भारत की सोच वसुधैव कुटुंबकम -प्रो राकेश

दिंनाक: 15 May 2017 10:55:38


भुनेश्वर (विसंकें) l राजधानी में आयोजित नारद सम्मान समरोह में मुख्य वक्ता के तौर पर उपस्थित राकेश सिन्हा ने कहा कि भारतीय समाज प्रयोगधर्मी समाज रहा है। यहां विभिन्न मतों को सम्मान दिया जाता है। केवल अपना ही मत श्रेष्ठ है यह भारतीय धारणा नहीं है। पश्चिम के लिए समग्र विश्व एक बाजार है जबकि भारतीय संस्कृति समग्र विश्व को कुटुंब मानती है। बाजार की बावना और कुटुंब की भावना में सोच का अंतर है। प्रो. सिन्हा ने कहा कि भारतीय जनमानस को समझने के लिए विश्वविद्यालयों में जाकर अध्ययन करने की आवश्यकता नहीं है। हमारे गांवों में सामाजिक समरसता का ज्ञान आपको मिल जाएगा। भारत में वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि हम उदारवादी सभ्यता के वाहक हैं लेकिन इसे हमारी कमजोरी समझा गया है। हाल के दिनों में साहित्यकारों व तथाकथित विद्वानों द्वारा पुरस्कार वापसी पर उन्होंने कहा कि वे लोग तो पुरस्कार के योग्य ही नहीं थे, अच्छा हुआ खुशामद के बल पर उन्हे दिया गया पुरस्कार लौट आया है। वहीं कश्मीर में मौजूदा हालात पर अपने विचार रखते हुए कहा कि कश्मीर समस्या को जड़ से मिटाने की आवश्यकता है। कश्मीर में अब तर्क से नहीं ताकत से हल की संभावना दिखाई देती है। विश्व संवाद केंद्र ओडिशा शाखा द्वारा आयोजित नारद सम्मान शिव नारायण ¨सह को प्रदान किया गया। सम्मान के तौर पर उन्हें 10 हजार रुपये नकद और मानपत्र दिया गया।

कार्यक्रम में विश्व संवाद केंद्र के सभी कार्यकर्त्ता एवं वरिष्ठ पत्रकारगण उपस्थित रहे l