"बेहयायी हमारे जीवन का प्रधान तत्व नहीं "-अनूप शर्मा

दिंनाक: 29 Jul 2017 18:01:10

हाल ही में रिलीज़ हुई फिल्म का समीक्षात्मक विश्लेषण 

लिपस्टिक_अंडर_माइ_बुरखा फ़िल्म का आकर्षक शीर्षक दर्शाता है कि प्रदर्शन लोलुपता में कितनी शक्ति होती है ।

पर यहां पर स्त्री विमर्श की आज़ादी के नाम पे ,निरुक्त भावाभिव्यक्ति है !!

""आज़ाद बुनियाद पर टिके खोखले सामाजिक निर्माण में बिकाऊ अश्लीलता का रंग रोगन करने की चेष्ठा असल में ...अपने साथ हुए अन्याय का बदला लेने के प्रतिउत्तर में स्त्रियों को बेसुध मादकता की ओर धकेलने का संदेश दे रही है ,पर ऐसा विचार स्वस्थ संदेश देने की सोच वाला नहीं अपितु विध्वंश और बग़ावत के बीज बोने वाला होता है ।""

हो सकता है जिस झिझक को बरकरार रखने की मैं वकालत कर रहा हूँ, वह बड़े लोगों की सोसायटी की सभ्यता में काला धब्बा मानी जाती हो !बौद्धिक तबका यहाँ पर मेरी  सामाजिक विषमता -जड़ता की दुहाई देगा पर यदि निष्पक्ष होकर सोचे तो शायद मेरी बात सच लगे ।

"सिनेमा के, निर्माणकर्ता जानते हैं कि स्वेक्षाचारिता का भूत स्त्रियों के कोमल हृदय में बड़ी आसानी से प्रवेश कर जाता है,पर हम और हमारा समाज जिस स्वच्छ लहराते निर्मल जल की ओर दौड़ते हुए जाने की चेष्ठा कर रहे हैं  वह वास्तव में मरुस्थल है ,वहां न कोई नीति है न कोई सहानुभूति और ना ही सहृदयता ।"

हाँ ये सत्य है कि स्त्री केवल उपभोग या उपयोग की वस्तु नहीं है ,नारी समाज को संवादधर्मी होना चाहिए और इधर कुछ वक़्त से संवादधर्मिता बढ़ी भी है ,और उसे बल भी मिला है ,जो जायज़ भी है जरूरी भी । पर यहां पे चर्चा और संदेश का ये मुद्दा भटक सा गया ।

फ़िल्म में स्नेह और प्यार के हार्दिक भावों की जगह अश्लील अलंकार ज्यादा है । फ़िल्म दर्शकों को ऊपरी बनाव चुनाव और विलास के भँवर में डाल रही है और फूहड़ता में तात्कालिक संवेदना से प्रेरित जनता-जनार्दन हंसी -ठिठोली से आंनद ले रही है ।

रोष ,रुखाई और हसद का ऐसा आरोहण  है की मूल संदेश कहीं छिप सा गया । मैं उन्नति या नवीन मान्यताओं का विरोधी तो नहीं पर प्रतिगामी नज़रिए की मुख़ालफ़त नहीं कर सकता ।