श्री कृष्ण एक राष्ट्रपुरुष -ओमप्रकाश कौशिक

दिंनाक: 15 Aug 2017 22:39:31

श्री कृष्ण योगिराज यानि योगियों के भी योगी थे | वे राष्ट्रपुरुष और इतिहास-पुरुष के रूप में अद्वितीय हैं | अर्थात श्रेष्ठ पुरुष | भगवान् श्रीराम मर्यादा से बंधे पुरुषोत्तम हैं | कृष्ण का कर्तव्य विराट था | द्वारका से लेकर मणिपुर तक भारत को एकसूत्र में आबद्ध करके, हर केंद्र के अधीन करके कृष्ण ने राष्ट्र को इतना बलवान बना दिया कि उसके बाद के सैकड़ों वर्ष तक विदेशी शक्तियों द्वारा कई प्रयत्न किये जाने के बावजूद देश खंडित नहीं हुआ |

कई विद्वानों व इतिहासकारों ने श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता और अस्तित्व को सप्रमाण सिद्ध करके बताया है | कृष्ण का समय ईस्वी पूर्व 3100  के आसपास मन जाता है | श्रीकृष्ण महामानव युगप्रवर्तक, योगेश्वर, युगनायक, श्रेष्ठ दार्शनिक और भक्त-वत्सल थे | उनमें सत्यनिष्ठा, पितृ , गुरु , ईश्वर भक्ति दांपत्य कुटुंब प्रेम , भूतदया, समदृष्टि मानवता, निर्भीकता, शालीनता, आदर्श मैत्रीभाव, उत्तम नीतिमत्ता, सदाचार आदि श्रेष्ठ गुण थे | वे अपने युग के क्रांतिकारी थे | उनके महत्वपूर्ण कार्य साधुजनों निर्बलों की रक्षा , दुष्टों का विनाश और धर्म की स्थापना करना था | कृष्ण का विराट व्यक्तित्व अनेक क्षेत्रों में विस्तरित था | व्यक्ति विराट बने , लोकोतर हुए और जगतगुरु के रूप में वे प्रतिष्ठित हुए | महाभारत में बारम्बार कहा गया है – यतो धर्मः ततो कृष्णः , यतः कृष्णः ततो जयः अर्थात जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है वहीँ विजय है , द्रोणवध, कर्णवध, दुर्योधन वध जैसे प्रसंगों में कृष्ण की सलाह संभवतः अन्यायपूर्ण लगे परन्तु कृष्ण विशाल धर्म की खातिर, व्यापक धर्म की रक्षा के लिए किंचित अधर्म का आचरण करते हुए, दिखाई देते हैं  किन्तु जब प्रचलित धर्म परस्पर टकराते हों तो उच्चतर धर्म का अनुसरण करना कृष्ण का सिद्धांत है | कृष्ण ने आजीवन धर्माचरण किया था | कृष्ण पूर्व सत्यवादी और निष्कलंक थे, इसकी पुष्टि महाभारतकार ने उत्तरा के पुत्र को जीवित करने के लिए कृष्ण की उक्तियों के द्वारा कराइ है | उस समय कृष्ण पुरे विश्वास के साथ कहते हैं ‘ यदि मैंने सदैव सत्य और धर्म का ही अवलंबन लिया है तो यह मृत बालक जीवित हो जाये’ और बालक सचमुच जीवित हो जाता है | कृष्ण में संपत्ति, युद्ध या राज्य की लिप्सा नहीं थी, कृष्ण ने कंस शिशुपाल, जरासंध नरकासुर आदि स्वार्थी और अत्याचारी राजाओं का वध किया पर उनके राज्य क्रमशः उग्रसेन, शिशुपाल के पुत्र, जरासंध के पुत्र सहदेव और नरकासुर के पुत्र भगदत्त को सौंप दिए, अपने अधीन नहीं किए | दुष्टों और आततायियों को जनकल्याणार्थ मारना पाप नहीं, इस धर्मनीति का कृष्ण ने अनुसरण किया. पांडव-कौरव युद्ध को रोकने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयत्न किये | स्वयं को झुकाया किन्तु दुष्ट, उन्मादी, अहंकारी दुर्योधन की राज्यलिप्सा के चलते युद्ध होकर ही रहा | भगवान कृष्ण समर्थ होते हुए भी अनेक बार मानहानि सहे | कंस के अत्याचार से मुक्त करने के बावजूद स्वयं उनके स्वजनों ने कृष्ण और बलराम को मथुरा छोड़कर चले जाने को कहा | स्यमन्तक मणि को चोरी कृष्ण ने ही की होगी ऐसी शंका बलराम को भी हुई थी | शिशुपाल की गलियां सुनी, बिना किसी दोष के गांधारी का शाप मिला | उनके स्वजन मदिरापान करके अमर्यादित व्यवहार किया और देवताओं , ब्राह्मणों, गुरुजनों क अपमान करने लगे, उस समय मूक प्रेक्षक की भांति उन्हें यादव स्थली देखने पड़ी | उन सभी प्रसंगों में स्थितप्रज्ञ होकर कृष्ण ने अपने मन के समत्व को अक्षुण रखा | कृष्ण को अवतार या भगवान मानकर उनकी मूर्ति की पूजा-अर्चना करने में कृत कृत्य अनुभव करने के बजाय यदि उनके गुणों, शिक्षा-दीक्षा, और जीवन-प्रणाली का अल्पांश भी गृहण करके आचरण में लाया जाये तो मनुष्य का जीवन निश्चय ही उन्नत होगा और यही सही अर्थ में कृष्ण की पूजा होगी | श्री कृष्ण श्रेष्ठ आध्यात्मिक गुरु थे | उनके शाश्वत  उपदेश तीन ग्रंथो में दिए गए हैं

