दर्शन, काव्य और तीर्थाटन के माध्यम से एक विखंडित राष्ट्र को एकजुट करने वाले आदि शंकराचार्य !

दिंनाक: 04 May 2017 13:57:47
आदि शंकराचार्य 

शंकर को देखने समझने के दो द्रष्टिकोण हैं | एक तो तथाकथित आधुनिक बौद्धिक वर्ग और दूसरा उनका परंपरागत अनुयायी वर्ग | दोनों वर्ग अपनी अपनी महत्वाकांक्षाओं से दूषित है तथा अपना वर्चस्व पसंद करते हैं |

कुछ लोग जो मानते हैं कि इतिहास ही वास्तविकता है, और पौराणिक कथाएं मिथक हैं, झूठी हैं, वे आद्य शंकराचार्य के अद्वैतवाद के खिलाफ हो जाते हैं: “ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या”, अर्थात यह दुनिया, उसके समस्त वैज्ञानिक निष्कर्ष, जिन्हें हम अनिवार्य आवश्यकता मानते हैं, और यहाँ तक कि हमारा मन जिसे सत्य समझता है, सब भ्रामक हैं | एकमात्र मन बुद्धि से परे, मौलिक सत्य ब्रह्म है, जिसे हम भगवान, आत्मा, चेतना, आदि विभिन्न नामों से जानते हैं, जिसका विस्तार अनन्त है ।

दुनिया को केवल भ्रम मानने वाले इस सिद्धांत को आम तौर पर माया-वाद के नाम से भी जाना जाता है | इस सिद्धांत के माध्यम से शंकर कुछ असाधारण करने में सक्षम हुए : उन्होंने विभिन्न समुदायों और विविधताओं भरे इस देश को एकजुट करने में सफलता पाई | उस समय अनेक मत मतान्तर थे जैसे बौद्ध, मिमांसक (पुरानी वैदिक परम्परा), वेदांती (बाद की वैदिक परम्परा), शैव, वैष्णव, और शाक्त । सबकी अपनी अपनी मान्यताएं थीं |

राजनीतिक पंडित

शंकराचार्य का दर्शन संभवतः वैदिक है, बौद्धों और जैनों के विपरीत, उन्होंने अपने ज्ञान को वेदों से खोजा और इसे अपने अवैयक्तिक अधिकार के साथ प्रस्तुत किया, जिसने उन्हें एक आस्तिक बनाया। उनकी टिप्पणियां, भाष्य और प्रकरण में, उन्होंने बार-बार निर्गुण, निराकार, दिव्य ब्रह्म को स्पष्ट किया । वेदांत पर लिखे गए उनके ब्रह्म-सूत्र-भाष्य, उनकी संस्कृत की कविताएं विवेक चूडामणि और निर्वाण-शतकम और उनके ग्रंथ आत्म-बोध में इसे स्पष्ट किया गया है। बहुत से लोग इसे उन पर बौद्ध मत का प्रभाव मानते हैं, जिसमें दुनिया को क्षण भंगुर माना गया है | बुद्ध के शून्य वाद को वैदिक रंग देने का भी बुद्धिजीवी अक्सर शंकराचार्य पर आरोप लगाते हैं व शंकराचार्य के वेदान्त को वे प्रच्छन्न बौद्ध मानते हैं |

