साहित्य तो ठीक था, वामपंथी विचारधारा ने बिगाड़ा: डॉ. शर्मा

दिंनाक: 02 Jul 2017 19:20:33

विस के मानसरोवर सभाकक्ष में श्रीधर पराड़कर का हुआ सम्मान

भोपाल, दि. 01.07.2017। साहित्य में सबकुछ सही था, लेकिन वामपंथी विचारधारा ने सबकुछ बिगाड़ दिया। सही विचारों के साथ साहित्य सृजन करने से व्यक्ति और विचार दोनों का यहां सम्मान हो होता है वहीं आज यहां रहा है। यह बात विस के मानसरोवर सभाकक्ष में वरिष्ठ साहित्यकर श्रीधर पराड़कर के सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए विस अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा ने कही। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति और विचार दोनों ही महत्पूर्ण हों तो देश प्रगति की ओर बढ़ता है। श्रीधरजी में दोनों ही बातें हैं, वे अच्छे और सच्चे व्यक्ति हैं और संघ में रहकर उन्होंने उन लोगों को गढने का काम किया जो समाज तथा देश को नई दिशा देने का काम कर रहे हैं। उनका लिखा साहित्य समाज को स्थापित करने वाला है। उनके भीतर संत के सारे गुण मौजूद हैं। डॉ. शर्मा ने कहा कि सम्मान तो वास्तव में एक तरह की कृतज्ञता ही है, भले ही श्रीधरजी ने सम्मान नहीं करवाने का निर्णय लिया हो लेकिन यह समिति ने भी तो अपना दायित्व निभाया है। रामायण में भी व्यक्ति के साथ समाज का वर्णन किया गया है कि उस समय समाज कृतज्ञ और गुणी था। इसलिए श्रीधरजी एक व्यक्ति के साथ ही एक बेहतर साहित्यकार हैं, यह बात अलग है कि वे अपने आप को साहित्यकार नहीं मानते हैं। श्री शर्मा ने उनके दीर्घायु होने की कामना भी की। इससे पूर्व कार्यक्रम का शुभारंभ मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन कर किया गया, तत्पश्चात वंदेमातरम का गायन हुआ। इसी दौरान अपने स्वागत वक्तव्य में मप्र पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष तपन भौमिक ने आयोजन के बारे में विस्तार से बताया। कार्यक्रम में श्रीधर पराड़कर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को स्मरण करते हुए एक किताब का विमोचन भी किया गया। 

व्यक्ति को राष्ट्रसेवा के लिए तैयार करें: गोलेजी

सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मध्य क्षेत्र शारीरिक प्रमुख विलासजी गोले ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्री पराड़कर जी से गवालियर में मेरा संपर्क एक कार्यकर्ता के नाते हुआ। जब वे शासकीय सेवा में थे। उस समय उन्होंने जो संघ के प्रति अपनी निष्ठा और लगाव दिखाया उससे स्पष्ट है कि संघ के एक कार्यकर्ता का काम लोक संग्रह और लोक संस्कार देना है। श्री गोले जी ने कहा कि संघ का काम व्यक्ति को राष्ट्रसेवा और साधना के लिए तैयार करना है, इसके लिए उसमें वे सारे गुण आ जाने चाहिए जिनसे राष्ट्रनिर्माण की बाधाएं दूर हो सकें। श्री पराड़कर के बारे में उन्होंनें कहा कि श्रीधरजी लोगों के साथ पारिवारिक संबंध बनाने में भी महति भूमिका निभाते रहे। इसके साथ ही अखिल भारतीय साहित्य परिषद में बड़े दायित्व को भी उन्होंने संभाला, मामाजी के साथ में लेखन कार्य किया। महात्मा गांधी की हत्या का जिक्र करते हुए श्री गोलेजी ने कहा कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाकर संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था, इस तरह से संघ को नष्ट करने का भी प्रयास किया गया। लेकिन पराड़कर जैसे कर्मठ, निस्वार्थभाव से देश सेवा करने वाले सुधीजनों की देन है कि आज संघ संसारभर में फलफूल रहा है। 

जो करना है वो स्वयंसेवक करेगा: पराड़कर

कार्यक्रम में अपने सम्मान पर श्रीधर पराड़कर ने कहा कि जब डॉ. हेडगेवार ने संघ की स्थापना की तो लोग कहते थे कि संघ क्या करेगा। तो डॉ. साहब कहते थे कि जो कुछ करना है वो तो स्वयं सेवक करेगा। और आप देख ही रहे हैं कि जहां देश का प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और अब तो देश का राष्ट्रपति भी एक स्वयंसेवक बनने जा रहा है तो ऐसे में संघ की क्षमता का आकलन किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मेरा यह सम्मान जिसके लिए मैने बहुत मनाही की लेकिन ये लोग नहीं माने और अब मुझे लग रहा है जहां गुरू की निंदा हो वहां नहीं रहना चाहिए लेकिन जहां गुरू ही प्रशंसा करे तो वहां समझ नहीं आता कि क्या किया जाए। श्री पराड़कर ने कहा कि मैने कुछ नहीं लिखा, और न ही मैं साहित्य परिषद मेें आने से पहले लेखक था, ये तो सब मुझसे कहा गया और मैंने लिख दिया। जहां तक संघ की समझ के बारे में कहूं तो भोपाल में श्री शरद मेहरोत्रा मुझे लेकर आए और उन्होंने बताया कि संघ क्या है। उनके सरल जीवन को सभी जानते हैं। यहां तक कि केंसर का इलाज कराने के लिए भी वे भोपाल से बाहर नहीं गए, ताकि कोई संघ पर ये आरोप न लगा सके कि उनको आखिर समय में संघ ने छोड़ दिया। इसलिए मुझे भी राष्ट्रपति के हाथों जो सम्मान मिला उसके 5 लाख रुपए मैंने साहित्य परिषद को दान कर दिए ताकि मेरे पास कुछ न रहे। 

विचार के कारण नौकरी छोड़ी: आर्य

कार्यक्रम में सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री लालसिंह आर्य ने कहा कि जिनके सामने नौकरी छोटी और विचार बड़ा हो ऐसे व्यक्ति ही राष्ट्रनिर्माण की बात करते हैं। श्रीधरजी के सामने भी जब विचारों के आगे नौकरी आ गई तो उन्होंने नौकरी को ही छोड़ दी। श्री आर्य ने कहा कि श्रीधरजी ने हजारों कार्यकर्ताओं को गढ़ा है और साहित्य भी उसी दिशा में लिखा है। जहां उन्होंने 1857 के बारे में कलम चलाई है तो वहीं डॉ. अंबेडकर के समाजिक समरसता की भावना को भी आगे बढ़ाया है। श्रीधरजी के सम्मान के बारे में उन्होंने कहा कि जब परिश्रम की पराकाष्ठा होती है तो इसका परिणाम ही इस तरह सम्मानित होता है। उन्होंने पराड़कर जी के दीर्घायु होने की कामना करते हुए सभी को धन्यवाद दिया। अंत में कार्यक्रम में पधारे सभी अतिथियों का आभार विधायक रामेश्वर शर्मा ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता तथा जनसामान्य लोग उपस्थित थे।