चीन की धौंस बन्दर धुड़की से ज्यादा कुछ नहीं- डॉ किशन कछवाहा

दिंनाक: 25 Jul 2017 14:18:26

हेकड़ी , तिकड़म और घिंगामस्ती का सहारा लेने वाला चीन इस बात को भली भांति जानता है कि भारत उसके लिए विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है , इसे छोड़ने का वह विचार भी नहीं कर सकता लेकिन उसके भविष्य के सपनों को चकनाचूर करता आत्मनिर्भर होता भारत का भविष्य उसकी एक बड़ी बैचैनी का कारण भी है | इस नजरिये से उस के आक्रोश और चालबाजी को समझा जाना चाहिए | भारतीय प्रधानमंत्री का अमरीका दौरा हुआ और वहां हुआ भव्य स्वागत तथा संयुक्त बयान में बुनियादे ढांचे के पारदर्शी विकास और संप्रभूता व क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान के आव्हान से उसके पैरों  के नीचे की जमीन खिसकती नजर आने लगी है | उसकी वन बेल्ट वन रोड योजना में पारदर्शिता का पूर्णतः अभाव है | गिलगित – बल्तिस्तान न तो पाकिस्तान का हिस्सा है, न ही चीन का | यह एक अकेला मामला नहीं है | भारत और जापान द्वारा अफ्रीका देशों के व्यापक हित में एशिया – अफ्रीका विकास गलियारा की सहमति से भी उसकी साँसे उखड़ी-उखड़ी सी हैं | क्योंकि उसका परिणाम और ओ.वी.आर. का भविष्य दांव पर है | चीन इसे एक बड़े आर्थिक दांव के रूप में संकित भाव से देख रहा है | मोदी सरकार रूस, अमेरिका इसराइल और यूरोप के अनेक देशों से नजदीकियां बढ़ाने में सफल रही है | ये नजदीकियां उसकी परेशानी का बड़ा कारण है | चीन कभी युद्ध की चाह नहीं रख सकता यदि वह परास्त हो गया और अन्दर तक नहीं घुस पाया तो उसकी कलई खुल जाएगी इसीलिए उसकी धमकियां सिवाय बन्दर घुड़की से ज्यादा कुछ अधिक नहीं है | इसके अलावा उसे अंतर राष्ट्रीय बिरादरी का भी डर है , भारत की परमाणु क्षमता को भी वह नजर अंदाज नहीं कर सकता | फिर भी भारत को उसकी धोखेबाजी और फरेबी चालों से सावधान रह कर उसकी चुनोती को स्वीकार करने की जरूरत है | वह तनाव बढ़ाने को सदा उत्सुक रहता है जिससे भारत उसकी धौंस में आकर उसकी हेकड़ी के सामने झुक जाये | डोमलोंग की ढिठाई  उसका एक उदाहरण है | सन 62 में चीन ने भारत चीनी भाई-भाई के नारे और पंचशील के सिद्धांतों को रौंदा , भारत के साथ विश्वासघात करते हुए हमला कर दिया, सन 13-14 में जब चीनी राष्ट्रपति भारत में दोस्ती मजबूत करने आये, तभी चीनी सेना लद्धाख के चूमर क्षेत्र में घुस आई और अपना कब्ज़ा ज़माने की कोशिश करने लगी |

चीन लगातार ऐसे प्रयास करता रहता है, वह भी सुनियोजित तरीके से जिससे भारत की उत्तरी सीमा पर लगातार विवाद और तनाव बना रहे | गत 1 जून को भारतीय सेना से ड़ोकाला के लालटेन में सन 2012 में स्थापित दो बंकरो को हटाने को कहा गया था जो थंभी घाटी के पास और भारत-भूटान- तिब्बत ट्राईजेक्सन  के कौने में पड़ता है | चीन ने इन दो बंकरो को बुलडोजरों से तबाह कर दिया था | कई वर्षों से इस क्षेत्र में गस्ती कर रही भारतीय सेना ने सन 2012 में फैसला किया था कि यहाँ भूटान-चीन सीमा पर सुरक्षा के तहत बंदोबस्त करने के लिए साथ ही पीछे से मदद के लिए बंकरों को तैयार रखा जायेगा | डोकाला में पहली बार इस तरह की घुसपैठ नहीं हुई है | चीन के सैनिकों ने नवम्बर 2008 में भी यहाँ भारतीय सेना के कुछ अस्थायी बंकरो को नष्ट कर दिया था  | रक्षाविशेषज्ञों का मानना है की चीन थांबी घाटी पर अपना प्रभुत्व ज़माना चाहता है जो तिब्बत के दक्षिणी हिस्से में है | ड़ोकाला इलाके पर दावा जताकर चीन अपनी भौगोलिक स्थिति को व्यापक बनाना चाह रहा है ताकि वह भारत – भूटान सीमा पर सभी गतिविधियों पर निगरानी रख सके | भारत किसी भी हालत में भूटान को अकेला नहीं छोड़ सकता | संभवतः चीन इस बात की भी परीक्षा लेना चाह रहा है कि भारत मित्र देशों के साथ किस सीमा तक खड़ा रह सकता है ? भूटान भारत का मित्र है और भारत भूटान के बीच सुरक्षा समझौता भी है | भूटान का सवाल नहीं है | भारत भविष्य में अपने सभी मित्र देशों, वियतनाम फिलीपिंस, ताइवान आदि के साथ भी खड़ा रहेगा | भारत की यह दृढ़ता विश्व में असर डालेगी | नेपाल, मालद्विप, श्री लंका , बांग्लादेश व म्यांमार आदि ऐसे देश है जो चीन को पसंद नहीं करते | लेकिन निवेश के कारण उसके जाल में फंस गए है | चीन की भी यही आशंका है की अगर ये देश चीन के चंगुल से या दबाव में आने से इनकार करेंगे तो भारत उनके साथ खड़ा हो जायेगा | भारत की यही दृढ़ता उन्हें चीन के चंगुल से बहार भी निकालेगी | इस दृढ़ता का व्यापक असर होगा जिसका असर चीन के विरोधी देशों जापान और दक्षिणी कोरिया पर भी होगा | उसके पिट्ठू पाकिस्तान की छटपटाहट तो इन दिनों देखने लायक है | भारत भी परमाणु ताकत वाला देश है | भले ही उसकी क्षमता चीन के बराबर न हो | लेकिन दुनिया के सामने जब दो परमाणु ताकतों के बीच टकराहट सामने आएगी तब क्या पूरी दुनिया सक्रीय नहीं हो जायगी फिर अन्य देश उसके खिलाफ होंगे जो युद्ध की पहल करेगा | भारत तो अपनी तरफ से पहल करेगा नहीं दुसरे भारत – चीन का व्यापर भी युद्ध नहीं होने देगा | क्योंकि उसके बाद व्यापर का रिश्ता बिल्कुल समाप्त हो जायेगा जिसका असर चीन की अर्थव्यस्था पर पड़ेगा | भारत की दृढ़ता से यह संकेत भी जा रहा है कि इस बार न तो कदम पीछे हटेंगे और न ही दबाव बनाने की राजनीति के सामने झुकेंगे | सन 62 में चीन ने पंचशील के सिद्धांतों को तोडा , भारत-चीनी भाई-भाई नारे को झुठलाया और भारत की पीठ पर खंजर भोंका – उसे भारत कभी भी नहीं भुला पायेगा |भारत को चीन से ऐसे विश्वासघात की उम्मीद नहीं थी | वर्तमान में विवाद के चलते भारत के सख्त  रवैये से चीन परेशान हो उठा है जिसके कारण उसकी बौखलाहट और चीनी मीडिया की गीदड़ भभकी से समझा जा सकता है | इसी तनातनी के बीच बंगाल की कड़ी में 10 जुलाई से भारत के साथ अमरीका और जापान मालवार युद्धाभ्यास में भाग लेने जा रहे हैं | इसमें सभी देशों ने अपनी टॉप टीमे इस अभियान में शामिल होने भेजी है |