लेकिन शंकर के काव्य (स्तोत्र) में पुराणों में वर्णित दैवीय सगुण ब्रह्म के अनेक मूर्त रूपों की स्तुति की गई हैं । उन्होंने पुरातन देवताओं पर मनमोहक और प्रभावी रचनाएँ लिखी हैं: शिव (दक्षिणमूर्ति-स्तोत्र), विष्णु (गोविंदाष्टक) और शक्ति (सौन्दर्य-लहरी) | इसे वैदिक हिंदूत्व को पौराणिक हिंदू धर्म से जोड़ने का प्रयास कहा जा सकता है, जैसा कि कुछ विद्वान् मानते भी हैं | इस विचार प्रवाह को ही आगे चलकर वेदांत के अन्य प्रणेताओं ने भी विस्तारित किया, जैसे रामानुजाचार्य, माधवाचार्य और वल्लभाचार्य । इतना ही नहीं तो शंकर ने तंत्र पर भी लिखा, जो उस समय प्रभावी रूप से प्रचलन में था ।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि दुनिया को भ्रम बताकर, निराकार और शून्य की उपासना पर जोर देने वाले शंकराचार्य ने, 12 ज्योतिर्लिंग, 18 शक्ति-पीठ और चार विष्णु-धामों के तीर्थाटन को बढ़ावा दिया, यह अलग बात हैकि उसने भारत के एकत्व को परिभाषित किया | उन्होंने केरल से कश्मीर को, वर्तमान ओड़िसा की जगन्नाथ पुरी को गुजरात के द्वारका से, वर्तमान कर्नाटक में शिरंजरी से उत्तराखंड में बड़ारी, वर्तमान तमिलनाडु में कांची, उत्तर प्रदेश में काशी की यात्रा न केवल स्वयं की वरन आमजन को भी प्रेरित किया । हिमालय की दुर्गम पर्वत श्रंखला, नर्मदा और गंगा नदियों के तट, तथा पूर्वी और पश्चिमी घाट सबको जोड़ा ।

शंकर कोई दिखावे के हाथीदांत जैसे दार्शनिक नहीं है; वह एक राजनैतिक ऋषि है, जो उस समय के ऐतिहासिक संदर्भों के साथ जुड़कर उनका समाधान देते है। दर्शन, कविता और तीर्थ यात्रा के माध्यम से, उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप को बांधने का प्रयास किया, जिसे सदैव हिंदू, बौद्ध और जैन ग्रंथों के साथ-साथ वैदिक संकल्पनाओं में जम्बू-द्वीप, भरतखंड अर्थात विश्व का भरण पोषण करने में समर्थ राजाओं की भूमि कहा जाता था ।

ऐतिहासिक संदर्भ

ब्रह्म-सूत्र (1.3.33) पर अपनी टिप्पणी में, उन्होंने कहा, " कोई कह सकता है कि जिस प्रकार आज कोई सार्वभौमिक शासक नहीं है, कभी भी नहीं रहा होगा |" यह एक प्रकार से उनके समय के बिखंडित समाज की स्वीकृति मानी जा सकती है, और इससे यह भी प्रतीत होता है कि उन्होंने बौद्ध, जैन और हिंदू पुराणों में वर्णित चक्रवर्ती, या सार्वभौमिक सम्राट की पौराणिक कथाओं को अस्वीकार किया है |

अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि आद्य शंकराचार्य का कार्यकाल ईसा से 8 सौ से 12 सौ वर्ष पूर्व तथा बुद्ध के 1300 वर्ष बाद का है ।

यह वह कालखंड था, जब भारत अपनी ऐतिहासिक बुलंदियों पर पहुँचने के बाद ढलान पर था - 1,500 वर्ष पूर्व गुप्त साम्राज्य का पतन हो चुका था, और 1,000 साल पहले मुस्लिम दक्षिण एशिया को जीत चुके थे । कन्नौज के हर्षवर्धन की मृत्यु हो चुकी थी, राष्ट्रकूट नर्मदा नदी के दोनों तरफ, उत्तर के प्रतिहारों, पूर्व के पलस, और दक्षिण के चालुक्यों के बीच लगातार युद्ध हो रहे थे । आज की क्षेत्रीय भाषाओं का जन्म भी नहीं हुआ था । दक्षिण भारतीय मंदिरों में उनके विशिष्ट गोपुरम गेटवे नहीं बने थे, रामायण का तमिल में अनुवाद किया जाना था, जयदेव की वह गीत गोविंद भी लिखी जाना अभी शेष थी, जिसने पहली बार दुनिया के सम्मुख राधा का वर्णन किया था।

