ट्रंप-नमो का सामंजस्य और ड्रेगन की भड़ास-प्रवीण गुगनानी

दिंनाक: 19 Jul 2017 22:41:36

जून 2016 के अपनें अमेरिका प्रवास के दौरान अमेरिकी संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत अमेरिका सम्बंध “इतिहास की झिझक” से बाहर आ गए हैं. इस बार नमो के अमेरिका प्रवास में ट्रंप से भेंट के पश्चात वैश्विक समुदाय को यह स्पष्ट संदेश प्रसारित हो गया कि “भारत अमेरिका सम्बंधों में झिझक अब इतिहास की बात हो गई है”. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की व्हाईट हाउस से विदाई के बाद भारत अमेरिकी राष्ट्राध्यक्षों के मध्य जीवंत सम्बंधों में कमी आनें की आशंका बड़े पैमानें पर व्यक्त की जा रही थी. नवनियुक्त अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने व्हाईट हाउस में प्रवेश के साथ ही जिस प्रकार के क्रांतिकारी संकेत दिए, अमेरिका व अमेरिकी फर्स्ट का नारा दिया, पिछले दिनों जिनेवा में पर्यावरण के विषय पर जिस प्रकार का आश्चर्यजनक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, वैश्विक व विशेषतः भारतीय समुदाय को एच बी 1 वीजा पर झटका दिया व आदि आदि विषयों से जैसा अनपेक्षित व्यवहार प्रस्तुत किया उससे भारत अमेरिका सम्बंधों के संदर्भ गहरी आशंकाएं व्यक्त की जानें लगी थी. वैश्विक ही नहीं अपितु भारतीय राजनयिक भी ट्रंप के व्यवहार से भारत अमेरिका सम्बंधों के पूर्ववत न रहनें की बात कहनें लगे थे. भारत अमेरिका के सम्बंधों में खिचाव की बात से पाकिस्तान व चीन की प्रसन्नता प्रकट होनें लगी थी. यद्दपि अपनें चुनाव अभियान के दौरान ट्रंप ने जिस प्रकार स्वयं को मोदी का प्रसंशक बताया था, हिंदू व हिंदुत्व की स्तुति की थी, अमेरिकी हिंदू समुदाय को पक्ष में लिया था व आश्वस्त किया था उससे इन आशंकाओं को क्षीणता ही मिल रही तथापि डोनल्ड ट्रंप के अस्थिर व्यवहार व आचरण से “कुछ कहा नहीं जा सकता” की स्थितियां बनती जा रही थी. इन आशंकाओं के मध्य जब भारतीय प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के ट्रंप काल में प्रथम अमेरिका प्रवास की बात आई तो मोदी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई थी. सम्पूर्ण विश्व के वैदेशिक विशेषज्ञ इस बात पर पैनी नजर गड़ाए  बैठे थे कि ट्रंप मोदी के साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं. विश्व नेताओं से व्यक्तिगत स्तर के सम्बन्ध, संपर्क व संवाद स्थापित कर लेनें की सतत सिद्ध हुई मोदी की प्रतिभा भी राजनयिक मापदंडों पर मापी जानें हेतु चढ़ा दी गई थी. यद्दपि नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा की पूर्व संध्या पर ट्रंप प्रशासन ने इन राजनयिक रिपोर्टों को खारिज किया था कि वह भारत की अनदेखी कर रहा है. अमेरिकी प्रशासन यह कहकर भारत अमेरिका संबन्धों का ट्रंप कालीन भविष्य कथन कर दिया था कि राष्ट्रपति ट्रंप को यह अहसास है कि यह देश विश्व में 'भलाई के लिए, एक ताकत' रहा है और इसके साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं: तथापि ट्रंप के अब तक के ट्रेक रिकार्ड को देखते हुए आशंकाएं अतीव स्तर पर हावी थी. अमेरिका में ट्रंप समर्थकों में यह बात सर्वव्यापी व सर्वस्पर्शी है कि भारतीय लोग अमेरिकियों की नौकरियां छीनने वाले लोग हैं व भारतीयों का अमेरिका में अधिक आप्रवास अमेरिका हित में नहीं है. इस बढ़ती कूधारणा के मध्य नमो का अमेरिका जाना व इस बात को स्थापित करना कि भारत व भारतीय सदैव अमेरिका के विकास में सहायक ही रहें हैं व भविष्य में भी सहायक ही रहेंगे; एक बड़ी व एतिहासिक उपलब्धि रही है.

