जल संरक्षण की आवश्यकता, कोशिश, कामयाबी तथा प्रभाव -डॉ वेद प्रकाश सिंह

दिंनाक: 15 May 2017 12:03:05

 

प्रस्तावनाः बदलते परिवेश में विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कृषि में निरन्तर गुणवत्तापूर्ण बदलाव आवश्यक है। ऐसी कृषि पद्धतियां एवं फसलों का विकास करने की आवश्यकता है जो कम से कम पानी में अधिक से अधिक गुणवत्तायुक्त उपज दे सके। आज देश में जितनी बारिश होती है उसका मात्र 29 प्रतिशत हिस्सा ही संग्रहित किया जाता है। ‘‘खेत का पानी खेत में, गांव का पानी गांव में’’ की अवधारणा हेतु विशेष प्रयास करने होंगे। जल प्रबंधन पर अनुसंधान एवं जल स्रोतों के विकास पर पुरजोर प्रयास करने की आवश्यकता है। वर्षा जल जो प्रकृति प्रदत्त अमूल्य संसाधन है। सहभागिता प्रक्रियाओं के माध्यम से इसका संचय और प्रबंधन ग्रामीण विकास की धुरी के रूप में किया जाना चाहिए।

भूमि एवं जल हमारी अमूल्य प्राकृतिक सम्पदा है। भूमि आधार प्रदान करने के साथ-साथ, वनस्पतियों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का प्रमुख साधन हैं। जल के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। केन्द्रीय भूमि एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान, कोटा में अनुसंधानों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर एक किग्रा. दाने के उत्पादन हेतु ज्वार, सोयाबीन, मूंगफली, गेहूं, सरसों एवं चना क्रमशः 926, 1700, 2141, 856, 1929999 लीटर पनी की आवश्यकता होती है। हमारी बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण दिन प्रतिदिन इन दोनों संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता कम होती जा रही है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग बहुत ही सूझ-बूझ से करना होगा ताकि भविष्य में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या का उदर-भरण-पोषण सुचारू रूप से हो सके।

329 मिलियन हेक्टेयर कुल भू-क्षेत्र वाला भारत, विश्व का सातवां सबसे बड़ा देश है। पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण तक फैली मालारूपी सीमाओं सहित प्रकृति ने हमें विविध प्रकार की जलवायु और मृदा प्रदान की है। एक ओर बर्फ से आच्छादित पहाड़ है, अति उष्ण थार रेगिस्तान है, पूर्व में विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला चेरापूंजी स्थित है, उष्ण तथा उपोष्ण क्षेत्रों सहित लगभग 8100 किलोमीटर लम्बी तटीय रेखा सम्मिलित है। हमारे देश में भूमि के विविध रूप जो प्रत्येक प्रकार के जीव जन्तुओं का पालन करने में सक्षम है।

मौसम ऐसा मानों फसलों की जरूरतों के हिसाब से गढ़ा गया हो। वनस्पतियों की भांति प्राणियों की आनुवंशिक विविधता भारत में भरी पड़ी है। फिर भी यदि सब कुछ बदल रहा हो

तो क्या ऐसी स्तिथि में हम अपनी आवश्यकताओं को पूरा कर सकने में सदैव समर्थवान बने रहेंगे। जबकि देश में निरन्तर बढ़ती हुई जनसंख्या, प्रदूषित वातावरण, कटते वन, घटती हुई वर्षा एवं वर्षा के दिनों की संख्या, बढ़ता हुआ पारा वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती है। पर्यावरण संरक्षण एवं निरन्तर बढ़ रही आबादी के उदर-भरण-पोषण की वास्तविक जिम्मेदारी कृषि पर है। किसी भी देश की कृषि ही सुदृढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। कृषि उपयुक्त भूमि एवं जल के बगैर संभव नहीं है। अतः वर्तमान में इसका संरक्षण तथा प्रबंधन प्राथमिकता के आधार पर किया जाना आवश्यक हो गया है।

समस्यायें भूमि कटाव कीः प्रस्तुत गाथा सतना जिले के वनवासी बाहुल्य विकासखण्ड मझगवां ही है। पिछले 10 वर्षों में वर्षा के चलन के आधार पर वार्षिक वर्षा का लगभग 92 प्रतिशत भाग तेज बौछारों के रूप में जून से सितम्बर तक प्राप्त हो जाता है। ऊंची-नीची प्राकृतिक बनावट के साथ ही भूमि संरक्षण तकनीकियों के अभाव के कारण वर्षा का पानी अवाधगति से बहता हुआ ढ़ेर सारी उपजाऊ मिट्टी एवं पोषक तत्वों के साथ छोटे-बड़े नालों से होता हुआ नदियों में जा मिलता है। जो हमारे उपयोग से परे हो जाता है। इसकी वजह से खरीफ में बोई गई फसलों में भी नमी की कमी हो जाती है। वर्षाधारित क्षेत्रों में भूमि कटाव के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण हुई है। फलतः फसलोत्पादन प्रभावित हुआ है।