आदि शंकराचार्य पूरे देश की यात्रा करते थे, तथा उनके संवाद की भाषा थी, संस्कृत, जो उस समय देश के बौद्धिक अभिजात्य वर्ग की भाषा थी |

यह वह समय था जब विश्व भारत को अजूबे की तरह देख रहा था | जहाँ भारतीय परिवार व्यवस्था से सारी दुनिया प्रभावित थी, तो यहाँ के साधू सन्यासियों के प्रति उनमें नापसंदगी का भाव था | हमारा समाज भी गृहस्थ और सन्यासी में बंटा हुआ था |

गृहस्थ बनाम साधु

जब 327 ईसा पूर्व मैक्सेन के अलेक्जेंडर ने भारत पर हमला किया, उस दौरान वैदिक मान्यताओं वालों ने गृहस्थों का समर्थन किया, जबकि बौद्ध, जैन और अजीविका मत वालों ने सन्यासियों का समर्थन किया |

शंकर के समय में, वैदिक जगत भी दो हिस्सों में विभाजित था | उनमें से मीमांसक गृहस्थों के समर्थक थे, तो वेदांतिक साधुओं के समर्थन में थे |

कुछ लोग तर्क देते हैं कि यह बौद्ध धर्म के प्रभाव को दिखाता है, जिसके प्रति हिंदू अतिवादियों आलोचना का भाव रखते थे । इस बात की अक्सर अनदेखी की जाती है कि बौद्ध धर्म पर भी वेदान्त का प्रभाव पड़ा | शंकराचार्य के समय से ही, सैद्धांतिक बुद्ध, अधिक सांसारिक बोधिसत्व में परिवर्तित हो गए | उनका स्त्री रूप तारा, ज्ञान (प्रज्ञा) पर दया (करुना) का बर्चस्व दर्शाता है ।

एक ओर जहाँ ब्राह्मणवादी संभ्रांत मीमांसक, परंपरागत कर्म मार्ग पर जोर दे रहे थे, तो दूसरी ओर वेदांती बौद्धिक ज्ञान मार्ग को तर्क की कसौटी पर कस रहे थे | इन दोनों से अलग भारत के कथाकार सूत नाटकीय पुराणों की रचना में संलग्न थे | व्यास से वाल्मीकि तक हिंदुत्व को नया रूप दे रहे थे | देवाधिदेव शिव का देवी शक्ति से विवाह, और विष्णु द्वारा लक्ष्मी और सरस्वती दोनों का सामंजस्य, यह सब पौराणिक काल की रचनाएँ हैं ।

जीवनी

शंकराचार्य केरल में एक गरीब नम्बूदरी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुये । उनके पिता का नाम शिवागुरु था, जिससे स्पष्ट होता है कि उनका परिवार शैव्य था । वाल्यावस्था में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई, और उनकी मां ने उनकी परवरिश की, हम उन्हें आर्यम्बा (महान महिला) के रूप में जानते हैं । वे कृष्ण भक्त थीं, तो कहा जा सकता है कि शंकर पर शैव्य और वैष्णव दोनों संस्कार आये । अपनी मां के विरोध के बावजूद, उन्होंने सन्यासी बनने का निश्चय किया और वेदान्त के व्यवहारिक रूप मीमांसक को पसंद किया । उनके गुरु, गोविंद भागवतपाद थे, उनका नाम दर्शाता है कि वे वैष्णव थे | भगवतपाद गोविन्द ने नर्मदा नदी के तट पर संन्यास ग्रहण किया था तथा वे बौद्ध धर्म से भी काफी प्रभावित थे।