         बहुप्रतीक्षित मोदी व ट्रंप की प्रथम भेंट की सबसे बड़ी बात यह रही कि दोनों ने संयुक्त रूप से पाकिस्तान को उसकी धरती से आतंकवाद न फैलने देनें का स्पष्ट, सख्त व सुविचारित संदेश दे दिया है. “आतंकवाद की समाप्ति हमारी शीर्ष प्राथमिकता है” यह कहकर ट्रंप ने मुंबई व पठानकोट के दोषियों को शीघ्र कटघरे में लानें व सजा देनें की बात भी कही. “आतंकवाद हेतु पाकिस्तान की धरती का उपयोग पाकिस्तान को परेशानी व संकट में डालेगा” इस संदेश को दृढतापूर्वक प्रकट करनें में दोनों नेताओं ने स्पष्ट शब्दों व भावभंगिमा का प्रयोग किया.

         ट्रंप को बार बार गले लगाते हुए मोदी ने बराक ओबामा जैसा ही सामंजस्य व वैचारिक तादात्म्य ट्रंप से स्थापित करनें में रत्ती मात्र भी विलम्ब या चूक नहीं की फलस्वरूप ट्रंप प्रशासन ने कहा कि "हमारी साझीदारी का भविष्य इतना उज्ज्वल कभी नहीं दिखा भारत और अमेरिका हमेशा मित्रता और आदर के बंधन में बंधे रहेंगे." अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ साथ अमेरिकी फर्स्ट लेडी भी भारतीय प्रधानमंत्री के प्रति प्रभावित, उत्सुक व आदरपूर्ण आचरण का व्यवस्थित प्रदर्शन करते दिखाई पड़ी. 

              स्टेच्यु आफ लिबर्टी की छांह में हुई भारत-अमेरिका की मित्रता का यह नया अध्याय सुदूर दक्षिण एशिया में बैठे विस्तार वादी, सत्ता पिपासु व लोकतंत्र विरोधी चीनी ड्रेगन को बड़ा ही नागवार गुजरा और उसनें तुरंत ही इसकी तीक्ष्ण प्रतिक्रया व्यक्त की. इस प्रतिक्रया का प्रमुख कारण यह भी रहा कि भारत अमेरिका ने हिन्द महासागर में चीन के प्रभाव को रोकनें हेतु भी रणनीति बनानें व अगले माह हिन्द महासागर में सबसे बड़ा सैनिक युद्धाभ्यास करनें पर भी सहमति कर ली है. अमेरिका से भारत को मिलनें वाले 23 ड्रोंस भी एक चीन कि खीझ का एक बड़ा कारण है, इन ड्रोंस से भारत हिन्द महासागर में सभी प्रकार की आवाजाही की जीवंत निगरानी करे सकेगा. चीन के सरकारी समाचार पत्र ने भारत को परामर्श देते हुए आगे लिखा है कि यह समय चीन के विरुद्ध आक्रामाकता दिखानें का नहीं है और भारत सीमा विवाद में चीन की क्षमता के आगे कहीं टिक नहीं सकता है. दुर्दांत आतंकवादी संगठन हिजबुल के सरदार सैयद सलाहुद्दीन को वाशिंगटन में वैश्विक आतंकवादी घोषित करने से भी चीन चिढ़ गया और उसनें चीनी सरकारी समाचार पत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ के माध्यम से संदेश दिया कि भारत अमेरिका से अनावश्यक निकटता न बढ़ाए अन्यथा इसके गलत परिणाम भारत को भुगतने होंगे. इस लेख के मर्म में चीन का यह भाव प्रकट होता है कि “चीन को भ्रम है कि इस प्रगाढ़ दोस्ती की पृष्ठभूमि में चीन का बढ़ता प्रभाव है, जो भारत और अमेरिका को कतई रास नहीं आ रहा है. चीनी राष्ट्रीय समाचार पत्र में यह भी कहा गया है कि भारत अपनी गुटनिरपेक्ष नीति का त्याग कर अमेरिका का मोहरा बनता जा रहा है. चीन में हुए ओबीओआर के शिखर सम्मेलन में भारत का न जाना, चीन के विरोध के बावजूद भी एनएसजी मुद्दे पर भारत का सतत दबाव बनाये रखना और किसी भी दिन एनएसजी पर भारत द्वारा बढ़त बना लेनें की उजली होती आशा भी चीन की तीखी प्रतिक्रया का बड़ा कारण है.

चीन की यह आक्रामकता भारत हेतु ही नहीं अपितु समूचे विश्व हेतु चिंता का विषय बनी हुई है. चीन की विस्तारवादी नीति और उसकी महत्वाकांक्षा पर नियंत्रण हेतु भारत अमेरिका का साथ आना केवल इन दोनों देशों के सामरिक हितों के लिए ही नहीं बल्कि समूचे विश्व समुदाय के लिए व विश्व शांति के लिए एक परिणामदायी घटना बनेगी. सारांशतः यह कि एक ओर जहां “ग्लोबल टाइम्स” में चीन द्वारा व्यक्त संताप उसकी बढ़ गई चिंताओं का प्रकटीकरण है, वहीँ दूजी ओर यह भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव, शक्ति व सामरिक शाक्तियों का परिचायक भी है.