कौन विष घोल रहा है? - डॉ किशन कछवाहा

दिंनाक: 26 Apr 2017 23:29:01

रामजस कॉलेज में अंग्रेजी विभाग की ओर से ‘‘कल्चर ऑफ प्रोटेस्ट‘‘ नाम से दो दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया था । इसमें कुल 18 वक्ताओं के नाम थे जिनमें उमर खालिद और जेएनयू की छात्रा शहला रशीद का भी नाम था । कॉलेज के छात्रों ने प्राधानाचार्य राजेन्द्र प्रसाद (जो 28 फरवरी को 32 साल की सेवा के बाद सेवानिवृत हो गए) से इन दोनों वक्ताओं के परिसर में आने पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद सेमिनार रद्द कर दिया गया । इसके बाद वामपंथी छात्रों और शिक्षकों ने इसे बोलने की स्वतंत्रता से जोड़कर परिसर में हिंसा शरू कर दी ।

दिल्ली विश्वविद्यालय से संबंद्ध रामजस कालेज विवाद थमने के बजाए तूल पकड़ता जा रहा है । रोज बयानों के बुल बुले उठ रहे है । प्रतिक्रियाओं की बौछारें हो रही है और सोशल मीडिया पर आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है । इसमें राजनेता भी पीछे नही है । बहरहाल पूरे मामले में कुछ सच ऐसे थे जो दब गए । वामपंथी छात्र संगठनों और सेकुलर मीडिया को गुरमेहर की पीड़ा तो दिखी, लेकिन रामजस कॉलेज के बाहर जिन बेटियों के कपड़े फाड़े गए जिनसे हाथापाई की गई, बाल पकड़ कर घसीटा गया और गंभीर चोटें आई, इस पर न तो चर्चा हुई और न प्राइम टाइम पर इनके दर्द को दिखाया गया ।

वामपंथी समर्थकों के हमले मे घायल दौलतराम कॉलेज की छात्रा दीक्षा वर्मा ने बताया ‘‘ 21 फरवरी की घटना के बाद वामपंथियों ने अभाविप के खिलाफ मोर्चा निकाला । इसमें जेएनयू , जामिया, आईपी और डीयू के छात्र व अध्यापक भी शामिल थे । वे देश विरोधी और कशमीर की आजादी के नारे लगा रहे थे । हमने विरोध किया तो वे हम पर टूट पड़े । मेरे कपड़े फाड़ दिए और हमला किया, जिससे मेरी आंखो पर चोट आई । इसके अलावा दो लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ की गई । पूरे मामले मे मीडिया का रूख एक तरफा रहा । उसे सिर्फ उसका दर्द दिखा जिसे सोशल मीडिया पर धमकी मिली । ‘‘एक अन्य छात्रा कंचन पारिख ने कहा, ‘‘गुरमेहर के नाम पर जो लोग हाय तौबा मचा रहे है, उन्हें हमारे कॉलेज की छात्राओं के साथ हुए दुर्व्यवहार दिखाई नही देता ये लोग एक ही पीड़ा को भुना रहे है और दूसरी बेटियों की पीड़ा को अनसुना कर रहे है ।

यह खेल कुछ और नही है । यहां देश में समाज में युवाओं के बीच टकराव व भेदभाव पैदा करने के लिए अभिव्यक्ति का मामला उछाला जा रहा है । ये तो विश्वविद्यालय का मामला है । उधर केरल का पूरा राज्य है? खून खराबा खुले आम किया जा रहा है । कहॉ की अभिव्यक्ति कहा है न्याय ? सिर को गर्दन से अलग किया जा रहा है- आखिर आवाज निकलेगी कैसे केरल में निर्दोषों का खून बहाया जा रहा है । वहां अभिव्यक्ति के लिए चुप्पी क्यों साध रखी गयी है । अनुशासन बना रहे, शिक्षण संस्थायें प्रतिभाओं की पौध शाला बनें- इसकी चिन्ता किये जाने की जरूरत है ।