मध्य भारत से, शंकर काशी गए, जहाँ उनकी भेंट एक श्मशान के रखवाले चांडाल से हुई, जिसे हिंदू समाज की जाति व्यवस्था के पदानुक्रम में सबसे नीचा स्थान माना जाता था | जब शंकराचार्य ने उसे मार्ग से एक तरफ हटने को कहा, तब चांडाल ने व्यंग से कहा कि आप किसे हटा रहे हो ? "मेरा शरीर या मेरी आत्मा, सगुण या निराकार, सीमित या असीम?" इस घटना का शंकर पर गहरा असर हुआ | उन्होंने उस समय की छुआछूत की मान्य परंपरा को अमान्य कर चांडाल को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया । इस घटना ने उन्हें मनीषा-पंचकं की रचना करने के लिए प्रेरित किया, और यहाँ से ही द्वैत के स्थान पर उन्होंने अद्वैत को प्रतिपादित किया । जाति व्यवस्था से परे उन्होंने ज्ञान को महत्व दिया ।

बाद में शंकर ने बिहार में महिष्तिथी में महान मीमांसक विद्वान मंडन मिश्रा का सामना किया और उन्हें अनुष्ठान (कर्म) पर ज्ञान की श्रेष्ठता को लेकर निरुत्तर किया। लेकिन फिर, मंडन की पत्नी, उभया भारती ने उनसे ईरॉटिक्स (कामशास्त्र) के विषय में प्रश्न किये । जब ब्रह्मचारी शंकर ने उस विषय पर अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित की, तब विदुषी भारती ने उनसे कहा कि कामुक आनंद और भावनात्मक अंतरंगता को जाने बिना, वे कैसे दुनिया के रहस्यों को समझने का दावा कर सकते है। इसके बाद की गाथा रहस्यों में छिपी हुई है, और बाद के लेखकों ने उसे अपने अपने ढंग से लिखा है ।

शंकर ने समस्त सांसारिक सुखों का आनंद लेने के लिए, योगिक शक्तियों का इस्तेमाल कर अपनी आत्मा को कश्मीर के राजा अमरू की लाश में प्रवेश करवाकर उसे जीवित किया । किंवदंती है कि इसने शंकराचार्य को कामुक प्रेम कविता लिखने के लिए प्रेरित किया, जिसे अमरू-शतक कहा जाता है। उस समय कश्मीर में और बाद में वर्तमान कर्नाटक के शृंगेरी में, शंकर ने अपनी आराध्य शारदा के मंदिरों की स्थापना की, जिसे सरस्वती के रूप में जाना जाता है क्योंकि उनके हाथ में किताब रहती है। यद्यपि उनके हाथ में एक पात्र और तोता भी होता है, जिसे घरेलू और सांसारिक जीवन का प्रतीक माना जा सकता है | दूसरे शब्दों में, दैवीय स्त्री रूप तांत्रिक ज्यामितीय प्रतीक श्री यंत्र और शंकर के संबंध के रूप में देखा जा सकता है | क्या उभया भारती या उनकी मां को देवी ने प्रेरित किया, ताकि गृहस्थ जीवन की श्रेष्ठता प्रतिपादित हो? हम केवल अनुमान लगा सकते हैं |

अपनी मां की मृत्यु की जानकारी मिलने पर उनके अंतिम संस्कार के लिए शंकराचार्य केरल लौटे। जैसा कि सर्व विदित है कि मगरमच्छ के हमले से बचने के बाद, अंततः मां ने इसी शर्त पर उन्हें साधु बनने की इजाजत दी थी, तो यह उनका मां से किया गया वादा था।

हालांकि, वैदिक परंपरा में, घरेलू जीवन छोड़ने के बाद, एक साधु अंत्येष्टि जैसी सांसारिक क्रियाएं नहीं कर सकता। लेकिन यहां शंकर ने अपनी उग्र क्रांतिकारी भावना प्रदर्शित की। जब श्मशान में उन्हें अंतिम संस्कार करने से रोका गया, तो उन्होंने अपनी मां का अंतिम संस्कार अपने घर के पिछवाड़े में जाकर विधि विधान से किया ।

