आधुनिकता का पर्याय कपड़े नहीं-अनुपमा श्रीवास्तव

दिंनाक: 01 May 2017 13:53:45


किस तरह हम अपने सोच और कर्मों से अधिक कपड़ों से अपना परिचय देने लगे l कपडे तो आवश्यक हैं ही, अच्छी वेशभूषा का महत्त्व भी कम नहीं, लेकिन आज जिस तरह सब आकर ‘कपडा केन्द्रित’ हो गया है l हर दिन फैशन की अंधी दौड़ ने हमारे दिमाग और विवेक को जिस तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है, इसका ख़ासा परिणाम मेट्रो सिटीज में दिखता ही है, नक़ल की होड़ गाँव तक पहुँच गई l हर उम्र का व्यक्ति बेहतर से बेहतर. ब्रांडेड कपड़ों की चलती फिरती दुकान हो गया है l हमारा व्यक्तित्व क्या है, हमारे कर्म क्या हैं, हमारी सोच कैसी है, हमारी मर्यादा एवं संस्कृति क्या है ? हमारी बुनियाद क्या है ? इन सब को परे धकेलते हुए,  हम पहने हुए क्या है, इस पल का फैशन क्या है l सारा ध्यान इसी पर है आजकल l फैशन इंडस्ट्री वालों की चांदी और ऐश उड़ाते बच्चों की दिन प्रतिदिन बदलते फैशन के कारन बढती हुई मांगों से माँ-बाप के पैसों की व्यर्थ बर्बादी l

हम हर दिन फैशन के नए ढब, नए अंदाज़ में स्टाइलिश नहीं तो हम तो जमाने के साथ ही नहीं l इस फैशन परेड में नित नूतन परिधान, दिखावे पर पूरे ध्यान ने बहुत कुछ मौलिक छीन लिया है, सादा जीवन था, थे उच्च विचार, गांधी  जी को तो सिर्फ, एक खादी से था प्यार l और आज के युवा फैशन करने के लिए हर गलत काम करने को हैं तैयार l गांधी जी से अधिक दूरद्रष्टा और आधुनिक कौन है जिन्होंने इतना त्यागमयी, संयमी जीवन जिया, सिर्फ बोला नहीं किया भी l क्यों हम चमकीले आवरण में रैपर के पीछे दौड़ रहें हैं, कई अच्छी आदतों से मुंह मोड़ कर अपनी ज़िन्दगी में भ्रम और दुष्परिणामों से नाता जोड़ रहे हैं l

आजकल हम पर फैशन इस कदर हावी है, कि हम कोई भी ड्रेस पहनने से पहले एक बार भी ये नहीं सोचते कि हम उस ड्रेस के अनुकूल हैं या नहीं l कितना अभद्र भी दिखाई पड़ता है कभी कभी ड्रेसिंग ! क्यूँ हम अपनी शारीरिक फिटनेस पर ध्यान नहीं देते ! क्यूँ अपनी खान-पान की आदतें नहीं सुधारते ! क्यूँ नियमित व्यायाम नहीं करते ! क्यूँ फ़ास्ट फ़ूड-जंक फ़ूड को अपनी ज़िन्दगी से बाहर कर देते ? हम हरी सब्जियों, सलाद, स्प्राउट्स को प्राथमिकता क्यूँ नहीं देते ?  सबसे बड़ी बात आधुनिक हो सोच, ज्ञान और संस्कारों के विकास में हो होड़, तो कुछ परिद्रश्य स्वर्णिम की पदचाप सुनाये, वर्ना तो इस दौड़ से न अपना भला न समाज का, ये बात इन विवेकहीन नकलचियों को कौन समझाए ?

सोच हो अपनी बुनियादों को मजबूत करने की, संस्कृति और सभ्यता के अनुरक्षण की, हमारा श्रेष्ठ दिशा निर्देशक, चैतन्य साहित्य के पठन-पाठन और शिक्षा ग्रहण करने की l समाज हित – देश हित में अग्रगामी बनने की, अपनी धरोहरों, अपने पर्यावरण, जीवन को सार्थक व सही दिशा देने वाले अपने संस्कारों, जीवनमूल्यों को संरक्षित करने एवं उन्हें आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने की l सोच हो अपने और सबके न केवल आर्थिक बल्कि आध्यात्मिक, नैतिक, आत्मिक विकास की l सोच हो परहित की l सोच हो अपनी मर्यादाओं,रिश्तों-नातों, नारी जाति के सम्मान की, सोच है ऊपर लिखी हुई इन सारी चीजों को क्रियान्वित करने की पहल की, इंसानियत को मुकम्मल कर जाने की l इमानदारी से अपने कर्तव्य और भूमिकाएं निभाने की l तभी सही अर्थों में आधुनिक बनेंगे l