देव या दानव

दिंनाक: 01 Apr 2017 19:57:41


आचार्य विनोबा भावे के बचपन का प्रसंग है  उनके घर के आँगन में पपीते का वृक्ष था l वे उसको प्रतिदिन पानी से सींचते थे l जब उनमे कच्चे फल आने शुरू हुए उनका बालमन उन्हें खाने को हुआ l माँ ने कहा “ बेटे अभी नहीं ! कच्चे फल नहीं खाए जाते l” लम्बी प्रतीक्षा के बाद फल पके l उन्हें तोडा गया, अच्छी तरीके से काटे हुए पपीते की फांकों को संवार कर थाल में सजाया गया l विनोबा के मन में अपनी मेहनत के फल चखने की अत्याधिक उत्सुकता थी l

विनोबा जब पपीता खाने लगे तो माँ ने कहा विनिया ! तुम देव बनना चाहते हो यह दानव ? जो दूसरों को खिलाकर या देकर खाता है, वह देव और जो खुद के लिए रखता है वह दानव है, बताओ तुम्हे क्या बनना है ?” विनोबा तुरंत बोल उठे “माँ मुझे देव बनना है l”

माँ ने आज्ञा दी “जाओ विनोबा इन पपीतों कि फांकों को पहले पड़ोसियों को बांटों l घर में लगे हुए पहले फल का अधिकार पडोसी का होता है l” विनोबा ने माँ की आज्ञा शिरोधार्य कर अपने पड़ोसियों को पपीते की एक-एक फांक बाँट दी, और पडोसी प्रेम से उनकी पीठ थपथपाते गए और कहा कि वाह विनोबा ! कितना मीठा पपीता लाये हो यह तुम्हारी मेहनत का फल है l”बची हुई पपीते की फांके लेकर विनोबा अपने भाइयों को बांटकर खुद भी खाने लगे l

माँ ने विनोबा से पूछा “विनिया ! इस पपीते में कितनी मिठास है ?” विनोबा ने कहा अम्मा ! पड़ोसियों की प्रेम की थपकी में जो मिठास थी वो इस पपीते में कहाँ है ? “विनोबा में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ याने कि सारा विश्व ही अपना परिवार है, की भावना का अंकुरण करने का श्रेय उनकी माँ को ही था l अपने जीवन में इस भावना का उन्होंने जन-जन में प्रसार किया l