“आपातकाल” भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय – 25 जून 1975

दिंनाक: 25 Jun 2017 19:57:20

25 जून, यानी वह दिन जब भारतीय इतिहास के सर्वाधिक विवादास्पद फैसले का ऐलान किया गया था। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून, 1975 अर्धरात्री में भारतीय संविधान की धारा 352 के तहत आपातकाल की घोषणा की थी। आजादी के बाद भारतीय इतिहास में इस फैसले को काफी विवादास्पद माना जाता है।

आपातकाल लागू होते ही आतरिक सुरक्षा कानून के तहत राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी की गई। इनमें जयप्रकाश नारायण, जॉर्ज फर्नाडीज और अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे। दरअसल, इस आपातकाल के बीज 1971 में हुए लोकसभा चुनाव में ही पड़े थे, जब इंदिरा गाधी ने प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को हराया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गाधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया।

अदालत ने इन आरोपों को सही पाया। न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने साहसी निर्णय देते हुए इंदिरा गांधी के निर्वाचन को निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इंदिरा गांधी सर्वोच्च न्यायालय में चली गयीं। वहां से उन्हें इस शर्त पर स्थगन मिला कि वे संसद में तो जा सकती हैं; पर बहस और मतदान में भाग नहीं ले सकतीं। उन्होंने त्यागपत्र देने की बजाय आंतरिक उपद्रव से निबटने के नाम पर आपातकाल लगा दिया। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद मचे ने 25 जून, 1975 की रात में कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये।आज ही के दिन भारत ने मुश्किल से हासिल की गई अपनी आजादी एक झटके में गंवा दी थी।

पूरा देश कांग्रेसीइमर्जन्सी की तानाशाही की गिरफ्त में आ गया; पर समय सदा एक सा नहीं रहता। धीरे-धीरे लोग आतंक से उबरने लगे। संघ द्वारा भूमिगत रूप से किये जा रहे प्रयास रंग लाने लगे। लोगों का आक्रोश फूटने लगा। आपातकाल और प्रतिबन्ध के विरुद्ध हुए सत्याग्रह में एक लाख से अधिक स्वयंसेवकों ने गिरफ्तारी दी। लोकतन्त्र की इस हत्या के विरुद्ध विदेशों में भी लोग इंदिरा गांधी से प्रश्न पूछने लगे।

इससे इंदिरा गांधी पर दबाव पड़ा। उसके गुप्तचरों ने सूचना दी कि देश में सर्वत्र शांति हैं और चुनाव में आपकी जीत सुनिश्चित है। इस भ्रम में इंदिरा गांधी ने चुनाव घोषित कर दिये; पर यह दांव उल्टा पड़ा। चुनाव में उसकी पराजय हुई और दिल्ली में जनता पार्टी की सरकार बन गयी। मां और पुत्र दोनों चुनाव हार गये। इस शासन ने वे सब असंवैधानिक संशोधन निरस्त कर दिये, जिन्होंने प्रधानमंत्री को न्यायालय से भी बड़ा बना दिया था। इस प्रकार इंदिरा गांधी की तानाशाही समाप्त होकर देश में लोकतन्त्र की पुनर्स्थापना हुई।