‘अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा’ सोशल मिडिया का शोर : रोहित सरदाना

दिंनाक: 30 May 2017 22:29:46


सोशल मिडिया आज नाराजगी व्यक्त करने का शक्तिशाली माध्यम बन गया है, इससे मतभिन्नता और नाराजगी में गफलत होती है. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरे का शोर मचता है, ऐसा प्रतिपादन झी न्यूजके रोहित सरदाना ने विश्‍व संवाद केन्द्र नागपुर द्वारा आयोजित नारद जयंती पुरस्कार वितरण कार्यक्रम में किया. समाचारपत्र ‘लोकशाही वार्ता’ के संपादक लक्ष्मणराव जोशी की अध्यक्षता में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ.   

सरदाना ने आगे कहा कि, दस-पंद्रह कॅमेरे लगाकर लोग ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरा’ विषय पर भाषण देते है, चर्चा करते है. यह सब प्रसार माध्यमों पर दिखाया जाता है. समाचारपत्रों में प्रकाशित होता है. सरकार के विरुद्ध बोलने के कारण किसी को देश छोडकर भागना नहीं पडता, या विदेश में शरण नहीं लेनी पडती. और न ही सरकार कहती है की, कल समाचार पत्र नहीं छपेंगे. फिर भी अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरे का शोर चलते रहता है. यह अभिव्यक्ति की आज़ादी पर खतरे का नहीं; अभिव्यक्ति की आज़ादी का सबूत है!

अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रकाशित एक आंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में भारत को 136 वा स्थान दिया गया है. इस आधार पर, अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्षधरों ने सरकारकी की आलोचना का जबाब देते हुए उन्होंने कहा कि, इससे पहले, इस संदर्भ में आंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का क्रमांक 133 था. मतलब, अभिव्यक्ति की आज़ादी के संदर्भ में हम तब भी गढ्ढे में थे, और आज भी गढ्ढे में ही है. इसलिए अब तक सब बहुत अच्छा था और आज ही अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बडा खतरा निर्माण हुआ है, यह शोर बेमानी है. 

बडे-बडे उद्योगों द्वारा चलाए जा रहे चॅनेल की बात करते हुए सरदाना ने कहा कि, बिझिनेस हाऊसेस के मिडिया का व्यावसायिकरण हो गया है. वहाँ कुछ भी संतुलित नहीं होता. जो बिकता है, बेचा जाता है. 

सोशल मिडिया की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि, यह सूचना का प्रभावी माध्यम बन गया है. इससे लोगों कोविविध स्रोतों से किसी भी घटना की जानकारी मिलते रहती है. इसमें कई बार गलत जानकारी भी होती है. इसलिए, कोई जानकारी संदेहजनक प्रतीत हो तो उसके बारे में प्रश्‍न पूछकर सही स्थिती जान लेना चाहिए. क्योंकि, इस जानकारी के आधार पर लोग घटनाओं के संदर्भ में अपनी राय बनाते है. घटना की सही जानकारी मिलेगी तो ही लोग उसपर अपनी सही राय बना सकेंगे, इसलिए तटस्थ वृत्तांकन आज की आवश्यकता है.

धेयवादी पत्रकारिता मुद्रित माध्यमों का प्राण 

लक्ष्मणराव जोशी ने कहा कि, टेलिव्हिजन प्रसारमाध्यमों की भीड में भी मुद्रित माध्यमों ने धेयवादी पत्रकारिता का दामन नहीं छोडा तो उनका महत्व अबाधित रहेगा. स्वाधीनता के बाद - स्वराज से सुराज का धेय रखकर पत्रकारिता की जाती तो उसका पतन नहीं होता. किसी भी उद्योग में व्यावसायिकता का महत्व होता ही है और मूल्यों का पालन करते हुए व्यवसाय करने में कोई बुराई नहीं. व्यवसाय में कुछ समझौते भी करने पडते है लेकिन दु:ख के साथ कहना पडता है की, मुद्रित माध्यमों का बडी मात्रा में बाजारीकरण हो चुका है. ‘पेड न्यूज’ इस बाजारीकरण के पतन का ही परिणाम है. अब तो बात उससे भी आगे बढ गई है. समाचारपत्रों में संपादक की नियुक्ति करते समय उनसे विज्ञापन का टार्गेट -कितने रुपयों के विज्ञापन लाओगे, पूछा जाता है. और दुर्भाग्य यह की, संपादक भी यह शर्त स्वीकार करते है! 

पत्रकार और शिक्षकों के काम का महत्व अधोरेखित करते हुए उन्होंने कहा कि, पत्रकार और शिक्षकों को बिगडने की आज़ादी ही नहीं है. उन्हें देश और समाज के लिए समर्पित भाव से काम करना होगा. 

पुरस्कार

झी 24 तास चॅनेल के नागपूर ब्युरो प्रमुख अखिलेश हळवे (11हजार रुपये, स्मृतिचिन्ह और प्रमाणपत्र), लोकशाही वार्ता के वाशिम संवाद्दाता नितीन पगार (5 हजार रुपये,  स्मृतिचिन्ह और प्रमाणपत्र) और इस वर्ष ही प्रारंभ हुए वृत्तछायाचित्रकार और व्यगचित्रकारों के गुट में ‘लोकसत्ता’ समाचारपत्र की छायाचित्रकार मोनिका चतुर्वेदी को (5 हजार रुपये,  स्मृतिचिन्ह और प्रमाणपत्र) पुरस्कार प्रदान किए गए. 

कार्यक्रम का प्रास्ताविक विश्‍व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष सुधीर पाठक, अतिथियों का स्वागत केन्द्र के सहप्रमुख प्रसाद बर्वे,  संचालन नीलय चौथाईवाले और आभार प्रदर्शन केन्द्र के सचिव रविजी मेश्राम ने किया.