शक्ति की साधना में रत ‘भारत’- लोकेन्द्र पाराशर

दिंनाक: 29 Mar 2017 17:10:49


सर्वविदित है कि नवरात्रि पर्व शक्ति साधना का पर्व हैं। हम भारतीय यह आदि काल से करते भी आये हैं, कर ही रहे हैं, करते भी रहेंगे। परन्तु साधना के केन्द्र में व्यष्टि भाव होने के कारण साधक की चेतना समष्टि स्वरूप में कम ही दिखाई दी। कारण बहुत स्पष्ट है कि हम व्यक्तिगत असुरक्षा की भावना के कारण स्वयं के लिए शक्ति संचय की जुगाड़ से ही बाहर नहीं आ पाये। परिणामतः हमारे व्यापक समाज अर्थात भारत की साख सभी स्तरों पर गिरती रही और शून्य से शिखर तक हम एक-दूसरे को कोसते रहे।

हमने स्वामी विवेकानंद के सपनों के भारत को भी खूब रटा, परन्तु वैसे ही रटा जैसे तोते ने रटा कि ‘शिकारी आता है, जाल फैलाता है........’। लेकिन शिकारी के जाल में फंसने से स्वयं को बचा नहीं पाये। स्वतंत्र भारत के बीते वर्षों की यदि बात करें तो लालबहादुर शास्त्री के अलावा ऐसी परिशुद्धता किसके भीतर दिखाई दी जो यह कह सके कि हम एक दिन का व्रत करके देश का अन्न बचायेंगे, किसी दंभी देश के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे।

सृष्टि के करवट लेने का समय काल संभवतः निश्चित है। कई विद्वान भविष्यवक्ता कहते भी रहे हैं कि 2011 से भारत में परिवर्तन के लक्षण दिखाई देंगे और आने वाली सदी पुनः भारत की सदी होगी। ठीक वैसी ही जब भारत ज्ञान, विज्ञान, स्वाभिमान, स्वदेशी और समरसता को समेटे हुए आध्यात्मिकता के सर्वोच्च सिंहासन पर आरूढ़ था।

मैं यह नहीं कहता कि बस चुटकी बजने ही वाली और सारा भारत अचानक जगमग हो उठेगा। यह तो तभी हो सकेगा जब जन-जन जगेगा। हां! इतना दृश्य स्पष्ट है कि भारत में शिखर से स्वाभिमान पर संवाद शुरू हो चुका है। जो लोग भारतीय तत्व को तिरोहित करने में ही विश्वास रखते हैं, जो प्रगतिशील (?) कुण्ठा से बाहर ही नहीं आना चाहते, उनकी परवाह किये बिना आज हम देख रहे हैं कि मौसम का मिजाज जोरों से बदला है। जो अमेरिका श्री नरेन्द्र मोदी को वीजा देने को भी तैयार नहीं था, वही अमेरिका उसी मोदी की शक्ति साधना देखकर हक्का-बक्का है। पहली अमेरिका यात्रा पर नवरात्र में मोदी सिर्फ नींबू पानी पीते रहे और ओबामा हैरत से देखते रहे। यह श्री नरेन्द्र मोदी की आत्मशुद्धि की ताकत है कि ओबामा से लेकर ट्रम्प तक का अमेरिका मोदी-मोदी रट रहा है। मोदी की रटन यानि व्यक्ति की नहीं उस शक्ति की रटन जिसका संपूर्ण लक्ष्य ही भारत का खोया वैभव लौटाना है। भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार किसी बराक को ‘बराक’ कहा, तो विश्व ने सुना और सैकड़ों देशों ने ‘बराबरी’ के इस पैगाम को समझा।

ऐसा भी नहीं है कि भारत में स्वतंत्रता के पश्चात कुछ काम हुआ ही नहीं। हुआ, परन्तु होता रहा बिना दिशा और आत्मविश्वास के। बिना निर्धारित लक्ष्य के, वोट के लालच से, भ्रष्टाचार के दखल से, यह जितना और जैसा होना चाहिए था वैसा नहीं हो सका। काम से बड़ा विषय काम के संदेश का है। हमनें जो भी किया उसमें । A से Z तक भ्रष्टाचार की फेहरिस्त बनती गई तो स्वाभाविक है दुनियां ने हमें हिकारत से देखा और निरंतर हमें निगल जाने की हिमाकत की। लेकिन क्या यह सच नहीं है कि देश का निजाम बदलने के बाद अवाम भी बदलने लगा है। मैं चुनाव परिणामों की बात नहीं करना चाहता, मैं तो उस चर्चा से कुछ चुराना चाहता हूं जो दफ्तरों में,ड्राइंग रूम में और चौपालों पर हो रही हैं। देश का दृश्य बहुत स्पष्ट है कि लोग आत्मविश्वासी हो रहे है, सुरक्षित समझ रहे हैं और स्वावलंबन के साथ स्वदेशी की ओर बढ़ना चाहते है। यानि भारत का ‘आत्मतत्व’ लौट रहा है।

सीरिया में जब आईएसआईएस के घेरे में भारतीय फंस जाते हैं तो हम याचना नहीं करते। हम अरिहंत को रवाना करते हैं। अरिहंत ठीक से समंदर का सीना चीर भी नहीं पाता, उससे पहले ही उसकी गर्जना से घबराएं आतंकी भारतीयों को मुक्त कर देते है। यह मोदी सरकार का पहला ट्रेलर था। पूर्वांचल तो जैसे देश से ही काट दिया गया था, लेकिन जब म्यामांर में मार दिया तो पूर्वांचल में भी विश्वास जाग उठा। आज वहां सड़क, रेल और पुलों की बाढ़ आ गई है। हमें परवाह नहीं है कि चीन इस विकास को देखकर कितना बौखलाया हुआ है। हम उसकी छाती पर सुपर हरक्यूलस उतारकर और ब्रम्होस की अपनी तैनाती का स्थान निर्धारित कर जबाव दे चुके हैं। दीपावली पर उसके पटाखे फुस्स कर उसे छटी का दूध याद दिला चुके हैं। रही बात पाकिस्तान की तो उसके पास सर्जिकल स्ट्राईक छुपाने के अलावा अपनी इज्जत बचाने का कोई तरीका बचा नहीं है।

स्वामी विवेकानंद का सपना था सशक्त भारत, समृद्ध भारत और समरस भारत। गौर से देखें तो तीनों मोर्चों पर तेजी से और शुद्धि से हमारे कदम आगे बढ़ रहे हैं। सशक्त भारत के लिए तो इतना ही काफी है कि कोई मोदी की ‘दृष्टि के कोण’ और सीमाओं पर हुए शुभारंभ को ही समझ ले। पहली बार हम हथियार बेचने वाले राष्ट्र बने हैं, यह हमारे हौंसलों में कुलांचे भरने के लिए पर्याप्त है।

समृद्ध भारत की बात करें तो आर्थिक कचरे की सफाई के महाअभियान के साथ ‘मेक इन इंडिया’ का प्रभाव साफ देखा जा सकता है। भ्रष्टाचार पर कसावट और सक्षम लोगों से सब्सिडी छोड़ने की अपील का असर देखिये कि हर गरीब के घर में ‘उज्जवला’ आ रही है। आज यदि हर भारतीय को घर देने की घोषणा हुई है तो क्या यह आर्थिक समृद्धि के बिना संभव था? अभी शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर भी कुछ बड़े कदमों की उम्मीद की जा सकती है। यही तो सच्चा लोकतंत्र है। जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए। मुझे याद आता है कि श्री टी.एन.शेषन ने कानून नहीं बदला था, उसका पालन करना सिखाया था। आज तक चुनाव, चुनाव की तरह हो रहे हैं। मोदी भी भारत को बदल नहीं रहे है, वे सिर्फ उसके सुप्तावस्था में पड़े आत्मविश्वास को जाग्रत करने की साधना कर रहे है। समाज में 60-70 वर्षों में भी वोट के खोट के कारण जातिवाद को बढ़ाया ही गया। भारत के मूल चिंतन में जहां जातिवाद का कोई उल्लेख ही नहीं है, उसे ‘वोट के भेडि़यों’ ने ‘राई का पहाड़’ अर्थात ‘प्रथा’ को‘वाद’ बना दिया। लेकिन नई सरकार ने परालोचना से परे अपनी समग्र चेतना पर ही बल दिया। परिणाम साक्षी है कि चुनावों में भी जातियों की दीवारें भरभराकर गिरी हैं। वरना मोदी जी के नाम पर हुए चुनाव में पता नहीं उनकी जाति के कितने वोटों से कैसी सरकार बनती? समग्र स्वच्छता अभियान में छुआछूत के विरूद्ध खड़े होने की पवित्र पहल भारत के लिए समरसता का सबसे सुखद संदेश है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत होगी, जब दिल्ली से चल रही समरसता की बयार गांव खेड़े तक पहुंचकर हर दीवार को हटाने की प्रेरणा देगी और सहकार की सुगंध से समग्र समाज महक उठेगा।

नवरात्र तो निमित मात्र है, हमें इस शक्ति साधना की प्रतिदिन प्रतिपल आवश्यकता है, जो सशक्त, समृद्ध और समरस भारत का निर्माण करे।