(1) भगवत गीता

गीता महाभारत का एक भाग है | भीष्मपर्व के अध्याय 25 से 42 में गीता दी हुई है | भारतीय संस्कृति के सारभूत इस ग्रन्थ ने विश्वख्याति प्राप्त की है | सभी उपनिषदों का गाय की भांति दोहन करके कृष्ण ने 700 श्लोकों की गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग का निरूपण किया है | गीता ब्रह्मविद्या का उपदेश देती है, मोक्षमार्ग दिखाती है |

(2) अनुगीता         

महाभारत के अश्वमेघ पर्व के अध्याय 16 से 51, एवं 36 अध्यायों और 1056 श्लोकों में यह गीता समाविष्ट है | कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में सुनाई गई गीता अर्जुन को पुनः एक बार सुनानी थी | कृष्ण ने उस गीता के बदले यह गीता सुनाई | जीव को मोक्षप्राप्ति कैसे हो सकती है – आत्मा, ब्रहम, इन्द्रियां, यज्ञ,सन्यास की श्रेष्ठता, तीनों गुणों, आश्रयों का वर्णन कर, पापों का नाश करके आध्यात्मिक विकास का मार्ग बताती है |

(3) उद्धव गीता            

भागवत-सुंध 11 अध्याय 7 से 29 कुल श्लोक 10307 इसमें दत्तात्रेय के 24 गुरु, संख्य चारों वर्णों के धर्म, सांख्य सिद्धांत, तान गुणों,विभूतियों, शक्तियों , भक्ति सिद्धांतों आदि का निरूपण किया गया है | ज्ञान और कर्म, श्रेय, और प्रेय, प्रवत्ति और निवृत्ति, क्षात्र बल और  ब्रह्मबल , प्रेम और त्याग का समन्वय कृष्ण के जीवन में देखने को मिलता है. कृष्ण जीवित हैं क्योंकि वे पूर्ण पुरुष हैं | पूर्णता में ले जानेवाले हैं | कृष्ण के जीवन में वैदिक धर्म और भारतीय संस्कृति का सार सर्वस्व है | श्री कृष्ण पूर्णता के प्रतीक हैं , धर्म धुरंधर और सबसे बड़े धर्म रक्षक थे | उनकी गति उभयमुखी थी | उनका चिंतन पूर्ण था और धर्म युक्त था . यही कारण है कि आज भी कृष्ण के चरित्र गुणगान विश्व के कई देशों में श्रृद्धा पूर्वक किया जाता है | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय !

सौजन्य#पथिक सन्देश #आ.ओमप्रकाश कौशिक