उसके बाद उन्होंने भारत भ्रमण कर, भारत के चारों कोनों में अपनी संस्था (मठ) की स्थापना की, तीर्थयात्रीयों की सुविधा के लिए मार्ग का मानचित्रण किया, ताकि हर समय यह यात्रा हो सके । उन्होंने विभिन्न अखाड़ों की स्थापना की, जिनमें सन्यासी अपने ज्ञान और अपनी शारीरिक और योगिक शक्तियों के माध्यम से हिंदू धर्म की रक्षा सुनिश्चित करते हैं । उन्होंने कुंभ मेले के स्थान भी सुनिश्चित किये, तथा उस दौरान होने वाली गतिविधियाँ निर्धारित कीं ।

32 वर्ष की अल्पायु में ही शंकर की हिमालयी क्षेत्र में मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि उनके जन्म के पूर्व उनके पिता को देवताओं द्वारा दो विकल्प दिए गए थे, एक अल्पायु महान बेटा और दूसरा लम्बी आयु वाला सामान्य बेटा । पिता ने पहला विकल्प चुना | ऐसी ही एक पौराणिक कथा भी है, जिसके अनुसार एक महान बालक आठ वर्ष की आयु में ही मरने वाला था, किन्तु तपस्या उपरांत उन्हें आठ वर्ष का समय और दिया गया ताकि वे वेदों की सच्चाई का शोध कर सकें। उनकी टिप्पणियां और मोनोग्राफ इतने शानदार थे कि महाभारत व पुराणों के रचयिता महर्षि वेद व्यास ने उन विचारों को दुनिया में फैलाने के लिए उनका जीवन 16 वर्ष  और बढ़ाया।

शंकर के गूढ़ तत्वों की मीमांसा

विद्वान हैरत में हैं कि एक ओर तो दार्शनिक शंकर, जिनके ज्ञान की सर्वत्र सराहना होती है, और दूसरी ओर भाव और भक्ति से परिपूर्ण काव्यकार शंकर ? एक ओर तो शंकराचार्य ने तीर्थयात्रा को प्रेरित किया, और दूसरी ओर भज गोविंदम में जीवन की निस्सारता इतनी खूबसूरती से व्यक्त की? वे वेदांती थे या तांत्रिक? वे शैव थे, वैष्णव थे, या शाक्त थे? वे इनमें से कोई एक थे, या सभी थे, या इनमें से कोई नहीं? वे बौद्ध विरोधी थे या प्रच्छन्न बौद्ध? उनका जीवन दर्पण बहु आयामी था, ठीक बैसे ही जैसे तबसे अब तक का भारत, विविधता में एकत्व का प्रतीक ।

मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका की तुलना में भारत की विविधता को नकारा नहीं जा सकता। यह दुनिया को अचंभित भी करती है | बाहरी लोगों को लगता है कि इस विविधता के कारण भारत विभाजन या अराजकता के कगार पर है। जबकि भारतवासियों के लिए इस विविधता में ही भारत की वास्तविक इन्द्रधनुषी छटा है, | इसीलिए भारत को लेकर बाहरी और अंदरूनी दृष्टिकोण इतने भिन्न है।

बाहर के लोग भारत की विविधता को, विभाजनकारी मानते हैं | वे भारत को विनाश के कगार पर मानते हैं, उसके दो कारण हैं | पहला तो वंशानुगत (जातिवाद, मनुस्मृति के द्वारा प्रतिपादित ब्राह्मणवाद) परिणाम है, जबकि दूसरा निरंतरता को नकारने वाला बौद्धों का शून्यवाद । इसके विपरीत शंकर जैसे अंदरूनी सूत्र मानते हैं कि विश्वदृष्टि बहुत सीमित और स्वयं ही विखंडित है | उनके सभी विचार, सभी धारणाएं, सभी मान्यताएं, स्वयं अपूर्ण हैं, लेकिन वे इस भ्रम में जीते हैं कि वे सही और पूर्ण हैं।

