देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए विदेशी सहायता से परहेज करना होगा-प्रो. मधु किश्वर

दिंनाक: 27 May 2017 23:35:14

पटना, 27 मई। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए विदेशी सहायता से परहेज करना होगा। जब तक देश की पत्रकारिता, शैक्षणिक संस्थान, एनजीओ आदि विदेशी फंडिंग से चलेगी तब तक आंतरिक सुरक्षा की बात करना बेमानी होगी। आज विदेशी फडिंग का ही नतीजा है कि देश विरोधी पत्रकारिता सम्मानित हो रही है। अमेरिका, पाकिस्तान के गेम प्लान को जमीन पर उतारने वाले लोग हमारे मीडिया, शिक्षा, रक्षा, व्यवसाय जैसे क्षेत्रों में घुसे हुए हैं। इनके रहते आंतरिक सुरक्षा की कोई भी कोशिश सफल नहीं होगी। उक्त विचार ‘मानुषी’ की संस्थापक संपादक एवं विख्यात लेखिका प्रो. मधु किश्वर ने व्यक्त किए। वे शनिवार को विश्व संवाद केन्द्र द्वारा आयोजित आद्य पत्रकार देवर्षि नारद स्मृति कार्यक्रम में ‘देश की आंतरिक सुरक्षा’ विषय पर बतौर मुख्य वक्ता संबोधन कर रहीं थीं।

उन्होंने कहा कि आज विदेशी फंडिंग का ही नतीजा है कि फासीवादी जैसे नकारात्मक शब्द को यहां की मीडिया द्वारा बात-बात पर उछाला जाता है और इतना ही नहीं भारत के लिए इस शब्द का उपयोग वैश्विक मंचों का किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट मानना है कि देश की आंतरिक सुरक्षा सुढृढ़ रहनी चाहिए। आज जम्मू कश्मीर के हालात बेहद खराब हैं। कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति पश्चिम बंगाल की भी है। दुःख की बात है कि मीडिया में निष्पक्ष रूप से कश्मीर या बंगाल की हिंसक घटनाओं का प्रकाशन-प्रसारण नहीं हो पा रहा है। बंगाल समस्या के पीछे मूल कारण विदेशी घुसपैठ है। इस घुसपैठ पर वहां की राज्य सरकारों की तुष्टिकरण एवं वोट बैंक की नीति का कुप्रभाव रहा है। यही कारण है कि बंगाल एवं पूर्वोत्तर भारत में पिछले 30 वर्षों में करोड़ों विदेशी घुसपैठियों का जमावड़ा हुआ है। इस कारण वहां के स्थानीय लोगों को विस्थापित होना पड़ा। आर्थिक संरचनाएं घ्वस्त हो गयी और कानून व्यवस्था की जो स्थिति खराब हुर्ह उसका असर पूरे देश पर हुआ।

अध्यक्षीय भाषण देते हुए पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायधीश न्यायमूर्त्ति वी. एन. सिन्हा ने कहा कि देश की सुरक्षा को अक्षुण्ण रखने के लिए पर्याप्त कानून हैं जिसका अगर निष्पक्ष रूप से अनुपालन हो तो एक सशक्त भारत की छवि बरकरार रखी जा सकती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब उपलब्ध कानून का अपने फायदे के लिए दुरूपयोग होने लगता है। देश की आंतरिक सुरक्षा के मामले में भी यह बात लागू होती है। संविधान की मूल आत्मा के विपरीत जाकर व्यवस्था स्थापित करने और निजी लाभ के लिए उसको परंपरा का रूप देने के कारण ही कश्मीर की समस्या ने एक नासूर का रूप धारण कर लिया है। बंगाल की स्थिति तो उससे भी बुरी है क्योंकि राष्ट्रीय परिदृश्य पर बंगाल में हो रही हिंसक घटनाओं का जिक्र न के बराबर होता है।

इससे पूर्व विषय प्रवेश कराते हुए प्रो. दीप्ति कुमारी ने कहा कि आज के समय में संगोष्ठी का यह विषय इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि बंगाल में हो रही हिंसक घटनाओं का सही विवरण पारंपरिक मीडिया देने में नाकाम रहा है। ऐसे में यह जरूरी है कि देशहित में कार्य करने वाली संस्थाएं सामने आकर आम जनमानस तक देश में हो रही हिंसक घटनाओं का सही विवरण प्रस्तुत करें।

कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष श्रीप्रकाश नारायण सिंह ने कहा कि विश्व संवाद केंद्र अपने स्थापना काल से ही देशहित से जुड़े विषयों को रेखांकित करके जनमानस में स्थापित करता रहा है। संस्था द्वारा समय-समय पर प्रासंगिक विषयों पर स्मारिका का प्रकाशन एवं संगोष्ठी कार्यशाला, प्रशिक्षण शिविर आदि का आयोजन किया जाता रहा है। मीडिया में स्वस्थ्य पत्रकारिता की संस्कृति कायम रहे इसके लिए भी संस्था प्रतिबद्ध है। विश्व संवाद केन्द्र के सचिव डॉ. संजीव चौरसिया ने संस्था के गतिविधियों के बारे में लोगों को अवगत कराया।

कार्यक्रम के आरंभ में सुपर कॉप के नाम से मशहूर पंजाब के पूर्व डीजीपी के.पी.एस. गिल के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इससे पूर्व अतिथियों द्वारा विश्व संवाद केंद्र द्वारा प्रकाशित स्मारिका ‘बिहार में मीडिया’ का विमोचन किया गया। इस अवसर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले पत्रकारों को पुरस्कृत भी किया गया। इस कड़ी में ‘देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान’ वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र कुमार को, ‘केशवराम भट्ट पत्रकारिता सम्मान’ रामाशंकर मिश्र को तथा ‘बाबूराव पटेल रचनाधर्मिता सम्मान’ छायाकार अजीत कुमार को प्रदान किया गया। पाटलिपुत्र सिने सोसायटी द्वारा आयोजित डॉक्युमेंट्री एवं शॉर्ट फिल्म प्रतियोगिता के पुरस्कार विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया।