राष्ट्रीय हितों की हिफाजत पहली बार प्रतिबद्धता बनी-भारतचंद्र नायक

दिंनाक: 27 Jul 2017 20:20:41

अपने हितों की हिफाजत की प्रतिबद्धता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बोध करती है। चीनी आक्रमण का दौर, साठ के दशक में जब संसद में चीन द्वारा उत्तरी सीमा में किये गये अतिक्रमण की चिन्ता व्यक्त की गई, तपाक से तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने कहा कि हिमालय का बर्फीला पठार है जहाँ घास तक पैदा नहीं होती। कांग्रेस का लोकसभा और राज्यसभा में अंकबल भारी होने से बात आई-गई हो गई। लौह पुरूष तत्कालीन स्वराष्ट्र मंत्री सरदार पटैल ने इस पर गंभीर चिन्ता जताने के लिये पं. नेहरू को पत्र लिखा और चीन द्वारा विश्वासघात किये जाने की आशंका व्यक्त की उसे भी अनसुना कर दिया गया। हितों की हिफाजत की बात पर गौर करें कि अमेरिका और सोबियत रूस चाहते थे कि भारत जैसा लोकतांत्रिक देश संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का सदस्य बने। तत्कालीन अमेरिकी विदेश सचिव दिल्ली आये और प्रस्ताव पर गौर करने को कहा लेकिन इंटरनेशनल फेम और लीडरशिप के नशे में पं. नेहरू ने कहा कि चीन को ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया जाये। न चाहते हुए भी विश्व शक्तियां वेमन से चीन के सिर पर सेहरा बांधने को विवश हो गयी। इतिहास का दौर बदला और चीन आज विश्व मंच पर भारत के हर प्रस्ताव को वीटो करके कूड़ादान में फेकने की हिमाकत कर रहा है। यह बात सच है कि राजनीति में रीटेक नहीं होता, सिनेमा में होता है। लम्हों ने खता की और सदियो ने सजा पाई हमारी नियति बनी।

विडंबना यह है कि आज जब दुनिया के भारत सहित चौदह देश चीन की विस्तारवादी नीति से परेशान हैं और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सीना तान कर कहा कि चीन के विस्तारवाद को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भूटान की सीमा की सुरक्षा में भारतीय फौज आख से आख मिलाकर मुंहतोड़ जवाब दे रही है। पं. नेहरू की वंश परम्परा, विरासत के उत्तराधिकारी कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी लुके-छिपे ढंग से चीन के दिल्ली स्थित दूतावास से गोपनीय चर्चा करते हैं। आखिर ऐसे नाजुक दौर में इस मुलाकात को कांग्रेस की कौन सी सियासत कहा जायेगा। पं. नेहरू ने भारत के हितों के विपरीत जो नासमझी की भारत, तिब्बत और भूटान की मुश्किलें बढ़ाई क्या राहुल जी उसके लिये ही चीन के राजदूत को बधाई देने पहुंचे थे। यह वास्तव में राष्ट्रीय चिन्ता का विषय है। कांग्रेस से इसकी कैफियत लेने का हर राष्ट्रवादी नागरिक को हक है।

राष्ट्रीय अखण्डता के हित में भारत के रक्षामंत्री श्री अरूण जेटली ने चीन के भूटान क्षेत्र के डोकलाम से हटने की भारत को दी गई चेतावनी का माकूल जवाब दिया है कि यह 2017 का भारत है। 1962 के भारत की त्रासद याद दिलाने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दृढ़तापूर्वक मौन स्वीकृति से सेना को मोर्चें पर स्वतंत्रतापूर्वक राष्ट्र रक्षा में हर कदम बढ़ाने की स्वायत्तता देकर देश प्रहरियों का मनोबल बढ़ाया है। हथियारों की नली नीची है लेकिन बंदूकों की नली ऊंची करना परिस्थिति पर निर्भर है। दिल्ली से आदेश की जरूरत नहीं है। किसी मुल्क का यह जज्बा उसकी रक्षा करने और आत्मसम्मान बढ़ाने का सबसे बड़ा प्रोत्साहन है। जीत सत्य की और हौसले की होती है। आज विश्व जनमत भारत के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है और समझ चुका है कि जिस मुल्क की विदेश नीति ही विस्तारवाद बन चुकी है उसके सामने आत्मसम्मान के साथ अड़ जाना ही नैतिकता और विकल्प है। पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवन्त सिन्हा जो 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलजी के साथ बीजिंग गये थे, बताते हैं कि सीमा विवाद पर हुई चर्चा में तय हुआ था कि सेटिल्ड  को विस्थापित नहीं किया जायेगा और वहां चीन अपना दावा नहीं करेगा। लेकिन चीन के लिए समझौता और संधिया तभी तक मान्य होती हैं जब तक कि उनके माफिक बैठती हैं। कमोवेश यहीं दुष्प्रवृत्ति पाकित्सान ने दिखाई है। ये बात अलग है कि जिस तरह विश्व जनमत पर पाकिस्तान द्वारा जम्मूकश्मीर विवाद का पाकिस्तान द्वारा किये गये अंतर्राष्ट्रीयकरण का कोई प्रभाव नहीं रह गया है उसी तरह चीन के दावों की कलई खुलते दुनिया ने देख लिया है और भारत के डोकनाम में अड़ जाने और बार-बार चीन केा अतीत के समझौते की याद दिलाने पर विश्व जनमत भरोसा कर भारत की सच्चाई के पक्ष में स्वर मुखरित करने लगा है। बीजिंग सरकार, चीनी मीडिया ने अलग आक्रामक खबरे प्लांट करने का अनवरत सिलसिला अख्तियार किया है, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ है। कदाचित आजादी के बाद इतना फोलादी तेवर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पहली बार दिखाया जो चीन के लिए अप्रत्याशित है। उसने महसूस किया होगा कि भारत सॉफ्ट टारगेट नहीं रह गया है। सामरिक तैयारी में भारत का इरादा स्पष्ट है, लेकिन भारत के तेवरों में वह आक्रामकता नहीं है। उल्टे चीन युद्धोन्माद दिखाने में चरम पर है। भारत ने चीन की सेना की बढ़ती संख्या को देखते हुए सैनिकों की संख्या बढ़ायी है लेकिन स्पष्ट रूप से बंदूकों की नली नीची है क्योंकि चीन की उकसाउ कार्यवाही के बाद भी भारत शांति और मैत्री का पक्षधर है।

भारत के राजनयिक मानते हैं कि डोकलाम की सुरक्षा भारत की प्रतिबद्धता है जो उसे इतना सख्त कदम उठाने के लिए विवश करती है। डोकलाम, भूटान का क्षेत्र है और भारत उसकी सुरक्षा के लिए नैतिक और भारत भूटान के बीच संधि के पालन के लिए बाध्य है।

इस मामले में दो बाते उभर कर आती हैं कि चीन भरोसे मंद देश नहीं है। उसका अतीत का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है। फिर भी आज जैसी संवेदनशील, विस्फोटक स्थिति कैसे उत्पन्न हुई इसका कारण खोजने पर तथ्य उभरकर आते हैं कि पूर्ववर्ती सरकारें चीन के प्रपंच की शिकार हुईं और दूरदर्शिता के अभाव में चीन के छल का शिकार हुई। चीन और भारत के बीच तिब्बत एक स्वायत्तशासी देश तिब्बत बफर स्टेट का काम करता था, लेकिन चीन की नजर थी और चीन ने तिब्बत को हड़पने का हथकंडा अपनाया। तिब्बत की भारत से जो अपेक्षा थी उसके विपरीत तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू चीन के पंचशील सिद्धांतों पर फिदा रहे और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह करने से परहेज किया। चीन को शह मिली जबकि लौह पुरूष सरदार पटैल ने बार-बार इस गलत कदम के प्रति पं. नेहरू को आगाह किया। यदि ऐतिहासिक तथ्यों पर भरोसा करें तो तिब्बत का भी चीन के अधिकांश भाग पर प्रभुत्व था। बाद में चीन ने शक्ति प्रयोग कर अल्पकाल के लिए तिब्बत के मुख्य भाग पर कब्जा कर लिया था लेकिन बाद में तिब्बतियों ने आजादी हासिल कर ली थी। समय ने करवट ली 1949 में चीन ने तिब्बत को अपने अधीन करने की जब कोशिश की थी चीन इतना सशक्त नहीं था और भारत तिब्बतियों की गुहार पर ध्यान देता, सहयोग करता तो यह नौबत नहीं आती। भारत और चीन के बीच बफर स्टेट रहने से सीमा इस तरह विवाद का विषय नहीं बनती। लेकिन चीन को बेलगाम करके पं. नेहरू ने संकट की नींव डाल दी। पंचशील पर मुग्ध बने रहे। 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय भारत के इतिहास में ऐसी त्रासद घटना बनी कि भारत का साहस चूक गया चीन मनमानी करता रहा और हालत यह हुई कि उसका दावा भारत के पूर्वोत्तर में अरूणाचल प्रदेश और पश्चिमोत्तर में लद्दाख तक पसर गया। लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार चीन के नहले पर सीमा सुरक्षा की दृढ़ता बताकर दहला मारा है। तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा को अरूणाचल प्रदेश के तवांगसक जाने की अनुमति देकर चीन को ठेंगा बता दिया है। चीन की धमकियों के बावजूद एनडीए सरकार ने बता दिया है कि चीन जिस तरह सीमा की मनमानी व्याख्या करता है बर्दाश्त नहीं है। दोनों देशों के बीच समझौंता है। उसका पालन करना होगा। बात मेज पर बैठकर तय की जा सकती है। भारत की विदेश नीति पहली बार पं. नेहरू द्वारा प्रवत्र्तित नीति की छाया से मुक्त हुई है। देश के जनमत ने भारत के इस प्रत्याशित और दृढ़तापूर्व अख्तियार किये गये साहसिक रूख की सराहना की है और सभी वर्गों, राजनैतिक दलों ने समर्थन किया है। मजे की बात यह है कि चीनी मीडिया जहाँ वार भांगरिक करता है वहीं चीन का थिक टेंक चीनी रणनीतिकारों को भारत के बढ़ते प्रगतिशील कदमों से आगाह भी करता है और बताता है कि भारत एक उभरती हुई शक्ति है। कदाचित चीन भारत की बढ़ती शक्ति को पचा नहीं पा रहा है। एक ओर चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में वन बेल्ट, वन रूट कारीडोर बना कर पाकिसतान केा शह देकर भारत को चुनौती दी और आतंकवादियों की नकेल कसने के भारत के कदमों को थामने की कोशिश की है, वहीं भारत को उलझाए रखना चाहता है। बावजूद इसके कि चीन समझता है कि भारत उसके लिए प्रमुख बाजार है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से चार-पांच गुना समृद्ध है। लेकिन चीन में विकास के कदम थम गये हैं। उत्पादन चरम पर पहुंच गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन भारत जैसा बाजार के दरवाजे बंद करने का जोखिम उठा सकता है। दूसरी बात यह है कि हाल के समुद्री अभ्यास में भारत के अमेरिका और जापान ने भाग लेकर चीन की ईर्ष्या की आग में घी डालने का काम किया है। चीन समझ गया है भारत ने श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मुल्क की हिफाजत करना सीख लिया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना ही राष्ट्र की हिफाजत करने की प्रतिबद्धता देती है। जज्बा, जुनून और हिम्मत उपहार में नहीं मिलती यह स्वयं स्फूर्ति पैदा होती है। पं. नेहरू ने तो चीनी सेना द्वारा भारतीय भूमि पर अतिक्रमण को उसर जमीन कहकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति अपनी लाचारी व्यक्त कर दी थी लेकिन श्री नरेंद्र मोदी सरकार ने एक साथ दो फैसले लिये हैं। आकस्मिकता से निपटने के लिए जहाँ फौज को स्वायत्तता दे दी है, वहीं समझौता का दरवाजा खुला रखने के लिए राजनयिक रास्ता भी खुला रखा है। चीन के रक्षा मंत्री की उकसाऊ चेतावनी पर न चीन को धमकियाँ दी हैं और चीन के आक्रामक तेवरों के सामने घुटने टेके हैं। तथापि भारत हर हाल में परिस्थिति और चुनौती से निपटने के लिए दृढ़ता से मौके की नजाकत पर नजर रखे है।