आध्यात्म क्या है ? - संत राजिंदर सिंह जी

दिंनाक: 17 Jun 2017 23:55:47

आम तौर पर ऐसा माना जाता है कि अध्यात्म तर्क-बुद्धि औरविश्लेषण की क्षमता विकसित नहीं करता। हमें यह भी पढ़ाया जाता है कि अध्यात्म और विज्ञान में कोई समानता नहीं है। तोक्या अध्यात्म सिर्फ एक विश्वास है?

मेरा मानना है कि अध्यात्म एक संपूर्ण विज्ञान है। विज्ञान तथ्य कोप्रकट करता है। इसमें किसी धारणा अथवा तथ्य को परखने केलिए प्रयोग किए जाते हैं कि वे सही हैं या नहीं। अध्यात्म विचारोंका विज्ञान है। जिस तरह विज्ञान किसी चीज को सिद्ध करता है, उसी तरह अध्यात्म-विज्ञानी, जिन्हें हम संत और महात्मा कहते हैं -वे भी यह सिद्ध करते हैं कि हमारी आत्मा, परमात्मा का अंश हैऔर परमात्मा का अनुभव किया जा सकता है।

जिस तरह विज्ञान में हम किसी प्रयोगशाला में जाकर एक प्रयोग करते हैं और किसी नतीजे पर पहुंचते हैं, उसी तरहअध्यात्म में भी करते हैं। लेकिन इस क्षेत्र में हमारा यह शरीर ही प्रयोगशाला बन जाता है। ध्यान और साधना द्वारा हमअपनी आत्मा के साथ प्रयोग करते हैं। इस प्रयोग में हमें प्रभु की सत्ता और उस सत्ता से अपने संबंधों का अनुभव होता है।लेकिन जैसे प्रयोगशाला में शिक्षक के निर्देशों के अनुसार काम नहीं करेंगे, तो वांछित परिणाम नहीं मिलेंगे, उसी तरह सेकिसी सही गुरु या महात्मा के अभाव में अध्यात्म के प्रयोग में भी कई बार असफलता मिलती है।

अध्यात्म अनुभव का विषय है और भौतिक जीवन में किसी अमूर्त अनुभव में विश्वास करना मुश्किल लगता है। हम सोचतेहैं, क्या मैं इसे देख सकता हूं, पकड़ सकता हूं या इंद्रियों द्वारा महसूस कर सकता हूं? आरंभ से ही हमें सिखाया जाता है किजो आंखों से दिखाई देता है वही सत्य है। यदि खुद सुना है तो वह सही है। हम इंद्रियों के स्तर पर ही जीते हैं, सहज भाव सेइस पर विश्वास ही नहीं कर पाते कि इस भौतिक संसार से परे भी कोई दुनिया हो सकती है।

दुनिया के विभिन्न धर्मों को देखें। उनकी किताबें देखें। सभी धर्म ग्रंथ और आध्यात्मिक पुरुष कुछ दिव्य मंडलों का जिक्रकरते हैं। उन्होंने वहां पहुंचने का तरीका और अपने खुद के अनुभवों का वर्णन किया है। इस तरह अध्यात्म का संबंध आत्माकी उड़ान से है, उन अनुभवों से है जो भौतिक इंद्रियों की पकड़ में नहीं आ सकते।

ऐसा इस भौतिक जीवन में हो सकता है। ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें हम अपने आप को बाहरी संसार से हटा कर, अंतर में स्थिर करते हैं। अंतर की दुनिया में प्रवेश करने पर हमारी सारी उर्जा किसी एक विशेष केंद्र पर एकत्रित हो जातीहै। फिर किसी समर्थ गुरु के मार्गदर्शन से हम अंतर के मंडलों की यात्रा करते हैं और उस ज्योति तथा नाद का अनुभव पातेहैं, जिसका वर्णन आध्यात्मिक ग्रंथों में मिलता है।

कहीं इस तरह का अनुभव इसलिए तो नहीं होता, क्योंकि हमने ऐसा मान लिया है? कहीं यह अंध विश्वास तो नहीं है? इसेसमझने की कोशिश करनी होगी। क्या आपने कभी उस घटना की सत्यता पर विश्वास करना छोड़ा है, जिसे आप स्वयंअपनी आंखों से घटित होते देख चुके हैं?

अंध विश्वास का अर्थ है -किसी ऐसी चीज को मान लेना जिसके बारे में सिर्फ पढ़ा या सुना हो। और हम उसके पीछे आंखेंमूंद कर उसके पीछे चल पड़ें। विश्वास तभी आता है जब स्वयं किसी चीज का अनुभव करें। जैसे किसी बच्चे से बार-बार कहेंकि आग में अंगुली मत डालना, पर बच्चा नहीं समझता। जब वह खुद आग में अंगुली डालता है तो उसे अनुभव होता है किऐसा करने पर अंगुली जल जाती है।

इसलिए अनुभव किए बिना किसी के कहने पर या पढ़ी-सुनी बात पर विश्वास, हमेशा बनावटी और सतही होता है। जबआप शांत-चित्त होकर बैठते हैं और अंतर में रोशनी देखते हैं या अनहद नाद को सुनते हैं तो उस समय कोई व्यक्ति टॉर्चलेकर जबरदस्ती तुम्हारी आंखों में रोशनी नहीं डालता। बल्कि आप खुद उसे अनुभव करते हैं। यही अध्यात्म का मार्ग है।