शंकराचार्य को समझने के लिए सबसे पहले इब्राहीमिक द्वन्द से मुक्त होने की जरूरत है, जो यह मानते हैं कि एक सच्चा ईश्वर है और अन्य झूठे देवता हैं | यही धारणा आज की सभी राजनीतिक और वैज्ञानिक चर्चाओं को प्रभावित करती है, और यहाँ तक कि आज के हिंदू भी इस द्वन्द का शिकार हो जाते हैं | आज की पूंजीवादी व्यवस्था के द्वन्द से भगवान भी अछूता नहीं है | इसे यूं समझें कि परमात्मा सीमित हो सकता है (पूंजीकरण के बिना देवता) और असीम (भगवान, पूंजीकरण के साथ) | जबकि सगुण और निर्गुण ब्रह्म का सम्बन्ध बैसा ही है, जैसे कि शब्द से ध्वनि और अर्थ का रिश्ता | इन दोनों के बिना क्या कोई शब्द मौजूद हो सकता है ?

शंकर अपने चारों तरफ दुनिया को बौद्धों की तरह विखंडित अल्पकालिक सीमित सत्य के रूप में देखते हैं । हालांकि, बौद्धों के विपरीत, वह जोर देकर कहते हैं कि वे इस मंच पर अनौपचारिक, अनंत और असीम सत्य के साथ उपस्थित हैं, जहाँ हर अस्तित्व का अर्थ भी है और हर अस्तित्व का महत्व भी है। पूर्व सुगम है; भविष्य अधिक श्रेष्ठ और मोहक है | जीवन सीमित और अस्थायी सुखों और दुखों से भरा हुआ है | एक श्रेष्ठ धरातल (जीवन लक्ष्य) के बिना, जीवन निरर्थक, व्यर्थ हो जाता है।

भारत में बौद्ध धर्म का विकास नहीं हुआ, उसका मुख्य कारण है कि बौद्ध अभिवादियों ने पुराणिक हिंदुत्व के विपरीत, जहां देवताओं ने ज्ञान प्रकट करने के लिए नृत्य किया, गायन किया, लोगों में लोकप्रिय अनुष्ठानों को त्याग दिया। इसके विपरीत, शंकर ने महसूस किया कि कहानियां और गीत लोगों के साथ जुड़ते हैं और जीवन के विस्तारित दृष्टिपथ बनाते हैं। इसलिए उन्होंने पुराने मंदिरों और उनके अनुष्ठानों को महत्व दिया, जो कठोर अन्वेषक वैदिक अनुष्ठानों की तुलना में अधिक समावेशी, अधिक कलात्मक और सार्वजनिक थे । हिंदू धर्म के उद्धारकर्ता के रूप में शंकर की लोकप्रियता को स्थापित करने में इसने बड़ी भूमिका निभाई।

कथन, कविता, तीर्थयात्रा, विश्वदृष्टि या ईश्वर पर बहस के बजाय, शंकर कहते हैं कि केवल एक सत्य है जो श्रेष्ठ है, व्यापक है, वही ब्रह्म है, उस तक पहुँचने का माध्यम तर्क वितर्क नहीं है, केवल विश्वास के माध्यम से उस तक पहुंचा जा सकता है |

यह वास्तविकता है या रणनीति है? हो सकता है, हम निर्णायक रूप से कुछ न कह पायें, किन्तु इतना तय है कि, कुछ भी बेहतर नहीं है, और सब कुछ भ्रामक है, मानते हुए भी एकदूसरे के प्रति सम्मान, एक दूसरे की अक्षमता के प्रति सहानुभूति, और प्रतिद्वंदिता के स्थान पर पूरक होना अधिक उपयुक्त है।

जब हम ज्ञान को दूर करते हैं, तब शांति हमें छोड़ती है | जब हम अन्य विचारों की यात्रा करते हैं, तब भी हमें ज्ञान आवश्यक है - ज्ञान जो शंकर ने अपने गुरु से प्राप्त किया, चांडाल से पाया, उभया भारती और अंत में अपनी मां से पाया – वह है एक विराट, अंतर-संगत मन-स्वतंत्र वास्तविकता में आस्था, ब्रह्म में आस्था |

