोण से लोकप्रिय महाराष्ट्र राज्य की संस्कृति में इस दिन द्वार पर सुंदर साड़ी से देवी का प्रतीक गुड़ी सजा कर और मनभावन रंगों से सुंदर रंगोली बनाकर पूजा की जाती है। इस दिन प्रातः काल जागकर सूर्य को नमन करते हुए जल अर्पित कर तेज और शक्ति का आह्वान किया जाता है, इसके साथ ही भगवान को नीम और गुड़ या मिश्री का भाग लगाकर प्रसाद ग्रहण किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन नीम का सेवन करने से पूरे वर्ष निरोगी रहा जा सकता है। इस कारण सामाजिक स्थानों पर निःशुल्क नीम का रस भी वितरित किया जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि इस दिन श्रीखंड के सेवन से गर्मी के मौसम में भी शीतलता बनी रहती है और गर्मी के रोग से भी बचा जा सकता है। चने की दाल और गुड़ से बने व्यंजन पुरनपोरी का भोग लगाकर प्रसाद लेने की भी परंपरा है। इसके पीछे मान्यता है कि इस दिन मीठे का सेवन करने से आपस में सद्भाव एवं प्रेम बढ़ता है। ऐसा करने से पूरे साल संबंधों में मिठास बनी रहती है।

हमारी संस्कृति में इस दिन बुजुर्गों के प्रति सम्मान व्यक्त करने की भी परंपरा है। इस दिन पीले रंग के परिधानों में सजी महिलाएं इष्ट देव का पूजन कर बुजुर्गों को प्रणाम कर आशीर्वाद लेती हैं। विभिन्न समाजों से जुड़े लोग इस दिन सामूहिक भोजन के आयोजन द्वारा आपस में नववर्ष की शुभकामनाएं देते हैं। बदलते दौर में एक बार फिर समाज अपनी परंपराओं की और लौट रहा है  ।  हिन्दू नववर्ष पर सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजन की भी परंपरा है। इन आयोजनों में प्रतिभावान बच्चों को विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन और समाज जन को उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित भी किया जाता है। साथ ही प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए महिलाओं और बच्चों के लिए विभिन्न प्रतियोगिता भी इस दिन आयोजित की जाती हैं। हमारी संस्कृति में इस दिन को बहुत ही पवित्र माना जाता है क्योंकि ऐसे कई ऐतिहासिक कारण है जो इस दिन को अलग पहचान देते हैं। इस दिन को गुर्जरगौड़ ब्राह्मण समाज के जनक महर्षि गौतम ऋषि के जन्मोत्सव दिवस ‘गौतम जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है। मां दुर्गा के नौ स्वरूप की पूजा आराधना का शुभ पर्व नवरात्रि भी इसी दिन से प्रारंभ होता है। इस मौके पर रंग बिरंगी वेष-भूषा में सजकर कन्या और युवतियां पूजा और गरबा नृत्य के माध्यम से मां दुर्गा को प्रसन्न करती हैं। भगवान राम के जन्मदिवस रामनवमी पर यह उत्सव समापन की ओर बढ़ता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान रामचन्द्र का राज्याभिषेक और महाराज युधिष्ठिर का राजतिलक भी इसी दिन हुआ था। इसके साथ ही महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रम संवत का प्रारंभ भी इसी दिन माना जाता है। देव भगवान झूलेलाल का जन्मदिवस भी इसी दिन चैती चांद के रूप में मनाये जाने की परंपरा है। भारतीय समाज को समरसता एवं राष्ट्रीयता का संदेश देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार का जन्मदिवस भी इसी दिन है।

केवल धार्मिक मान्यता ही नहीं, बल्कि इस दिन का महत्व प्राकृतिक कारणों से भी माना गया है। ऐसा माना जाता है, कि मौसम में बदलाव का आरंभ भी इसी दौरान होता है। इसी दिन से प्रकृति अपने पुराने आवरण को बदलती है अर्थात नये फूल और पत्ते आते हैं। इसके साथ ही किसानों के घर में फसल पककर इसी समय आती है, अन्न-धन आता है अर्थात देश की रीढ़ किसान भी सही मायने में नया साल इसी दिन मनाता है। इस तरह गुड़ी पड़वा के महत्व को भारतीयता के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना आज समाज की पहली आवश्यकता है। आपस में जोड़ने और सामाजिक समरसता का उदाहरण बनने वाला यह नववर्ष मनाकर हम पुनः अखंड भारत की कल्पना को साकार कर सकते हैं।