जल संकट का कारणः

  • ऊंची-नीची प्राकृतिक बनावट के कारण अत्यधिक भूमि क्षरण।

  • पेड़ कट रहे हैं, जंगल घट रहे हैं।

  • जानवर चारे की तलाश में चारागाह एवं वन रौंद रहे हैं।

  • अनुपयुक्त सिंचाई एवं जल निकास प्रणाली।

  • जनसंख्या में बेशुमार वृद्धि।

  • वर्षा की मात्रा एवं दिनो की संख्या में कमी।

  • बढ़ता हुआ औद्योगिकीकरण।

  • बढ़ता हुआ शहरी करण।

  • अनुपयुक्त फसलों का चयन।

  • बढ़ती हुई विलासतापूर्ण भोगवादी प्रवृत्ति।

  • अनावश्यक पानी की बर्बादी।

  • परम्परागत जलस्रोतों पर अतिक्रमण एवं उपेक्षा।

  • भू-जल पर बढ़ती हुई आत्मनिर्भरता।

भूमि एवं जल संरक्षण के विभिन्न आयाम:

अनियमित वर्षा वितरण, प्राकृतिक बनावट एवं मिट्टी की किस्म को ध्यान में रखते हुये पहाड़ी की चोटी से तलहटी तक ‘‘रिज टू वैली’’ उपचार कार्य की निम्नलिखित तकनीकियों को कार्य रूप में परिणित कर भूमि एवं जल संरक्षण तथा सम्वर्धन कार्य को अन्तिम रूप दिया गया है

  • उपचार कार्य क्षेत्र

    तकनीकियां/विभिन्न आयाम

    पहाड़ी क्षेत्र

    कण्टूर ट्रेन्चिंग

    बहुउद्देशीय एवं फलदार पौधों का रोपण

    कण्टूर ट्रेन्च की मेड़ एवं खाली बेकार पड़ी भूमियों पर चारे एवं अन्य वनस्पतियों के बीजों की बुवाई।

    मिनी परकोलेशन टैंक (रिसन तालाब)

    पशु अवरोधक खांई (सी.पी.टी.)

    नाला एवं प्राकृतिक जल निकास

    लूज बोल्ड बांध एवं वानस्पतिक अवरोध

    नालाबन्धान

    गैवियान संरचना

    स्टाप डैम

     

    बंजर एवं अनुपयोगी भूमि

    तकनीक -कण्टूर ट्रेन्चिंग

    पौध रोपण

    चारे, पेड़-पौधे एवं वनस्पतियों के बीज की बुवाई

    चरोखर एवं पड़त भूमि

    चारागाह विकास

    पशु अवरोधक खांई द्वारा फेन्सिंग

    कृषि योग्य भूमि

    मेड़बन्दी

    समतली करण

    खेत-तालाब

    चारा उत्पादन

    कृषि वानिकी

    फसल उत्पादन एवं प्रदर्शन कार्यक्रम

               

सभी संरचनायें टिकाऊ एवं उपयोगी बनी रहे इस आशय से प्रत्येक संरचना के लिए उपयोगकर्ता दल का गठन किया जाना आवश्यक हैं जो इसकी देख-रेख के दायित्वों का निर्वहन करते हुये समुचित उपयोग कर लाभान्वित हो रहे हैं। जीवन-यापन के लिए जंगलों पर निर्भर रहने वाले परिवार आज खेती के काम में लगकर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं। आज पूरे वर्ष पीने के पानी के साथ ही सिंचाई का भी पानी उपलब्ध हुआ है।

 भूमि एवं फसल प्रबंधः

भूमि एवं फसल प्रबंध के अन्तर्गत भूमि की उर्वराशक्ति को बनाये रखना, पौधों की प्रति इकाई उचित संख्या, फसलों की बुवाई का समय, खरपतवार नियंत्रण, गर्मी में गहरी जुताई इत्यादि सम्मिलित है। फसलें उन भूमियों को अच्छी तरह ढ़क लेती है तथा अपनी जड़ों के जाल में अच्छी तरह बाधें रखती हैं जिनकी उर्वरता अपेक्षाकृत अधिक होती है। फसलों की प्रति इकाई आदर्श संख्या भी भूमि एवं जल संरक्षण में सहायक होती है। उर्वरकों की कमी की वजह से भी फसलें जमीन को पूरी तरह ढ़क नहीं पाती हैं। ग्रीष्म कालीन जुताई से वर्षा जल का अधिक से अधिक भाग जमीन में ही सोख लिया जाता है।

समय से बुवाई होने पर फसलों में समय पर वानस्पतिक वृद्धि होती है जो भूमि एवं जल संरक्षण में सहायक होती है। अतः भूमि एवं जल संरक्षण के साथ-साथ भरपूर उत्पादन के लिए भूमि एवं जल प्रबंध नितान्त आवश्यक है।

परिणामः बूंद-बूंद से घट भरेः

वर्षा जल प्रबंधन की ‘‘रिज टू वैली’’ उपचार कार्य अवधारणा के अनुरूप सम्पन्न कार्यों द्वारा वर्षा की एक-एक बूंद को पकड़कर धरती का पेट भरने का कार्य ग्रामीणजनों द्वारा किया गया जिसके परिणाम स्वरूप भूमिगत जल स्तर में वृद्धि परिलक्षित हुई है 82 फुट गहरा कुआं जो प्रत्येक वर्ष मई-जून में सूख जाता था। आज वहीं कुआं अल्प वर्षा की स्थिति में भी भरा रहता है। ग्रामीण जन महज 5-6 फुट की रस्सी से पानी प्राप्त कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे हैं। वहीं उपचारित क्षेत्रों के सूखे पड़े हुये अनुपयोगी हैण्डपम्प एवं कूप आज सहजतापूर्वक पूरे वर्ष पेयजल उपलब्ध करा रहे हैं।

भूमिगत जल स्तर में वर्षवार वृद्धि

वर्ष

 

 

 

 

 

1997

वर्षा

(मिमी.)

 

 

 

 

905

वर्षा के

दिन

 

 

 

 61

              जल उपलब्धता (मी.)

मई

 

 

 

 0.93

जल

स्तर में

वृद्धि

 

-

दिसम्बर

 

 

 

 1.80 

जल स्तर में वृद्धि

 

 

 

-           

2003

1298

49

3.09

2.16

4.36

              2.56

2004

824

44

4.27

3.34

6.10

  4.30

2005

1003

43

3.85

2.92

4.85

  3.05

2006

748

34

3.90

2.97

4.92

              3.12

2007

635

24

3.76

2.83

4.80

  3.00

2008

751

29

3.90

 

2.97

 

5.10

  3.30

 

2009

 

748

27

 

4.05

 

 

3.12

 

5.10

 3.30

 

2010

 

909

26

 

3.71

 

 

2.78

 

4.77

   2.97

 

2011

 

1389

42

 

3.65

 

 

2.72

 

4.95

3.15

2012

1196

44

3.96

3.03

4.68

           2.88

 

फसल उत्पादकता पर प्रभावः

दीनदयाल शोध संस्थान कृषि विज्ञान केन्द्र मझगवां, सतना द्वारा मिली वाटरशेड क्र.2सी13सी के अन्तर्गत 20 ग्रामों में जहां कभी पीने के पानी का संकट हुआ करता था, जानवरों को चारे व पानी की तालाश में मीलों भटकना पड़ता था, किसान वर्षाधारित मुश्किल से एकाध फसलें ही ले पाता था। दो वक्त की रोटी की व्यवस्था हेतु पलायन की नौबत तक आ जाती थी। आज वहां मिट्टी व पानी के संरक्षण तथा संवर्धन हेतु निर्मित संरचनाओं के प्रभाव के कारण सिंचित क्षेत्र में विस्तार हुआ है। किसान 3550 हेक्टेयर क्षेत्र पर सिंचाई कर वर्ष में दो-तीन फसलें सफलता पूर्वक ले रहे हैं। सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में भी विस्तार हुआ है। पशुओं के लिए चारा व पानी गांव-गांव में उपलब्ध हुआ है। जिसके कारण पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार के साथ ही दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई है। ग्रामीणों को अपने ही गाँव में कार्य का अवसर मिला हुआ है।

 

फसल उत्पादकता पर प्रभावः

 

क्र.

 

 

    फसल   

 

 

 

जल प्रबंधन से पूर्व

(1997) उत्पादन

कुन्तल/हेक्टे.

जल प्रबंधन के पश्चात (उत्पादन -कुन्तल/हेक्टे.)

2003

 

2015

 

 1

    धान

10.35

16.47

36.71

2

अरहर

7.40

9.50

11.30

3

चना

8.50

15.79

16.55

4

ज्वार

6.34

8.72

12.45

5

गेहूं

15.78

24.85

34.50

6

जौ

12.18

15.33

26.24

7

तिल

1.99

3.16

4.15

8

सरसों

5.17

10.12

17.57


निष्कर्षः

मध्यप्रदेश के सतना जिले के वनवासी बाहुल्य विकासखण्ड, मझगवां के अन्तर्गत 20 गांवों में ग्रामीणजनों की पहल एवं पुरूषार्थ के आधार पर भूमि एवं जल संरक्षण कार्यों के कारण भूमिगत जल स्तर में वृद्धि परिलक्षित हुई है। सिंचाई क्षेत्र में विस्तार हुआ है। उर्वरकों की खपत भी बढ़ी है। ग्रामीणों को अपने ही  गाँव खेतों पर कार्य का अवसर प्राप्त हुआ है। रहन-सहन, खान-पान एवं व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है। अतः स्पष्ट है कि प्राकृतिक संसाधन ही ग्रामीणजनों के समृद्धि व खुशहाल जीवन का टिकाऊ आधार है।

दीनदयाल शोध संस्थान, कृषि विज्ञान केंद्र, मझगवां, सतना (म.प्र.)