वाद विवाद

बहुत लोग हैं जो यह मानते हैं कि शंकर का दर्शन बौद्धिक अभिजात वर्ग के लिए है, और उनकी कवितायें व तीर्थाटन अपेक्षाकृत कम बौद्धिक वर्ग के लिए है । यह अनुचित विचार अक्सर उन लोगों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जो खुद को बौद्धिक मानते हैं, जबकि वे स्वयं शंकर के बहुआयामी एकीकृत समग्र रूप को देखने में नाकाम रहे हैं।

भारतीय इतिहास के किसी भी प्राचीन या मध्ययुगीन व्यक्ति की तरह, शंकर के जीवन के बारे में कल्पना से तथ्य को अलग करना मुश्किल है। विद्वानों को यकीन नहीं है कि उनकी साहित्यिक रचनाओं में से कौन सी प्रमाणिक रूप से उनकी है| अनेक लोगों ने तो शंकर को शिव के अवतार में बदल दिया है | हिंदू धर्म के एक विजेता ने बौद्धों को निकाल दिया, एक विलक्षण और विपुल तर्कशास्त्रि और कवि, एक सवर्ण जातिवादी हिंदू, उनको ये तमगे देना बेहतर है या उन्हें विरोधाभासों का समन्वयक मानना ?

सबसे दिलचस्प है, उनकी अतिरंजित जीवनी, जो उनके जन्म के सदियों बाद लिखी गई, जिसमें उन्हें दिग्विजई घोषित किया गया, मंडन मिश्र जैसे दार्शनिकों के साथ उनके शास्त्रार्थ में उन्हें विजेता के रूप में प्रस्तुत किया गया ।

बहस में बुद्धिजीवियों को हरा देने का यह जुनून, ज्ञान के विस्तार से कहीं अधिक अहंकार का जनक है । और इसकी संभावना अत्यंत न्यून है कि वैदिक दार्शनिक इस तरह की गतिविधियों में संलग्न होंगे, क्योंकि वेदों में तो अहंकार (अहम) को ज्ञान के लिए ग्रहण के रूप में वर्णित किया गया है, जो ब्रह्म के विचार को ही अवरुद्ध करता है | जब सभी के भीतर आत्मा के रूप में वह परमात्मा ही विद्यमान है तो कौन विजई, कौन पराजित ?

अहंकार के कारण ही संवाद के स्थान पर विवाद होते हैं और उसका परिणाम है हिंसा । विवाद में हम समझने के लिए नहीं, बल्कि प्रत्युत्तर देने के लिए सुनते हैं, परिणाम स्वरुप अज्ञानता (अविद्या) में फंसे रहते हैं । संवाद में, हम अपने विचारों को परिशोधित करते हैं, ज्ञान प्राप्त करते हैं । शायद शंकर के यथार्थ को उनके बौद्धिक प्रशंसकों और अनुयाईयों की महत्वाकांक्षाओं ने दूषित किया है, जो वर्चस्व के विचार को पसंद करते हैं।

लेकिन हम एक बुरे विचार के पक्ष में जितना अधिक बहस करते हैं, उतना ही हम उसमें लिप्त होते जाते हैं । हम एक वफादार विपक्ष के रूप में समाप्त हो जाते हैं | अधिक महत्वपूर्ण है, वैकल्पिक विचारों की तलाश करना | यह आलेख उस वैकल्पिक विचार को प्रस्तुत करने का एक प्रयास है: ब्रह्म सत्यम, जगत मिथ्या, यह अनुभव को अमान्य करने के लिए या हिंदू वर्चस्व स्थापित करने के लिए दिया गया बयान नहीं है, बल्कि एक सरल रूपरेखा है | आईये केवल भारत में नहीं, बल्कि इस वैश्विक गांव में बिखरे असंख्य विचारों की विविधता में एकता को खोजें ।