नारद मुनि की पत्रकारिता और मानवीयता का दृष्टीकोण- परेश उपाध्याय

दिंनाक: 12 May 2017 13:26:10


आधुनिक मीडिया को देखकर कई बार लगता है कि यह अपने पारंपरिक स्वरूप से निरंतर भटकता जा रहा है। बात चाहे मानवीयता से जुड़े मुद्दों की हो या फिर समाज की ज्वलंत समस्याओं की, इन सभी को लेकर मीडिया की कम होती संवेदनशीलता स्पष्ट दिखाई देती है। ऐसे में हमारी भारतीय परंपराओं में संचार के माध्यम से समाज को संकट से बचाने वाले देवऋषि नारद का स्वतः ही स्मरण हो जाता है। एक तरफ जहां वर्तमान मीडिया अच्छे और खराब आतंकवाद सहित असली और नकली राष्ट्रवाद पर चर्चा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर नारद जी का संचार एवं पत्रकारिता का दृष्टिकोण मीडिया और समाज के समक्ष एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनसे जुड़ी घटनाओं को जानकर आसानी से यह समझा जा सकता है कि संचार को समाज और मानवीयता के हित में किस तरह उपयोगी बनाया सकता है।

नारद जी एक ऐसे संचारक थे, जिन्होंने मानवीयता की रक्षा के लिए कई ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जो आज के समय में कदापि संभव दिखाई नहीं देते हैं। देवर्षि नारद मनुष्यों के दुख और दर्द को उस समय देवताओं तक पहुंचाने का काम करते थे। दानवों द्वारा मनुष्यों को कष्ट पहुंचाने के प्रयासों को उन्होंने कई बार असफल किया। महाभारत का युद्ध हो या फिर बालि या रावण का वध पुराणों और हिन्दू ग्रंथों में नारद जी का मानवीयता आधारित प्रयासों में अधिकतर उल्लेख होता है। पुरातन काल में जिन संचारकों का उल्लेख होता है, उसमें वे सर्वोपरि माने गये, उनके संदेशों में हमेशा मानवीयता और लोकहित की भावना का समावेश देखने को मिला। सृष्टि की रक्षा के लिए उन्होंने कई ऐसे काम किए, जिनका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। उन्होंने ही देवलोक का भ्रमण कर संचार के माध्यम से सूचनाओं को पहुंचा कर बालक ध्रुव और प्रहलाद की मां को जीवन दान दिलवाने में मदद की।

वर्तमान मीडिया में मानवीय दृष्टिकोण लगातार उपेक्षित नजर आ रहा है। देश की सुरक्षा में लगे बहादुर सैनिकों पर जम्मू-कश्मीर में हो रही पत्थरबाजी को सामान्य जन आंदोलन मानने और नक्सलवाद की बढ़ती हिंसा पर चुप्पी साधने वाले कतिपय मीडिया की दिशा समझ से परे है। देश की रक्षा में लगे सैनिकों पर होने वाले जानलेवा हमले में कुछ मीडिया को केवल सामान्य प्रदर्शन क्यों नजर आता है? इसी तरह जेएनयू में हुए प्रदर्शन में देश विरोधी नारों को मात्र विचार की अभिव्यक्ति का नाम देना, क्या मीडिया का सही रूप सामने रखता है? इन सब बातों पर ध्यान देना आवश्यक है।

समाज की संवेदनाओं के प्रति मीडिया की क्या भूमिका निभानी चाहिए, यह जानने के लिए पहले हमें यह समझना होगा कि नारद जी किस तरह से संचार का उपयोग समाज की भलाई के लिए करते थे। मीडियाकर्मियों के लिए कोई विशेष कानून चाहे न हो, लेकिन नैतिकता के लिहाज से उन्हें नारद के भक्ति सू़त्र को जरूर पढ़ना चाहिए। नारद भक्ति सूत्र के चौरासी सूत्रों का अगर विश्लेषण किया जाए तो पता चलता है कि उसमें लोकहित छिपा रहता है। नारद के भक्ति सूत्र में लिखित हर अध्याय को अगर ध्यान से पढ़ा जाए तो निश्चित तौर पर मीडियाकर्मियों के लिए एक उचित आचार संहिता का निर्माण किया जा सकता है। इसके पहले भाग में दिए गए ‘अथातो भक्ति व्याख्यास्याम’ पुराणों में भी भक्ति का उल्लेख करते हुए दूसरों का हित करने की आदत, कल्याण, वचन में शुद्धता आदि बातों को अपनाने की बात कही गई है। तृतीय अध्याय में तैतालिसवें सूत्र में ‘दु:संग सर्वथैव त्याज्यः’ के माध्यम से बुरे संग का त्याग करने एवं सत्संगति की बात कही गई है। एक अन्य सूत्र में काम, क्रोध, मोह, स्मृतिभ्रम, विवेक नाश आदि से बचकर कार्य करने की बात कही गई है। आज के मीडिया में भी इन बातों से बचना मीडियाकर्मियों के लिए पहली चुनौती बन गया है। एक अन्य सूत्र में मोह, माया और भ्रम से दूरी बनाने की बात का उल्लेख है। इसके अलावा वह व्यक्ति जो मानवीयता और लोकहित की भावना के साथ चले, उसे लोक हानि की चिंता नहीं होती है, ऐसा उल्लेख भी छठवें अध्याय में मिलता है। चौसठवें भक्ति सूत्र ‘अभिमानदम्भादिकं त्याज्यम’ में उल्लेख है कि अभिमान, दम्भ आदि इस प्रकार की मन की दूषित भावनाओं का त्याग कर देना चाहिए। एक बेहतर व्यक्तित्व में क्या गुण होना चाहिए इसका उल्लेख भी एक सूत्र में मिलता है।

अंतिम अध्यायों में मनुष्य को अहिंसा, सत्य, शुद्धता, दया, अच्छे चरित्र का अनुपालन करने संबंधित बातों का उल्लेख है, यह सभी समाज में मानवीयता की रक्षा के लिए आवश्यक गुण हैं, जिसका समावेश मीडिया में भी किया जाना चाहिए। इस तरह नारद का भक्ति सूत्र एक बेहतर मीडियाकर्मी के लिए आवश्यक आचार संहित के रूप में भी अपनाया जा सकता है। नारद जी के इन्हीं गुणों के कारण उनसे संबंधित साहित्य मीडिया शोध के विषय बने हैं। अनेक शिक्षण संस्थानों खासतौर से मीडिया से जुड़े संस्थानों ने इन पर बकायदा शोध कराने की पहल भी की है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में तो इस विषय को उच्च शिक्षा यानी शोध विद्यार्थियों के अध्ययन के लिए पाठ्यक्रम में भी स्थान दिया गया है। इसके लिए कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला जी के प्रयास निश्चित तौर पर सराहनीय पहल है। वर्तमान मीडिया में समाज के प्रति संवेदना लाने और मानवीयता के पहलुओं पर ध्यान देने के लिए आवश्यक है कि नारदजी के संचार को और अधिक बेहतर ढंग से समझा जाए खासतौर पर आज के मीडिया की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए इसका किस तरह उपयोग हो सकता है इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। मीडिया शिक्षा में अगर पुरातन परंपराओं और संचार के नारद माडल को जोड़ा जाए तो निश्चित ही समाज के लिए वर्तमान मीडिया और अधिक सार्थक साबित हो सकता है।