भारत में नक्सलवाद : विचारधारा से विवेकशून्यता तक-शुभ्रता मिश्रा

दिंनाक: 29 Apr 2017 09:55:20

सुकमा में हाल ही में हुए एक और नक्सली हमले और भारत के जवानों की शहादत की मार्मिक वेदना एक बार फिर सदियों पहले के उस भारत में ले जाती है, जब कभी ब्रिटिश सरकार के अधीन वाले परतंत्र भारत में जंगलों के प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार के लिए एक आदिवासी योद्धा तिलका मांझी द्वारा अँग्रेज सरकार को राजस्व देने की मनाही और फिर 13 जनवरी, 1784 को तत्कालीन जिला कलेक्टर ऑगस्ट क्लीवलैंड की हत्या के जुर्म में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा मांझी को सरेआम बरगद के पेड़ पर दी गई फांसी ने कहीं आदिवासियों के हक की लड़ाई के बीज उनके मन-मस्तिष्क में बो दिए थे। तब से आज तक सियासतें, रियासतें और आंदोलनकारी बदलते गए, परन्तु आदिवासियों के मूल अधिकारों के संघर्षों की गाथा अभी भी अपने उपसंहार को लिखे जाने की आशा में नक्सलवाद की विरुपित परिभाषाओं को समझने की कोशिशों में लगी हुई है।


अँग्रेज चले गए, परन्तु आदिवासियों को जंगली, अनपढ़ और असभ्य समझने की हमारी प्रवृत्तियों ने समतामूलक सभ्यता की अवधारणा को व्यावहारिक स्वरुप प्रदान करने के लिए नक्सलवाद जैसी विचारधारा को जन्म दे दिया। इस तरह देखें तो आज का कहर बरपाने वाला विवेकशून्य नक्सलवाद कभी आदिवासियों को उनकी भाषा, संस्कृति, परंपरा, पहचान, अस्मिता और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की पैरवी करने वाली एक सशस्त्र विचारधारा हुआ करता था। स्वतंत्रता के पश्चात् भारतीय संविधान में विशेषरुप से समस्त आदिवासियों को संवैधानिक, कानूनी और पारंपरिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। लेकिन जब अधिकारों से वंचित होने की अनुभूति होने लगती है, तो अपने हक के लिए शोले भड़कना स्वाभाविक है। ऐसी ही चिनगारी 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में सुलग गई जिसने शोलों का रुप धारण कर भारत में पहली नक्सली हिंसा की शुरुआत की।

भारत में झारखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, बिहार, छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाओं के साथ साथ बिना बिजली और शौचालयों वाले क्षेत्रों को शनैः शनैः नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की संज्ञा दी जाने लगी और इन सुविधाओं के लिए आवाज उठाने वाले लोग नक्सली कहे जाने लगे। जमींदारों और खेतिहरों के बीच फसल के बंटवारे से लेकर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन तक के अधिकारों के लिए लड़ने वाले नक्सलवादी असल में चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ त्से तुंग की विचारधारा से प्रेरित माने जाते हैं। वास्तव में 1950 से 1960 के बीच चीन में जो माओवाद उत्पन्न हुआ, वो चीनी राजनेता माओ जेदांग के पदचिन्हों पर चलने वाले लोगों से संबंधित था। इन माओवादियों का उद्देश्य शस्त्रों के बल पर मानव समाज का सामाजिक व आर्थिक उत्थान करना था और वे पिछड़े लोगों को समान अधिकार दिलाने के पक्षधर थे। विचारधारा के आधार पर यह बिल्कुल भी गलत नहीं दिखता। भारत के नक्सलवादी जब माओवादी बनकर आदिवासियों के हक की बात करते हैं, तो कहीं से गलत नहीं लगते, परन्तु जब उद्देश्यों से भटककर विवेकशून्य हिंसा होने लगती है, तब नक्सलवाद आतंकवाद की प्रतिछाया लगने लगता है।

प्रमुख नक्सली नेताओं चारु मजूमदार की मृत्यु के बाद कानू सान्याल के नेतृत्व वाले नक्सली हमलों और फिर कानू की भी मृत्यु के बाद से तो नक्सलवाद बुरी तरह अपने उद्देश्यों से भटक गया है। यह कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा कि समाजवादी विचारधारा से जन्मा नक्सलवाद गुरिल्ला युद्धों जैसी और भी जाने कितनी नक्सली घटनाओं और  मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की विचारधारा के विरोधाभास में भटककर आज पूरा आतंकवाद की ओर बढ़ गया है। आतंकवाद का तात्पर्य सिर्फ इस्लामिक स्टेट वाला आतंकवाद नहीं होता, बल्कि जो अपने कहर बरपाकर समाज में आतंक का माहौल पैदा करे वो आतंकवाद है। आज नक्सलवाद यही कर रहा है। आए दिन शहीद हो रहे देश के जवान और हिंसा में बेमौत मर रही जनता नक्सलवादियों की विवेकशून्यता का परिचायक नहीं है तो और क्या है। नक्सलवाद के विचारधारायी विचलन से सर्वाधिक प्रभावित हुआ है तो वह  छत्तीसगढ है, इसके अलावा आँध्र प्रदेश,  उड़ीसा, झारखंड और बिहार भी कुछ कम प्रभावित नहीं हैं। नक्सलवादियों का यह विवेकशून्य उन्माद देश से कितने और कब तक बलिदान करवाता रहेगा कहना कितना अनिश्चित है।

पर यह भी सच है कि अनिश्चितता के इस दौर में स्वतंत्र भारत में भी अपने ही लोगों के कारण शहीद होना कितना पीड़ादायी है। पाकिस्तान मारता है, आतंकवाद मारता है, तो लगता है देश की सीमाओं के लिए शहीद हुए, पर जब देश में ही अपनों की विचारशून्य सनकी मानसिकता देश के जवानों को मौत की नींद सुलाती है, तो दोहरी चोट पहुंचती है। नक्सलवाद दोहरी मानसिक चोट पहुंचाने वाला घरेलू आतंकवाद बन चुका है l

साभार -स्पंदन फीचर्स